दिव्यता के पथ पर : माँ वनश्री

यहाँ, माँ वनश्री हमको उनके घटनापूर्ण जीवन के प्रक्षेप पथ पर से ले जा रही हैं, उनके जीवन के घटनाक्रम एवं अनुभवों से परिचित करा रहीं हैं।युद्ध से आहत जर्मनी में बिताये अपने बचपन से ले कर प्रकृति प्रेमी, 80 वर्षीया वृद्धा होने तक का जीवन मार्ग। वे सदगुरु के साथ अपनी पहली भेंट को याद करती हैं और उनके आशीर्वाद से मिली अपनी संन्यास दीक्षा के बारे में भी बता रहीं हैं। लेख : जनवरी 20, 2020
 दिव्यता के पथ पर : माँ वनश्री
 

इस श्रृंखला में, हर महीने, हमारे ब्रह्मचारियों और संन्यासियों में से कोई एक, अपनी व्यक्तिगत पृष्ठभूमि, अपने विचार तथा अनुभवों को साझा करते हुए बताते हैं कि इस “दिव्य पथ” पर चलने का उनके लिये क्या अर्थ है!

जीवन और मृत्यु का अर्थ

माँ वनश्री: मेरा जन्म जर्मनी में तब हुआ था जब दूसरा विश्वयुद्ध बस शुरू ही हुआ था। बहुत सारे शहरों पर जबर्दस्त बमबारी हो रही थी और वे खंडहरों में बदल रहे थे। लाखों लोग, अधिकतर पुरुष, मारे गये थे। बहुत सारे पति और पिता घरों में वापस लौट कर नहीं आये। अगर कुछ लौटे तो भी वे शारीरिक या मानसिक रूप से विकलांग हो चुके थे। रात के समय हमें साइरन की जोर से आवाजें सुनाई देतीं थीं और हम तलघर की ओर भागते। चूंकि हमें पता नहीं होता था कि हमले कब तक जारी रहेंगे तो हम नीचे जाते समय अपने साथ गेहूं के दलिये का बड़ा बर्तन और खट्टे अचार अपने साथ ले जाते थे। जब जमीन पर बम गिरते तब अजीब आवाज़ें आतीं थीं और मीलों दूर से तेज धक्कों की लहरें आतीं थीं। आज भी जब मैं अपनी आँखें बंद करती हूँ तो मुझे वे आवाज़ें सुनाई देतीं हैं। ये अत्यंत अद्भुत बात है कि कैसे हमारा शरीर अपने अनुभवों को जीवन भर के लिये संग्रहित कर सकता है।

मुझे बौद्धिक शिक्षण में रुचि नहीं थी और हमेशा से प्रकृति ही मुझे सबसे बड़ी शिक्षिका लगती थी।

चूंकि विद्यालयों के भवन नष्ट हो रहे थे और शिक्षक गायब थे, हमारे पास ऐसा कोई स्कूल नहीं था जिसमें हम जा सकते - पर बच्चों को कुछ भी कमी महसूस नहीं हो रही थी। वास्तव में, मेरे लिये ये मेरे जीवन का सबसे मजेदार समय था। पत्थरों के ढेरों, अवशेषों को हटाने में लगभग दस साल लग गये थे। तब तक के वर्षों में हम इन खंडहरों में खुशी से खेलते थे, वे हमारे अलग ही प्रकार के खेल के मैदान थे, जहाँ हमें खेलने के लिये खोपड़ियां और हड्डियाँ मिलतीं थीं। एक 8 वर्ष की बच्ची के रूप में मेरी एकमात्र जिम्मेदारी यही थी कि हमारे फलों के बाग की गर्मियों के मौसम में मैं देखभाल करूँ जबकि मेरे भाई एक प्राणी संग्रहालय का प्रबंधन करते थे, जिसमें सुअर, सफेद चूहे, कबूतर और सुनहरी मछलियाँ होते थे। मेरा बचपन चौबीसों घंटे, सातों दिन मजे में बीत रहा था।

तीन साल के बाद हमारा विद्यालय कुछ वैकल्पिक शिक्षकों के साथ शुरू हुआ तो मुझे वहाँ स्थिर होने में कुछ समय लग गया। मुझे जल्दी ही समझ में आ गया कि प्राकृतिक वातावरण में समय बिताने और खंडहरों में खोपड़ियों तथा हड्डियों के साथ खेलने की अपेक्षा, स्कूल में पढ़ाई करना कम रोमांचक था। खैर, जो भी हो, ये स्कूल जाना एकदम बुरा नहीं था क्योंकि वहां पर पूर्णकालिक शिक्षक न के बराबर थे. उनमें से अधिकतर युद्ध में मारे गये थे तो स्कूल दिन में कुछ घंटों के लिये ही खुलता था। हम दोपहर में अपनी माँ की मदद करने के लिये कपड़े की दुकान पर जाते थे। रेशमी, ऊनी और सूती कपड़ों की बुनाई से मैं बहुत ही मोहित रहती थी। मैं आकर्षक नमूने बना लेती थी और बिना कोई खास प्रयत्न किये, लगभग कोई भी कपड़ा सिल लेती थी - जैसे मुझे इस कला में प्राकृतिक रूप से महारत हासिल हो।

प्रकृति के बारे में

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समय बिताने के लिये मेरा सबसे प्रिय शौक था- और आज भी है- बस चिड़ियों को देखते हुए विचारों में खोये रहना, खिसकते, चलते बादलों का निरीक्षण करते रहना और चारों ओर की प्राकृतिक सुंदरता का आनंद लेना। मैं किसी नदी के किनारे पर लंबे समय तक बैठी रह सकती थी। बस, छोटी छोटी मछलियों को कूदते देखती और बुलबुल का शाम का गीत सुनती जो घाटियों में गूंजता रहता था। मैंने अपनी बांसुरी पर उन मधुर धुनों को बजाना सीख लिया था। सर्दियों में, जब मेरे चारों ओर बर्फ होती, हर रात को मैं लगभग 1 घंटे तक तारों को देखती रहती। करोड़ों तारों से प्रकाशित आकाश की विशालता में छुपी हुई रात की शांति मुझे, मेरे अंदर ही, एक अलग स्थान पर ले जाती थी। किसी टूटते हुए तारे को देख कर मैं बहुत ही रोमांचित होती। मुझे टेलिविज़न देखने या सिनेमा जाने या पार्टी करने में कोई रुचि नहीं थी। कोई रिश्ता, कोई संबंध भी ऐसी चीज़ नहीं थी जिसे मैं ढूंढती होऊँ।

एक बार मैंने कहीं पढ़ा कि सारा अस्तित्व कुंडलियों का बना है और कुछ विशेष ज्ञान से हमारी समझ गहरी हो सकती है, जो हमें अनदेखी दुनिया का संकेत दे सकती है। मैं इससे बहुत रोमांचित हुई। इन सब वर्षों में, मैंने कई बार ऐसा सोचा था, "मैं यहाँ क्यों हूँ"? वास्तव में मैं, अन्य लोगों की तरह, इस दुनिया के अनुकूल नहीं हूँ। उन्हीं दिनों में मैंने कई सुंदर शब्दों के बारे में पढ़ा-सुना, जैसे, कंपन, ध्रुवीकरण, आत्मा, पुनर्जन्म, कर्म, भूत, संत आदि पर कुछ भी हो, उनका मुझ पर कुछ खास असर नहीं हुआ। मुझे उनमें कोई विशेष बात भी नहीं दिखी। इन विषयों पर अनेक पुस्तकें मिलती थीं पर जागरूकतापूर्वक, मुझे ये समझ में आया कि जीवन के बारे में प्रश्नों के उत्तर किताबों से नहीं मिलते। मुझे बौद्धिक पढ़ाई उबाऊ लगती थी और मेरे लिये प्रकृति ही सबसे बड़ी शिक्षिका थी।

भारत की सड़कों पर

मैंने कई बार लोगों को कहते सुना, "मैं अपने गुरु को खोजने भारत जा रहा हूँ"। मुझे ये बहुत अजीब लगता था। मैं भी भारत गयी पर मेरा इरादा दूसरा था- एक पर्यटक की तरह मैं भारत देखना चाहती थी।

2003 में 45 लोगों के एक दल के साथ मैं भारत के एक निर्देशित पर्यटन के लिये आयी। हम चेन्नई पहुँचे और हमने श्री अरबिंदो आश्रम, चिदंबरम मंदिर, पालानी मंदिर, त्रिची में बहुत से मंदिर और तमिलनाडु में कई अन्य स्थान देखे। यात्रा के अंतिम दिन, जब हमारी बस त्रिची से चेन्नई आ रही थी, तो मार्ग में लगे हुए सदगुरु के कई बड़े बड़े विज्ञापन मैंने देखे। उनके चेहरे ने मुझे कुतूहल में डाल दिया। जब हम चेन्नई में अपने होटल पहुँचे तो मैंने होटल मैनेजर से पूछा, "आज यहाँ आते समय हमने जो विज्ञापन देखे, उनमें वो आदमी कौन है"? लेकिन वे भी सदगुरु को नहीं जानते थे पर पास में ही खड़ी हुई एक सफाई करने वाली महिला ने हमारी बातें सुनीं और उसने उन्हें सदगुरु के बारे में बताया। उसने ये भी कहा कि उसी शाम को सदगुरु समुद्र तट पर, सेंट थॉमस चर्च के पास ही महासत्संग देने वाले थे। हमारी यात्रा की ये अंतिम रात थी और अगली सुबह की उड़ान से हम वापस जाने वाले थे। मेरे लिये यह एक बहुत बड़ा मौका था। मैंने एक रिक्शा ली और उस कार्यक्रम में पहुँची।

समुद्र तट पर रेत में लोगों के लिये लगी हुईं हज़ारों कुर्सियों को देख कर मुझे बहुत हैरानी हुई। वहाँ बहुत सारे लोग हाथ जोड़ कर सभी का स्वागत कर रहे थे। सूर्य अस्त हो रहा था और समुद्र पर आग के एक बड़े गोले की तरह दिख रहा था। तभी दाढ़ी वाला एक आदमी शांति से मंच पर आया। "तो ये सदगुरु हैं", मैंने जिज्ञासापूर्वक सोचा। वे तमिल में बोल रहे थे, जो भाषा मैं नहीं समझ सकती थी। पर शब्दों में मुझे रुचि भी नहीं थी। वहाँ बैठे बैठे मैं चमत्कारी सूर्यास्त को देख रही थी जो मेरे लिये किसी आनंदमय भोज से कम नहीं था। सदगुरु के प्रवचन के आखिरी 15 मिनिटों में, मैं जैसे किसी बेहोशी में, तन्मयावस्था में पहुँच गयी थी और पूरी तरह से ऊर्जावान हो गयी थी। बाहर निकलते समय मैंने एक पुस्तक खरीदी, 'एनकाउंटर द एनलाइटेंड'। और फिर अगली सुबह मैंने अमेरिका वापस जाने के लिये उड़ान भरी।

एक अनिवार्य यात्रा

एक महीने बाद, मैं जहाँ रहती थी, उस लेनोक्स के पास, बर्कशायर पर्वतों में स्थित एक बड़े योग सेंटर, 'कृपालु' में मैं गयी। उनकी दुकान में मैं एक पत्रिका 'एनलाइटेंड' में सदगुरु की तस्वीर देख कर चकित रह गयी। उसमें एक 7 दिवसीय कार्यक्रम के बारे में बताया गया था जो सदगुरु मार्च 2003 में, प्रिंसटन, न्यू जरसी में करने वाले थे। मैंने उस कार्यक्रम में भाग लिया। सामान्य रूप से, आध्यात्मिक गुरुओं के बारे में, मैं शंकाशील रहती थी पर फिर भी वहाँ मैं किसी भी निर्णय पर पहुंचे बिना बैठी और एक सप्ताह तेजी से गुजर गया। मैं ऊर्जावान हो कर घर वापस आयी और अब मेरे पास बेहतर जीने के लिये कुछ साधन भी थे।

मुझे याद है जब मैं केदार मंदिर में हाथ जोड़े अंदर गयी और झुक कर प्रणाम किया तो मुझे अचानक ऐसा लगा जैसे मेरे आसपास कुछ नहीं था, कोई दुनिया ही नहीं थी। मैं काँपने लगी और मेरी आँखों से आँसू बहने लगे।

मई 2003 में मैंने सदगुरु के साथ मिशिगन, अमेरिका में भाव स्पंदन किया। कार्यक्रम के दौरान सदगुरु ने इस बारे में बताया कि कैसे इकट्ठा किया हुआ ज्ञान हमारे लिये एक दीवार जैसा बन सकता है। इससे मुझे उन कुछ नकारात्मक भावनाओं से छुटकारा मिला जो बचपन से ही मैं अपने अंदर ले कर घूम रही थी। मेरा एक भाई था जिसकी याददाश्त बहुत ही तेज थी। वो एक अत्यंत होशियार विद्यार्थी था जो दो साल स्कूल नहीं गया पर अपनी कक्षा में सर्वश्रेष्ठ था। वो एक दिन में तीन किताबें पढ़ लेता था और उसने जो कुछ पढ़ा होता वो हमें गर्व से सुनाता। उसके सामने मैं तो अपने लिये बेवकूफ जैसी ही लगती थी। जब मैंने सदगुरु को यह कहते सुना कि प्राप्त किये हुए ज्ञान की कीमत बहुत सीमित है तो मुझ पर इसका गहरा असर हुआ।

सितंबर 2003 में, मैं बहुत रोमांचित हुई जब मैं (हिमालय यात्रा के लिये) एक ध्यानयात्रा दल की सदस्या बनी। ये एक कभी भुलाया न जा सकने वाला अनुभव था, जब सदगुरु भी हमारे साथ आये। जब मैं स्कूल में थी तब एटलस में हिमालय के मानचित्र पर हमेशा अपनी उंगलियाँ घुमाती थी और एक बहुत ही स्पष्ट निकटता का अनुभव करती थी। अब मैं उसकी यात्रा पर थी। दिन में बस से कई कई घंटों तक लंबी दूरी तय करना, गोमुख तक चल कर जाना, रंगभरा इंद्रधनुषीय ग्लेशियर देखना, ग्लेशियर के ठंडे पानी में तरोताज़ा करने वाली डुबकी लगाना - ये सब अत्यंत मोहित कर देने वाला था।

उन घुमावदार रास्तों पर बस से यात्रा करना, इतने सारे साधू, संतों, भक्तों को देखना, सदगुरु के साथ केदार मंदिर तक पदयात्रा करना, मंदिर के (बर्फ से ढँके) सफेद हिस्से को देखना, ये सब तथा और भी बहुत कुछ मेरी यादों में बसा हुआ है। मुझे याद है, जब मैं हाथ जोड़े केदार मंदिर में गयी और झुक कर प्रणाम किया तो मुझे अचानक ऐसा लगा जैसे मेरे आसपास कुछ भी नहीं था, कोई दुनिया ही नहीं थी। मैं काँपने लगी और मेरी आँखों से आँसू बहने लगे। मेरे ध्यान में आया कि मंदिर की यात्रा के बाद, दल के अन्य प्रतिभागी भी कुछ अलग ही लग रहे थे - ज्यादा शांत, ज्यादा विचारशील और ज्यादा सचेत। हिमालय यात्रा का हर पड़ाव मुझे अपने आप को समृद्ध करने वाला और वास्तविक रूप से भुलाया न जा सकने वाला अनुभव लगा।

फिर, जनवरी 2004 में, मैं पहली बार आश्रम में सम्यमा प्रोग्राम की तैयारी के लिए 6 सप्ताह की साधना के लिये आयी। उस समय आश्रम में, ध्यानलिंग के चारों ओर बहुत सा निर्माण कार्य चल रहा था और हम कैवल्य कुटिर में साधना करते थे। सम्यमा कार्यक्रम के पहले दिन जब मैं स्पंदा हॉल में प्रविष्ठ हुई तो अपनी आँखों पर विश्वास न कर सकी। 1000 से भी ज्यादा गद्दे करीने से लगे हुए थे और प्रतिभागी तेजी से अंदर आ रहे थे जिससे वे सदगुरु के मंच से सबसे पास का स्थान प्राप्त कर सकें।

सम्यमा ! क्या अवधि थी वो, क्या गजब का विस्तार था !! मैं पहले भी छोटी जगहों पर रही थी पर यहाँ, एक गद्दे पर 7 दिन !!! इसने मुझे अपार धीरज रखना सिखाया - बस केवल बैठना - सदगुरु के निर्देशों के अनुसार करने के सिवाय कुछ और नहीं करना। मुझे नहीं मालूम था कि बिना नींद लिये हुए मैं कई घंटों तक मंत्रजाप कर सकती थी। कभी कभार कुछ क्षण ऐसे थे जब मुझे उठने की इच्छा हुई, अपने पैरों को खींच कर तानने की तथा और कुछ करने की भी पर कार्यक्रम के अंत तक आते आते मेरा पैरों का दर्द भी ठीक हो गया। जब सदगुरु ने हमें सम्यमा ध्यान में दीक्षित किया तो सब कुछ दायें बायें हिलने लगा और कुछ क्षणों के लिये तो फर्श भी गायब हो गया। मैं बार बार सोचती रही, "ये कौन कर रहा है"? मुझे ऐसा लग रहा था जैसे कोई अन्य शक्ति मुझे अन्य आयामों में धकेल रही थी।

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2004 में ही मैंने सदगुरु के साथ एक विशेष कार्यक्रम में भाग लिया, जिसका नाम था, 'वैभव शिव' - जो शिव के भव्य, शानदार तरीकों का उत्सव ही था। ये एक अनमोल अनुभव था जिसमें मुझे लगा कि मेरा जीव अनजाने ढंग से समृद्ध हो गया था। बाद में, मुझे 'लीला' में भाग लेने का सौभाग्य भी मिला तो मुझे ऐसा महसूस हुआ हमें कृष्ण की एक झलक मिली थी कि वो क्या थे ! उस कार्यक्रम में सदगुरु ने कहा कि खेलने के लिये हमारा हृदय प्रेम से भरा पूरा होना चाहिये, मन आनंदमय होना चाहिये तथा हमारा शरीर जीवंत होना चाहिये। मैं अभी भी उस पर काम कर रही हूँ।

शिव लोक की यात्रा

2006 में मैं आश्रम की एक कुटिया में आ गयी और मैंने रिजुवेनेशन सेंटर में 6 महीने वॉलिंटियरिंग की। उसी साल सदगुरु ने पहली कैलाश यात्रा की घोषणा की। मैंने तुरंत ही आवश्यक बातें पूरी कीं और यात्रा के लिये अपना सामान बांधने लगी। एक और साहस भरी यात्रा का प्रारंभ होने वाला था। इस तीन सप्ताह की यात्रा में हमने नेपाल सीमा पार की और ल्हासा क्षेत्र में दाखिल हुए जो अब चीन का हिस्सा है। वहाँ हमने एक असाधारण मठ, पोटाला महल देखा। 1959 में भाग कर भारत आने से पहले, दलाई लामा का ये घर था। चीनी और तिब्बती क्रांति के दौरान बहुत सारे मठ, मंदिर और ग्रंथ जला दिये गये थे पर ये पोटाला महल बच गया।

अगली सुबह हमारे दल ने अपनी यात्रा जारी रखी। हम अनुभवी ड्राइवरों द्वारा चलाई जा रही 48 जीपों में सफर कर रहे थे। सारा इलाका एकदम जंगली था, कोई आदमी नज़र नहीं आता था। हमें कहाँ जाना है इसके लिये दिशा निर्देश के कोई चिन्ह भी नहीं थे। रास्ते में हम रेत के ऊंचे ऊंचे टीलों से हो कर गुज़रे और जब हम कहीं पर रुकते थे तो हममें से कुछ लोग इन पहाड़ों पर चढ़ने और फिसलने को जाते थे। हम भरी पूरी घाटियों को पार करते थे और अनजाने जानवरों के झुंडों को देख कर मंत्रमुग्ध होते थे। मैंने कभी नहीं सोचा था कि ऐसा अनोखा अवसर मुझे मिलेगा।

फिर हम सुविख्यात मानसरोवर झील पर पहुँचे, एक अत्यंत ऊँचाई पर शुद्ध पानी की झील जिसमें कैलाश ग्लेशियर्स से पानी आता है। इस झील के बारे में जो कुछ भी था वो मेरे द्वारा देखे हुए किसी भी अन्य जलस्रोत से असामान्य रूप से एकदम अलग था। झील की पृष्ठभूमि में एक विशाल रहस्यमय पर्दे जैसा, गहरे, राख के रंग का , एक नमी भरा सा कुछ था जो दृश्य और अदृश्य के बीच की सीमा का क्षेत्र प्रतीत होता था। किनारे पर, रात में, सदगुरु के साथ वहाँ बैठना एक गजब का वास्तविक अनुभव था। हमने दो बार मानसरोवर के स्निग्ध और ऊर्जावान पानी में डुबकी लगाई।

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अगले दिन हम घोड़े और याक को ले कर आये शेरपाओं से मिले जिनके साथ हमें कैलाश पर्वत की यात्रा करनी थी। जब हम कैलाश के नजदीकी क्षेत्र में पहुँचे तो हमें पर्वत के अन्य चेहरों का दर्शन हुआ जो एकदम अविश्वसनीय लग रहा था। मौसम एकदम ठंडा था पर 18000 फ़ीट की ऊँचाई के हिसाब से आरामदायक लग रहा था। अगली सुबह हम पर्वत की ओर थोड़ी चढ़ाई सदगुरु के साथ चढ़े और कैलाश ग्लेशियर के थोड़ा निकट आये। कैलाश के उत्तरी मुख पर पिघलते ग्लेशियर से पानी की एक छोटी धारा बह कर आ रही थी। उस हीरे जैसे स्वच्छ पानी को बस हल्के से छूना ही ऐसा था जैसे रेशमी मोती मेरी उंगलियों में से गुज़र रहे हों। मेरा हमेशा से पानी के साथ एक खास संबंध रहा है और जंगली नदियों से एक विशेष लगाव। मैं अलग अलग देशों में जहाँ भी रही, नदियाँ और सरोवर मेरे आसपास ही थे। रात को सोने से पहले मैं अक्सर नदी किनारे समय व्यतीत करती और नदी के पथरीले तल पर बहते, मचलते पानी में चंद्रप्रकाश की चमक का आनंद लेती। पानी एक अनोखा, बहुत सारा बदलने वाला पदार्थ है जो द्रव, ठोस और वाष्प रूप में आ जाता है और मेरे लिये लचक, नरमी तथा बदलाव को समझने का एक अच्छा उदाहरण है।

हम वहाँ सदगुरु के साथ दो घंटे बैठे और कैलाश पर्वत के शक्तिशाली, जीवंत क्षेत्र के साथ घुलमिल गये। फिर धीरे धीरे हम पर्वत से नीचे की ओर उतरे और उस समय मैं हर उस पत्थर, चट्टान के प्रति कृतज्ञ थी जिस पर मैंने पैर रखा था।

अनादि का प्रारंभ

वर्ष 2008 में मुझमें ब्रह्मचर्य के मार्ग पर चलने की इच्छा जागृत हुई। मुझे लगता था कि मैं उस समुद्र की बस एक बूंद हूँ, जो समुद्र सदगुरु स्वयं हैं, तथा ब्रह्मचर्य से मेरी इस समुद्र के साथ एक हो जाने की संभावना बढ़ जायेगी। यद्यपि मुझे पता था कि मैं अब कोई युवा नहीं थी पर फिर भी मैं इस संभावना के प्रति जागृत थी और मैंने इसके लिये आवेदन कर दिया।

सीखना मेरे लिये हमेशा खुला क्षेत्र रहा है और ये कभी पूरा नहीं हुआ है पर सदगुरु -सब कुछ जानने वाले- के निर्देशन में रहना एक आशीर्वाद ही है।

2010 में मैं अमेरिका में ईशा इंस्टिट्यूट ऑफ इनर साइंसेज में एक तीन महीने के कार्यक्रम – “अनादि”- के लिये वापस गयी। अनादि अर्थात किसका कोई प्रारंभ ही नहीं । मैंने अपने आप को उसके लिये पूर्ण रूप से प्रतिबद्ध कर दिया और सदगुरु के मार्गदर्शन में वो 90 दिनों की साधना करना मेरे लिये अत्यंत लाभदायक रहा, जिसका असर मेरे ऊपर हमेशा के लिये हो गया। मैं जैसे ऊँचाई पर उड़ती थी - और कभी कभी नीचे गिर जाती थी और बीच में स्थिर खड़ी रहती थी। सदगुरु अक्सर हमारे साथ 5 से 6 घंटे बिताते थे तो ये सपना सच होने जैसा ही था। ये एक अमूल्य प्रक्रिया थी। मुझे ऐसा महसूस होता था जैसे मैं सृष्टि की कुंडलियों में एक छोटा सा मंदिर होऊँ - जहाँ हर कुंडली उसी मौलिक सृष्टि का दर्शन करती थी।

मार्च 2011 में एक दिन मुझे कहा गया कि मैं जा कर सदगुरु से मिलूं। जैसे ही हम बातें करने के लिये बैठे, सदगुरु ने मुझसे पूछा, "तुम्हारी उम्र क्या है"? जब मैंने उन्हें अपनी उम्र बताई तो वे मुस्कुराये और उन्होंने मुझे गले से लगा लिया।

इस मुलाकात के 5 दिनों के अंदर मुझे कहा गया कि मैं ब्रह्मचर्य साधना के लिये जाऊँ। ये मेरे जीवन का सबसे बड़ा उपहार था। और फिर, मेरी अपेक्षाओं से पूरी तरह से बाहर, ये साधना शुरू होने के कुछ ही दिनों के बाद, सदगुरु ने मुझे संन्यास की दीक्षा दी।

मैं सदगुरु के प्रति अंतर्मन से, गहराई से, कृतज्ञ हूँ कि मेरी कई सारी कमियों के उपरांत भी उन्होंने मुझे इस मार्ग पर स्वीकार कर लिया। ये एक ऐतिहासिक बात है कि मैं आश्रम के प्राणप्रतिष्ठित स्थान का हिस्सा तभी बन गयी हूँ जब सदगुरु स्वयं यहाँ पर हैं, जब वे लाखों लोगों तक पहुँच रहे हैं, सारी मानवता को बदलाव के साधन प्रदान कर रहे हैं|

सीखना मेरे लिये हमेशा खुला क्षेत्र रहा है और ये कभी पूरा नहीं हुआ हैपर सदगुरु - सब कुछ जानने वाले - के निर्देशन में रहना एक आशीर्वाद है। दो साल पहले, सदगुरु की कृपा से, मैं सातवें पहाड़ पर भी चढ़ गयी। अगले वर्ष मैं 80 साल की हो जाऊँगी और अभी भी, मैं गतिमान हूँ और जीवन से प्रेम करती हूँ।

Editor's Note: Watch this space every second Monday of the month as we share with you the journeys of Isha Brahmacharis in the series, "On the Path of the Divine."