लिंग भैरवी​, ​ध्यानलिंग और स्पंदा हॉल - एक गूढ़ प्रणाली
सद्‌गुरु भारत के ईशा योग केंद्र में स्पंदा हॉल के बारे में बता रहे हैं। साथ ही वह उस जटिल प्रणाली, जिसमें ध्यानलिंग और लिंग भैरवी शामिल हैं, में उसके स्थान के बारे में बता रहे हैं।
 
 
 
 

सद्‌गुरु भारत के ईशा योग केंद्र में स्थित स्पंदा हॉल के बारे में बता रहे हैं। सद्‌गुरु बताते हैं कि स्पंदा हॉल, ध्यानलिंग और लिंग भैरवी को मिलाकर बनी एक गूढ़ प्रणाली का एक हिस्सा है। जानते हैं इस प्रणाली में स्पंदा हॉल के स्थान के बारे में

सद्‌गुरु: ‘स्पंदा’ का मतलब है ‘आदिम’ या ‘प्रारंभिक’। स्पंदा हॉल को मुख्य रूप से भाव स्पंदन और सम्यमा कार्यक्रमों के लिए बनाया गया था। सम्यमा से अधिक भाव स्पंदन के लिए। यह एक मेल्टिंग पॉट यानी पिघलने के लिए अनुकूल स्थान की तरह है। इसकी प्राण-प्रतिष्ठा जिस तरह से की गई है, उससे स्पंदा हॉल में भाव स्पंदन कार्यक्रम बहुत सहजता से होते हैं। यहां चीजें आराम से घुल-मिल जाती हैं।

स्पंदा हॉल और लिंग भैरवी एक ही दिशा में हैं। जब हमने स्पंदा हॉल को बनाया था, उस समय मैंने लिंग भैरवी की बात नहीं की थी। मुझे लोगों को यह विश्वास दिलाने में बहुत दिक्कत हुई थी कि मैं स्पंदा हॉल को इसी कोण पर चाहता हूं। लोग कहते, ‘नहीं, यह बेहतर दिखेगा, वह बेहतर दिखेगा।’ मैंने कहा, ‘नहीं, हम इसे यहीं बनाना चाहते हैं क्योंकि यह एक पूरी प्रणाली है।’

जब हमने ध्यानलिंग की प्राण प्रतिष्ठा की थी, तो परिसर के दक्षिण-पश्चिमी कोने में लिंग भैरवी को स्थापित करने की बात हमेशा से मेरे मन में थी। मेरे ख्याल से कई बार मैंने इसकी चर्चा भी की, मगर उस समय हमारे पास न तो साधन थे, न समय। मगर मुख्य रूप से यही योजना थी।

ध्यानलिंग एक कोख की तरह है। यह देवी की योनि है। योनि शब्द का मतलब कोख होता है। संस्कृत या देशी भाषाओं में वेजाइना के लिए कोई शब्द नहीं है। जब बुद्धि हारमोनों के असर में आ जाती है और हम कामुकता के संदर्भ में सोचने लगते हैं, तभी वेजाइना को एक अलग अंग के रूप में देखा जाता है। अन्यथा, योनि का मतलब कोख होता है। उसे एक पवित्र स्थान की तरह देखा जाता था, जहां हम सभी को अपने सृजन के सबसे महत्वपूर्ण भाग के दौरान रहना पड़ता है। उस समय हमारे हाथ में कुछ नहीं होता। उस समय जब सब कुछ प्रकृति के हाथों में होता है, वह स्थान हमें सुरक्षित करता है और हमें बनाता है। इसे सबसे पवित्र स्थान माना जाता था।

शिव और शक्ति सिद्धांत में हमेशा जब भी लिंग और योनि को प्रदर्शित किया जाता है, तो आप कोख के अंदरूनी हिस्से को देख रहे होते हैं। यही वजह है कि स्त्री अंग अवुदेयार आधार में होता है और लिंग उसके अंदर होता है। जब आप ध्या‍नलिंग में प्रवेश करते हैं, तो आप कोख के अंदर होते हैं और लिंग कोख के अंदर है। इसे इसी तरह दर्शाया गया है।

लिंग भैरवी हमेशा से इस त्रिकोण का हिस्सा थी। बस हमने उसके लिए औपचारिक रूप से कोई स्थान तय नहीं किया था। पहले एक स्थान के रूप में यह थोड़ा सा अपूर्ण था। ध्यानलिंग के संदर्भ में नहीं, ध्यानलिंग अपने आप में पूर्ण है। मगर लिंग भैरवी के पूरा होने से अब यह एक संपूर्ण प्रणाली बन गई है। लिंग भैरवी का त्रिकोण देवी का जघन या प्यूबिक त्रिकोण है, ध्यानलिंग का गुंबद कोख का अंदरूनी हिस्सा है और उसके अंदर ध्यानलिंग है। इससे निकलने वाले पहले जीवन दायक स्पंदन को स्पंदा कहा जाता है। इसीलिए स्पंदा हॉल को उस जगह स्थापित किया गया है।