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आदि योगी – सद्गुरु की कविता

poem शिव के बारे में

एक शांत सागर
एक शांत दिन
एक शांत मन

पर अग्नि से धधकता
एक तीव्र हृदय
एक आदि ऋषि का।

सदियों से दहकता
अज्ञानी के लिए विनाशकारी
जिज्ञासु के लिए ज्ञानदायी
हठी के लिए निर्मम
इच्छुक के लिए कोमल।

जब सभी तरकीबें हो जाएंगी नाकाम
आदियोगी की अग्नि
अज्ञान की दीवार को जलाकर
कर देगी भविष्य के दुर्ग को रोशन।

भविष्य के दुर्ग बनते हैं
सबसे पहले उस मन में
जो अज्ञान या ज्ञान से भरा हो।

ये दुर्ग जब चमकेंगे
नीलवर्णी विधाता की कृपा के प्रकाश में
सफल हो जाएगा दुनिया में रहना
रास्ता मिलेगा परे जाने का।

कितने खुशकिस्मत हैं हम
आदियोगी की अग्नि को बढ़ा रहे हैं आगे।

Love & Grace