सद्‌गुरु के घर पर गिलहरियों ने डाला डेरा

सद्‌गुरु अपने जीवन की एक घटना के बारे में बता रहे हैं, जिसमें प्रकृति के जीवों का जिक्र है। वह उन गिलहरियों के बारे में बता रहे हैं, जो उनके घर आने-जाने लगीं और फिर उसे ही अपना घर बना लिया।
 
 
एक अप्रत्याशित हमला

सद्‌गुरु: हमारे घर के आसपास बहुत सारे पेड़ हैं, जिनमें से अधिकतर फलदार हैं। एक नियम के अनुसार, हम कोई भी फल नहीं तोड़ते क्योंकि हमारे पास खाने के लिए भरपूर भोजन है, इसलिए हमने इन पेड़ों के भोजन को पक्षियों, गिलहरियों और दूसरे जीवों के लिए छोड़ दिया है। यहाँ भोजन की अधिकता के कारण जीवों की संख्या भी कई गुना हो गई है। जब भी मौसम आता है तो बाग में गिलहरियों के दर्जनों छोटे-छोटे बच्चे उछल-कूद करते दिखाई देने लगते हैं। अक्सर मैं यात्रा पर ही रहता हूँ इसलिए घर में बहुत समय नहीं बीतता। एक दिन, जब मैं बाहर से वापिस आया, तो पाया कि गिलहरियों ने घर के बाथरूम पर भी क़ब्जा कर लिया है। मेरे कमरे में एक बड़ी सी खिड़की है और उस पर जाली लगाई गई है पर ये बड़े बुद्धिमान जीव हैं, जरा सा भी छेद दिख जाए तो उसमें से अपने आने-जाने का रास्ता बना लेते हैं।

मैंने देखा कि कुछ गिलहरियाँ बाथरूम में अपना घर बनाने में जुटी हैं। मैंने कहा, कोई बात नहीं। जब ये यहाँ तक आ ही गई हैं, तो इन्हें रहने दो। अपना काम करके चली जाएँगी।

वहाँ के सुरक्षित माहौल में गिलहरियों के सारे बच्चे, आराम से बड़े हो गए पर अब हमारे दामाद जी एक और घर बनाना चाहते थे और उन्होंने शयन कक्ष में रखी मेरी क़िताबों की अलमारी को घर बनाने के लिए चुन लिया। बेटी और दामाद, मेरे सोने के कमरे में जी भर कर हल्ला मचाने लगे। वे सुबह साढे चार बजे ही चिल्लाने लगते क्योंकि उन्हें बाहर जाना होता था। तब उन्हें बाहर भेजने के लिए मुझे दरवाजा खोलना पड़ता। मैं यह सब करता रहा क्योंकि ऐसे में अपने पास कोई और भी चारा भी तो नहीं रहता। फिर एक और महाशय आ गए, शायद उनके अंकल होंगे, उन्होंने भी एक घर बना लिया - क्योंकि ये रियल एस्टेट बहुत सस्ती और बढ़िया है! सारे घर में उनकी चीं-चीं-चीं की आवाज़, रात भर गूँजती रहती थी। फिर इसके बाद, वे मेरी क़िताबों में दिलचस्पी लेने लगे। बदक़िस्मती से, वे पढ़ना नहीं जानते, उन्हें सारी क़िताब ही हजम करनी पड़ती है! वे सही मायनों में, मेरी सारी क़िताबों को पढ़ने लगे। वे तो हर जगह घूमने लगे, बड़े ही धडल्ले से सीढ़ियों और दरवाज़ों से आते-जाते।

मैं अपनी यात्राओं की वजह से, अपने ही घर में मेहमान हूँ। एक बार जब घर पहुँचा, तो ये लोग मुझे सिर से पैर तक इस तरह देखने लगे, मानो पूछ रहे हों, ‘ये बंदा कौन आ गया?’

अगर आप गिलहरियों को ध्यान से देखें तो आप इनके चेहरे पर ये सारे भाव पढ़ सकते हैं। वे मुझे कुछ ऐसी सवालिया नज़रों से देख रहे थे जैसे मेरे बारे में पूछताछ कर रहे हों। फिर मैंने तय किया कि इनके इस किस्से पर रोक लगाने का वक्त आ गया था। हमने उनके घर के भीतर आने के सारे छेद बंद कर दिए और सारी गिलहरियों को बाहर निकाल दिया।

उस रात, जब मैंने जा कर, बाथरूम की बत्ती जलाई तो दीवार में एक छोटा सा छेद दिखा। दो नन्हे बच्चे वहाँ से बाहर झाँक रहे थे क्योंकि उनके गिलहरी मम्मी-पापा अभी तक वापिस घर नहीं आए थे। मैं उस दृश्य को भुला नहीं सकता। मैंने थोड़े से भोजन का चुग्गा डाला और उन्हें पकड़ लिया। पर अब उन्हें छोड़ें कहाँ? वे अभी बहुत छोटे थे। हमने बाहर भी इस तरह जाल लगा कर, दो बड़ी गिलहरियों को पकड़ा। यह नहीं पता कि वे उनके मम्मी-पापा थे या अंकल-आंटी! पर मुझे उम्मीद है, कि वे उनके मम्मी-पापा ही रहे होंगे क्योंकि वे ही उस जगह पर बार-बार आने की कोशिश कर रहे थे। हमने उन सबको एक बॉक्स में रखा अैर कुछ घंटों तक साथ रखने के बाद, जंगल में छोड़ दिया।