एकादशी के दिन ही उपवास क्‍यों?

हिन्दू परंपरा में एकादशी के दिन उपवास किया जाता है। पूर्णिमा और अमावस्या के ग्यारहवें दिन यह उपवास किया जाता है। क्या है एकादशी के दिन उपवास का विज्ञान?
एकादशी
 

हिन्दू परंपरा में एकादशी के दिन उपवास किया जाता है। पूर्णिमा और अमावस्या के ग्यारहवें दिन यह उपवास किया जाता है। क्या है एकादशी के दिन उपवास का विज्ञान?

सद्‌गुरु: पूर्णिमा और अमावस्या के बाद ग्यारहवां दिन एकादशी होता है। हर 40 से 48 दिन में मानव शरीर मंडल नामक एक चक्र से गुजरता है। इस चक्र में तीन खास दिन ऐसे आते हैं जब शरीर को भोजन की जरूरत नहीं होती। ये दिन सभी लोगों में अलग-अलग हो सकते हैं और जरूरी नहीं है कि वे बराबर अंतर पर आएं। अगर आप अपने जीवन में उन दिनों की पहचान कर लेते हैं और शरीर को भोजन नहीं देते – क्योंकि वह भोजन की मांग नहीं करता – तो इस सरल पद्धति से आपकी बहुत सारी स्वास्थ्य समस्याएं हल हो जाएंगी।

Infographic - Ekadashi Hi

शारीरिक तंत्र के इस चक्र की ज्यादातर लोग पहचान कर सकते हैं, अगर वे इस बात को दिमाग से निकाल दें कि कितनी कैलोरी, कितना प्रोटीन और कितना मिनरल लिया जाना जरूरी है। अगर वे अपने शरीर की बात सुनें, तो ज्यादातर इंसान इन तीन दिनों की पहचान आसानी से कर सकते हैं। इसलिए कहा जाता था कि उन 48 दिनों में से तीन दिन आपको भोजन नहीं करना चाहिए। ऐसा इसलिए कहा गया था क्योंकि किसी ने अपने तंत्र पर बारीकी से नजर रखी थी और अपने अनुभव से यह बताया था। मगर सभी लोगों के पास वह जागरूकता नहीं थी, इसलिए उन्होंने उपवास रखने के लिए एकादशी का दिन निर्धारित कर दिया। अगर आप ध्यान दें तो 48 दिनों में तीन एकादशी आती हैं। इस तरह से यह नियम के अनुकूल बैठता है।

इसकी वजह यह है कि उस दिन पृथ्वी खुद एक खास दशा में होती है, इसलिए यदि हम अपने शरीर को हल्का और उपलब्ध रखें, तो हमारी जागरूकता अंदर की ओर मुड़ जाएगी। अपने भीतर के द्वार को खोलने की संभावना उस दिन अधिक होती है। अगर आपका पेट भरा हुआ है, और आप बेखबर और सुस्त हैं तो आप उस पर ध्यान नहीं दे पाएंगे। इसलिए सजग रहने तथा शरीर को शुद्ध करने के लिए, आप उस दिन उपवास करते हैं। आपने पिछले दिन रात का भोजन किया था और उसके बाद आप एकादशी को रात का भोजन करते हैं।

अगर आप उपवास नहीं कर सकते क्योंकि आपको ज्यादा सक्रिय रहना होता है और आपके पास साधना की शक्ति नहीं है, तो आप फलाहार ले सकते हैं जो पेट के लिए हल्का होता है ताकि आपके अंदरूनी द्वार खुल जाएं। इसका मकसद शरीर को जबरदस्ती भूखा रखना नहीं है। इसका उद्देश्य हर चीज को एक चेतन प्रक्रिया बनाना है। हम मजबूरी में इस तरह खाना नहीं चाहते, हम चुनते हैं।

 
 
 
 
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