योग का स्रोत

सद्‌गुरु हमें पहले ‘योग कार्यक्रम’ और उस दिन के बारे में बता रहे हैं, जब प्रथम गुरु आदि गुरु का जन्म हुआ था।
 
 

सद्‌गुरु हमें पहले ‘योग कार्यक्रम’ और पहले गुरु, यानी आदि गुरु के जन्म के दिन के बारे में बता रहे हैं।

सद्‌गुरु: योगिक संस्कृति में शिव को ईश्वर के रूप में नहीं देखा जाता, वह आदियोगी यानी प्रथम योगी हैं। कितने हज़ारों साल पहले ऐसा हुआ था, इस बारे में बिल्कुल सही-सही नहीं बताया जा सकता, मगर कुछ खास उल्काओं और धूमकेतुओं जैसी खगोलीय क्रियाओं का अर्थ निकालते हुए लगभग 15,000 से 40,000 साल पहले आदियोगी, शिव ने सिद्धि प्राप्त की थी। वह हिमालय पर्वत पर परमानंद में नाचने लगे थे। उस परमानंद की अवस्था में जब कुछ गतिविधि संभव हो पाती, तो वे उन्मत्त होकर बेतहाशा नृत्य करने लगते। जब उनका परमानंद गतिवि‍धि और हलचल से परे चला जाता, तो वे पूरी तरह स्थिर हो जाते।

लोगों ने देखा कि शिव कुछ ऐसा अनुभव कर रहे थे, जो पहले किसी ने नहीं किया था, जो उनकी समझ से परे था। उन्हें दिलचस्पी हुई तो वे जानने के लिए उनके पास आए। लोग आए और इंतजार करके चले गए क्योंकि शिव लोगों की मौजूदगी से बेखबर थे। वह या तो प्रचंड नृत्य में थे या पूर्ण स्थिरता में। उन्हें कोई खबर नहीं थी कि उनके आस-पास क्या हो रहा है। केवल सात लोग आखिर तक इंतजार करते रहे। ये सातों जिद पर अड़े रहे कि उन्हें शिव से ज्ञान प्राप्त करना है, मगर वह उन्हें अनदेखा करते रहे। सातों उनके आगे गिड़गिड़ाने लगे, ‘आप जो कुछ जानते हैं, वह हम भी जानना चाहते हैं।’

शिव ने उनकी बातों पर ध्यान न देकर कहा, ‘मूर्खों, तुम लोग जिस स्थिति में हो, तुम लाखों सालों में नहीं जान सकते। यहां से चले जाओ। तुम्हें तैयारी की जरूरत है। इसके लिए जबर्दस्त तैयारी चाहिए। यह कोई मनोरंजन नहीं है।’

चौरासी सालों की साधना खत्म होने के बाद एक दिन आदियोगी की नजर उन सातों पर पड़ी तो उन्होंने देखा कि वे ज्ञान को ग्रहण करने के चमकीले पात्र बन गए थे।

सातों ने तैयारी शुरू कर दी। दिन, सप्ताह, महीने, साल गुजरते गए। वे सातों तैयारी करते रहे मगर शिव उन्हें अनदेखा करते रहे। चौरासी सालों की साधना के बाद आदियोगी की नजर इन सात लोगों पर पड़ी, जो अब तक ज्ञान ग्रहण करने के चमकीले पात्र बन चुके थे और पूरी तरह ग्रहणशील हो चुके थे। यह ग्रीष्मकालीन संक्रांति के बाद पहली पूर्णिमा थी, यानी जब पृथ्वी के संबंध में सूर्य की दिशा उत्तर से दक्षिण की ओर हो जाती है, जिसे इस परंपरा में उत्तरायण से दक्षिणायन होना कहा जाता है।

अब शिव उन्हें और नहीं टाल सकते थे। उन्होंने शिव का ध्यान आकर्षित कर लिया था। उन्होंने अगले अट्ठाइस दिन बहुत करीब से सातों को देखा और अगली पूर्णिमा को उन्होंने गुरु बनने का फैसला किया। उस पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहा जाता है क्योंकि आदियोगी ने खुद को आदिगुरु के रूप में रूपांतरित कर लिया था। उस दिन पहले गुरु का जन्म हुआ था। वह दक्षिण की ओर मुड़ गए क्योंकि इन सातों ने उनसे अनुरोध किया, ‘यह सिर्फ हमारे कल्याण की बात नहीं है। पूरी मानव जाति के कल्याण के लिए हम आपसे ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं।’ एक गुरु के रूप में दक्षिण की ओर मुड़कर बैठने के कारण उन्हें दक्षिणमूर्ति कहा जाता है।

कई सालों के संचरण के बाद, यह प्रक्रिया पूरी हुई और सात पूर्ण आत्म ज्ञानी प्राणी तैयार हो गए, जिन्हें आज सप्तऋषि के नाम से जाना जाता है।

उन्होंने मानव जाति पर अपनी कृपा दृष्टि डालने के लिए दक्षिण का रुख किया और तभी योगिक विज्ञान का संचरण शुरू हुआ। योगिक विज्ञान से मेरा मतलब आपकी उस योग कक्षा से नहीं है, जिसमें आप अपने शरीर को मरोड़ना (जो हर नवजात शिशु जानता है) या अपनी सांस को थामना (जो हर अजन्मा शिशु जानता है) सीखते हैं। इसका मतलब मानव क्रियाप्रणाली के विज्ञान को समझना है, ताकि आप उसे तोड़ कर अलग कर सकें या जोड़ सकें। यह संचरण लंबे समय तक चला। कई सालों के संचरण के बाद यह प्रक्रिया पूरी हुई और सातपूर्ण आत्म ज्ञानी प्राणी तैयार हो गए, जिन्हें आज सप्तऋषि के नाम से जाना जाता है। आदियोगी ने कहा, “आप सब के दक्षिण जाने का कोई मतलब नहीं है। आपकी जाति के लिए एक ही काफी है। बाकी लोग अलग-अलग जगह जाकर दुनिया भर में इसे फैलाएं।”

एक मध्य एशिया गया, दूसरा मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीकी क्षेत्र की ओर, एक दक्षिण अमेरिका चला गया। एक वहीं रुका, एक हिमालय के निचले क्षेत्रों की ओर चला गया, एक पूर्वी एशिया की ओर गया और एक, जो भारतीयों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, दक्षिण की ओर चला गया। दक्षिणी प्रायद्वीप में दक्षिण की ओर जाने वाले ऋषि हमारे लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। वह अगस्त्य मुनि हैं।

जब हम ‘दक्षिण’ कहते हैं, तो हमारा मतलब है कि हिमालय से दक्षिण की ओर सब कुछ ‘दक्षिण है’। वह दक्षिण की ओर आए और आध्यात्मिक प्रक्रिया को हर किसी के जीवन का हिस्सा बना दिया। कहा जाता है कि उन्होंने उपमहाद्वीप में किसी इंसानी आबादी को नहीं छोड़ा। उन्होंने पक्का किया कि इस क्षेत्र की हर इंसानी आबादी इसके संपर्क में आए। इसके लिए उन्होंने उपदेश नहीं दिए, बल्कि आध्यात्मिक प्रक्रिया को लोगों के जीवन का एक हिस्सा बना दिया। आप अब भी इस देश के हर परिवार में उनकी कोशिशों के अवशेष पा सकते हैं, जहां अनजाने में किसी न किसी तरह का योग किया जाता है, भले ही वह बिगड़े हुए रूप में हो। अगर आप अपने परिवार में ध्यान से देखें, तो आपके बैठने, कोई काम करने का तरीका, पारंपरिक रूप से किया जाने वाले सभी काम अगस्त्य ऋषि के किए गए कामों के अवशेष हैं।