मार्कण्डेय एक ऐसा बालक था जिसके लिए जन्म से पूर्व ही एक शर्त रखी गई थी। उसके माता-पिता को विकल्प दिया गया था कि वे अपने लिए एक ऐसे पुत्र का चुनाव कर सकते हैं जो या तो सौ साल तक जीने वाला मूर्ख हो या फिर केवल सोलह साल तक जीने वाला बेहद बुद्धिमान बालक हो।

माता-पिता समझदार थे, उन्होंने दूसरे विकल्प को चुना और एक होनहार और सक्षम बालक को पैदा किया, जो केवल सोलह साल जीने वाला था। जब दिन बीतने लगे तो उनके मन में यहीं चिंता आने लगी कि अब उन्हें पुत्र का वियोग सहना होगा। मौत का दिन पास आ रहा था। उन्होंने मार्कण्डेय को उस वरदान और चुनाव के बारे में बता दिया। पर मार्कण्डेय बहुत ज्ञानी थे।

जब मौत का क्षण पास आया और यमराज लेने आ गए तो मार्कण्डेय ने एक चालाकी की। वे कालभैरव नामक लिंग को थाम कर खड़े हो गए। जैसे ही उन्होंने लिंग को थामा, समय ठहर गया और मौत उन्हें छू नहीं सकी। यम को भी वहीं रुकना पड़ा।

मार्कण्डेय के भीतर चेतना का ऐसा आयाम खुल गया था जिसमें वे समय के लिए उपलब्ध नहीं थे। वे हमेशा पंद्रह साल के बच्चे के तौर पर जीते रहे और कभी सोलह साल के हुए ही नहीं। वे चेतना के उस आयाम में आ गए थे जिसे कालभैरव कहते हैं। समय के अस्तित्व से ही मौत का अस्तित्व है। कालभैरव ही चेतना का वह आयाम है जो समय से परे जा सकता है।

समय से परे जाना योग का एक आयाम है जिसमें आप भौतिक प्रकृति से परे जा सकते हैं। अगर आपका जीवन अनुभव ऐसा है कि आपका भौतिक से संबंध कम से कम है, तो समय आपके लिए कोई मायने नहीं रखता। जब आप भौतिक प्रकृति से अलग होते हैं तो समय आपको वश में नहीं कर पाता।

कालभैरव का अर्थ है, जिसने समय को जीत लिया हो। समय आपकी भौतिक प्रकृति का नतीजा है और आपकी भौतिक प्रकृति समय का नतीजा है। क्योंकि ब्रह्माण्ड में जो भी भौतिक है, वह प्राकृतिक तौर पर चक्रीय है। परमाणु से लेकर ब्रह्माण्ड तक, सब कुछ चक्रों में बंधा है। चक्रीय गति के बिना, भौतिकता की संभावना नहीं है।

अगर आप अपने भौतिक शरीर को एक खास स्तर की सहजता पर ले जाते हैं तो आप समय को वश में कर सकते हैं। अगर आपके और आपकी भौतिकता के बीच एक अंतर आ जाए तो समय का अनुभव आपके लिए नहीं रहेगा। तब हम कहेंगे कि आप कालभैरव हैं।

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