शिवाष्टक स्तोत्र लिरिक्स और अर्थ

article शिव स्तोत्रम्
अष्टकम् संस्कृत में आठ छंदों की एक काव्य रचना को कहा जाता है, जिसे आमतौर पर छंदों के सेट के रूप में व्यवस्थित किया जाता है।

अष्टकम् संस्कृत में आठ छंदों की एक काव्य रचना को कहा जाता है, जिसे आमतौर पर छंदों के सेट के रूप में व्यवस्थित किया जाता है। आदियोगी शिव,को समर्पित छंदों के इस संग्रह का आनंद लें।

शिवाष्टक स्तोत्र – चंद्रशेखर अष्टकम


कहा जाता है कि चंद्रशेखर अष्टकम को ऋषि मार्कंडेय ने लिखा था। ऐसा कहा जाता है कि सोलह वर्ष की आयु में, मार्कंडेय को शिव ने मृत्यु के देवता (काल या यम) से बचाया था। इन छंदों में, मार्कंडेय ने शिव की शरण ली, जिन्हें यहां चंद्रशेखर (जो अपने सिर पर अर्धचंद्र पहनते है) के रूप में चित्रित किया गया है। “जब वे मेरे साथ होते हैं, तो यम मेरा क्या कर सकते हैं?” मार्कंडेय यह घोषणा करते हैं।

गुरुवष्टकम


भारतीय परंपरा में, किसी के जीवन में गुरु होने का बहुत महत्व है। गुरवष्टकम इस सांस्कृतिक सिद्धांत का उदाहरण है। इस अष्टक में, आदि शंकराचार्य ने जीवन के विभिन्न पहलुओं को सूचीबद्ध किया है, जिन्हें आम तौर पर मनुष्य महत्त्व देते हैं: प्रसिद्धि, शक्ति, धन, सौंदर्य, बुद्धि, प्रतिभा, संपत्ति, एक अद्भुत परिवार। फिर, वे यह कहते हुए सभी को खारिज कर देते हैं कि “यदि किसी का मन गुरु के चरणों के सामने आत्मसमर्पण नहीं करता है, तो किसी भी चीज़ के क्या मायने है?”

शिवाष्टक स्तोत्र – गुरुवष्टकम

शरीरं सुरूपं तथा वा कलत्रं यशश्र्चारु चित्रं धनं मेरुतुल्यं
मनश्र्चेन लग्नं गुरोरङ्घ्रिपद्मे ततः किं ततः किं ततः किं ततः किं ||1

कलत्रं धनं पुत्रपौत्रादि सर्वं गृहं बान्धवाः सर्वमेतद्धि जातम्
मनश्र्चेन लग्नं गुरोरङ्घ्रिपद्मे ततः किं ततः किं ततः किं ततः किं ||2

षडङ्गादिवेदो मुखे शास्त्रविद्या कवित्वादि गद्यं सुपद्यं करोति
मनश्र्चेन लग्नं गुरोरङ्घ्रिपद्मे ततः किं ततः किं ततः किं ततः किं || 3

विदेशेषु मान्यः स्वदेशेषु धन्यः सदाचारवृत्तेषु मत्तो न चान्यः
मनश्र्चेन लग्नं गुरोरङ्घ्रिपद्मे ततः किं ततः किं ततः किं ततः किं ||4

क्षमामण्डले भूपभूपालवृन्दैः सदासेवितं यस्य पादारविन्दं
मनश्र्चेन लग्नं गुरोरङ्घ्रिपद्मे ततः किं ततः किं ततः किं ततः किं ||5

यशो मे गतं दिक्षु दानप्रतापा जगद्वस्तु सर्वं करे यत्प्रसादात्
मनश्र्चेन लग्नं गुरोरङ्घ्रिपद्मे ततः किं ततः किं ततः किं ततः किं || 6

न भोगे न योगे न वा वाजिराजौ न कान्तामुखे नैव वित्तेषु चित्तं
मनश्र्चेन लग्नं गुरोरङ्घ्रिपद्मे ततः किं ततः किं ततः किं ततः किं ||7

अरण्ये न वा स्वस्य गेहे न कार्ये न देहे मनो वर्तते मे त्वनर्घ्ये
मनश्र्चेन लग्नं गुरोरङ्घ्रिपद्मे ततः किं ततः किं ततः किं ततः किं ||8

गुरोरष्टकं यः पठेत्पुण्यदेही यतिर्भूपतिर्ब्रह्मचारी च गेही
लभेद्धाञ्छितार्थं पदं ब्रह्मसंज्ञं गुरोरुक्तवाक्ये मनो यस्य लग्नं |

गुरुवाष्टकम अर्थ

भले ही आपके पास एक शानदार काया हो, एक खूबसूरत पत्नी हो,
बड़ी प्रसिद्धि और मेरु पर्वत के बराबर धन हो,
यदि आपका मन गुरु के चरण कमलों पर केन्द्रित नहीं है,
फिर क्या, फिर क्या, फिर क्या?

भले ही आपके पास पत्नी, धन, बच्चे, नाती-पोते हों,
एक घर, रिश्ते और एक महान परिवार में पैदा हुए,
यदि आपका मन गुरु के चरण कमलों पर केन्द्रित नहीं है,
फिर क्या, फिर क्या, फिर क्या?

भले ही आप छः अंग और चार वेदों के विशेषज्ञ हों,
और अच्छा गद्य और कविताएं लिखने में एक विशेषज्ञ हों,
यदि आपका मन गुरु के चरण कमलों पर केन्द्रित नहीं है,
फिर क्या, फिर क्या, फिर क्या?

भले ही आप अन्य जगहों पर सम्मानित हों और अपनी मातृभूमि में समृद्ध हों,
और सद्गुणों और जीवन में आपको बहुत बड़ा माना जाता हो,
यदि आपका मन गुरु के चरण कमलों पर केन्द्रित नहीं है,
फिर क्या, फिर क्या, फिर क्या?

आपकी महानता और विद्वता के कारण आपके चरणों की पूजा
महान राजाओं और दुनिया के सम्राटो द्वारा भी लगातार की जा सकती है
लेकिन अगर आपका मन गुरु के चरण कमलों पर केंद्रित नहीं है,
फिर क्या, फिर क्या, फिर क्या?

भले ही आपकी प्रसिद्धि सभी जगह फैल गई हो,
और पूरी दुनिया आपके दान और प्रसिद्धि के कारण आपके साथ है,
यदि आपका मन गुरु के चरण कमलों पर केन्द्रित नहीं है,
फिर क्या, फिर क्या, फिर क्या?

आपका मन विराग और यौगिक प्राप्तियों के कारण,
बाहरी प्रलापों, संपत्ति और प्रिय के मोहक चेहरे से दूर हो सकता है।
लेकिन अगर आपका मन गुरु के चरण कमलों पर केंद्रित नहीं है,
फिर क्या, फिर क्या, फिर क्या?

भले ही आपके पास गहनों का एक अनमोल संग्रह हो,
भले ही आपके पास एक प्यार करने वाली पत्नी हो,
यदि आपका मन गुरु के चरण कमलों पर केन्द्रित नहीं है,
फिर क्या, फिर क्या, फिर क्या?

भले ही आपका मन जंगल में रहे,
या घर में, या कर्तव्यों में या महान विचारों में,
यदि आपका मन गुरु के चरण कमलों पर केन्द्रित नहीं है,
फिर क्या, फिर क्या, फिर क्या?

जो कोई भी गुरु की महानता समझाने वाली ऊपर दी गई पंक्तियों पर गौर करता है
वो एक संत, राजा, स्नातक हो या गृहस्थ बनें
यदि उसका मन गुरु के वचनों से जुड़ जाता है,
तो उसका मिलन ब्रह्म से अवश्य ही होगा।

शिवाष्टक स्तोत्र – पार्वती वल्लभ अष्टकम


इस अष्टकम में पार्वती-पति शिव को नमन किया गया है। यह भगवान शिव की विभिन्न विशेषताओं का वर्णन करता है, जिनका गुणगान ऋषि और वेद गाते हैं, और जिन्हें आशीर्वादों के भगवान के रूप में भी जाना जाता है। जिन्हें शैतानों और भूतों के साथ-साथ सबसे सुंदर प्राणी की उपमाएं दी गई हैं। उनमें अस्तित्व के सभी गुणों हैं, और वे पूरी तरह से सभी को अपना एक हिस्सा बना लेते हैं – उनका स्वभाव बिलकुल जीवन जैसा है।

शिवाष्टक स्तोत्र – कालभैरव अष्टकम्


यह अष्टकम् शिव के डरावने पहलू कालभैरव का भजन है, जिन्हें काशी के भगवान के रूप में जाना जाता है। सद्‌गुरु काशी में भैरवी यातना के बारे में बताते हैं, जो एक क्षण में सारे जीवनों के कर्मों को खत्म करने की एक गहन प्रक्रिया है, “कालभैरव शिव का एक घातक रूप है। ऐसा कहा गया है कि इसकी गारंटी है कि अगर आप काशी आते हैं, तो आपको मुक्ती मिल जाएगी, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप अपनी सारी जिंदगी भर किस तरह के घटिया जीव रहे हैं।”

कालभैरव अष्टकम्

देवराज सेव्यमान पावनाङ्घ्रि पङ्कजं
व्यालयज्ञ सूत्रमिन्दु शेखरं कृपाकरम् ।
नारदादि योगिबृन्द वन्दितं दिगम्बरं
काशिकापुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥ 1 ॥

भानुकोटि भास्वरं भवब्धितारकं परं
नीलकण्ठ मीप्सितार्ध दायकं त्रिलोचनम् ।
कालकाल मम्बुजाक्ष मस्तशून्य मक्षरं
काशिकापुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥ 2 ॥

शूलटङ्क पाशदण्ड पाणिमादि कारणं
श्यामकाय मादिदेव मक्षरं निरामयम् ।
भीमविक्रमं प्रभुं विचित्र ताण्डव प्रियं
काशिकापुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥ 3 ॥

भुक्ति मुक्ति दायकं प्रशस्तचारु विग्रहं
भक्तवत्सलं स्थितं समस्तलोक विग्रहम् ।
निक्वणन्-मनोज्ञ हेम किङ्किणी लसत्कटिं
काशिकापुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥ 4 ॥

धर्मसेतु पालकं त्वधर्ममार्ग नाशकं
कर्मपाश मोचकं सुशर्म दायकं विभुम् ।
स्वर्णवर्ण केशपाश शोभिताङ्ग निर्मलं
काशिकापुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥ 5 ॥

रत्न पादुका प्रभाभिराम पादयुग्मकं
नित्य मद्वितीय मिष्ट दैवतं निरञ्जनम् ।
मृत्युदर्प नाशनं करालदंष्ट्र भूषणं
काशिकापुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥ 6 ॥

अट्टहास भिन्न पद्मजाण्डकोश सन्ततिं
दृष्टिपात नष्टपाप जालमुग्र शासनम् ।
अष्टसिद्धि दायकं कपालमालिका धरं
काशिकापुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥ 7 ॥

भूतसङ्घ नायकं विशालकीर्ति दायकं
काशिवासि लोक पुण्यपाप शोधकं विभुम् ।
नीतिमार्ग कोविदं पुरातनं जगत्पतिं
काशिकापुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥ 8 ॥

कालभैरव अष्टकम अर्थ

मैं कालभैरव को प्रणाम करता हूं, जो काशी शहर के स्वामी हैं, जिनके कमल की तरह चरण की देवेंद्र (इंद्र) द्वारा सेवा की जाती है, जो दयालु हैं और अपने माथे पर चंद्रमा पहनते हैं, जो एक सांप को अपने पवित्र धागे के रूप में पहनते हैं, जो दिशाओं को अपने कपड़े के रूप में पहनते हैं। और जो नारद जैसे ऋषियों द्वारा पूजे जाते हैं।

मैं काशी नगरी के स्वामी कालभैरव को प्रणाम करता हूं, जो अरबों सूर्यों की तरह चमकते है, जो हमें जीवन के सागर को पार करने में मदद करते हैं, जो सर्वोच्च हैं और जिनका गला नीला है, जिसकी तीन आंखें हैं और हमारी इच्छाओं को पूरा करते हैं, जो मृत्यु के देवता के लिए मृत्यु हैं, जिनके पास कमल के फूल की तरह आँखें हैं, और जिनके पास अजय त्रिशूल है।

मैं कालभैरव को प्रणाम करता हूं, जो काशी शहर के स्वामी हैं, जिनके पास एक भाला, एक नोक और हथियार के रूप में एक छड़ी है, जो काले रंग का है और जो सृष्टि की शुरुआत का कारण है, जो मृत्युहीन हैं और पहले भगवान हैं, जो क्षय और बीमारी से मुक्त हैं, जो भगवान हैं, जो एक महान नायक हैं, और जो तांडव करते हुए आनंदित होते हैं।

मैं काशी शहर के स्वामी, कालभैरव को नमस्कार करता हूं, जो इच्छाओं को पूरा करते हैं और मोक्ष भी प्रदान करते हैं, जो अपने शानदार चेहरे के लिए जाने जाते हैं, जो शिव का एक रूप हैं, जो अपने भक्तों से प्यार करते हैं, जो पूरी दुनिया के भगवान हैं। जो विभिन्न रूपों को धरते हैं और जिसके पास एक सुनहरा कमर पर पहना जाने वाला गहना है, जिस पर मधुर स्वर करने वाली घंटियाँ बंधी हुई हैं।

मैं कालभैरव को प्रणाम करता हूं, जो काशी शहर के स्वामी हैं, जो जीवन में धर्म के सेतु को बनाए रखते हैं, वे जो उन रास्तों को नष्ट कर देते हैं, जो सही नहीं हैं, वे जो हमें कर्म के बंधनों से बचाते हैं, जिनका शरीर एक सुनहरी रस्सी की वजह से चमकता है, जिस रस्सी से विभिन्न स्थानों पर घंटियां बंधी हैं।

मैं काशी शहर के स्वामी कालभैरव को नमस्कार करता हूं, जिनके पैरों में रत्न जड़ित सैंडल की चमक है। जो शाश्वत हैं, जो हमारे सबसे पसंदीदा भगवान हैं, जो सब कुछ कर देते हैं। जो मृत्यु के भय को दूर कर देते हैं, और जो अपने भयानक दांतों द्वारा उन्हें मोक्ष देते हैं।
मैं कालभैरव को प्रणाम करता हूं, जो काशी शहर के स्वामी हैं, जिनकी तेज गर्जना ब्रह्मा द्वारा बनाई गई सभी चीजों को नष्ट करने के लिए पर्याप्त है, जिनकी दृष्टि सभी गलत कामों को नष्ट करने के लिए पर्याप्त है, जो चतुर और कठोर शासक हैं, जो आठ मनोगत शक्तियों को दे सकते हैं, और जो खोपड़ी की एक माला पहनते हैं।

मैं काशी शहर के स्वामी कालभैरव को नमस्कार करता हूं, जो भूतों के समाज के प्रमुख हैं, जो ज़बरदस्त प्रसिद्धि प्रदान करते हैं, जो वाराणसी में रहने वालों के अच्छे और बुरे का न्याय करने वाले स्वामी है, जो सत्य के मार्ग के एक विशेषज्ञ है, और जो सदा पुरातन है और ब्रह्मांड के स्वामी हैं।

जो लोग कालभैरव पर इस मोहक अष्टक का पाठ करते हैं, जो सनातन ज्ञान का स्रोत है, जो धार्मिक कर्मों के प्रभाव को बढ़ाता है, और जो दु: ख, जुनून, गरीबी, इच्छा और क्रोध को नष्ट करता है, वो निश्चित रूप से कालभैरव की पवित्र उपस्थिति तक पहुंच जाएगा।

शिवाष्टक


यह गीत शिव की विभिन्न विशेषताओं का एक विशिष्ट वर्णन है। वे महान योगी जिन्हें अर्धनारीश्वर (स्वयं के हिस्से के रूप में स्त्री को शामिल करना) के रूप में संदर्भित किया जाता है जो गौर वर्णी शरीर वाले हैं, और जो अपने डमरू पर एक स्थिर ताल को बजाते हैं।