संवाद

धर्म और योग – क्या दोनों एक ही हैं?

ऑस्कर विजेता और हॉलीवुड सुपरस्टार मैथ्यू मैक्कनौगी ने ‘कर्मा: ए योगीज गाइड टू क्राफ्टिंग योर डेस्टिनी’नामक किताब  की ऑनलाइन यात्रा के हिस्से के रूप में सद्‌गुरु से बात की।मैथ्यू ने कई विषयों से जुड़े सवाल पूछे। यहां, हम एक महत्वपूर्ण अंश प्रस्तुत करते हैं जहां सद्‌गुरु आपकी बुद्धि को सोने नहीं देने का रहस्य बताते हैं।

मैथ्यू मैक्कनौगी: आपने कहा कि योग का अर्थ है मिलन। ‘रिलिजन’ (धर्म) शब्द ‘रे’ और ‘लिगेयर’ से आया है। लिगेयर का अर्थ है ‘एक साथ बांधना’ और रे का अर्थ है ‘फिर से’ यानी ‘फिर से एक साथ बांधना’ धर्म की परिभाषा है। तो क्या यह कहना सही होगा कि योग और धर्म एक ही हैं, या कम से कम एक ही दिशा में है?

सद्‌गुरु: उनका सार देखें तो वे एक ही हैं, लेकिन उनके अभ्यास के वर्तमान स्वरूप में नहीं। अमेरिका में जिस तरह से योग का अभ्यास किया जाता है, वह मिलन का पर्याय नहीं है। जिस तरह से धर्म का पालन किया जाता है …

मैथ्यू मैक्कनौगी: दुनिया में जिस तरह से धर्म का पालन किया जाता है, वह धर्म का सही अर्थ भी नहीं है।

सद्‌गुरु: परिभाषा के अनुसार दोनों एक ही हो सकते हैं। लेकिन दुर्भाग्य से, जिस तरह से उनका पालन किया जा रहा है, वह बहुत अलग है।

‘योग क्यों?’ इसलिए कि यह एक विश्वास प्रणाली पर आधारित नहीं है, यह आपके अनुभव पर आधारित है। कम से कम आप जानते हैं कि आप कहाँ जा रहे हैं। एक विश्वास प्रणाली के साथ आप सिर्फ यह मान लेते हैं कि आप किधर और कैसे जा रहे हैं, जो आपको मनोवैज्ञानिक आराम और सांत्वना देता है। तो चुनाव इसके बीच है कि क्या आप अपने जीवन में एकांत की तलाश कर रहे हैं – क्या आप अपने मन को शांत करना चाहते हैं और बस छोटी-छोटी चीजों से खुश रहना चाहते हैं? या फिर आप इस जीवन का समाधान ढूंढ़ रहे हैं?

क्योंकि आप मानव बुद्धि के साथ आए हैं, यदि आप तुरंत अपने आस-पास की छोटी-छोटी बातों में लीन नहीं होते हैं, तो प्रत्येक इंसान के लिए यह सोचना स्वाभाविक है, "यह सब क्या है? मैं कहां से आया हूं? मैं कहाँ जाऊँगा? इस जीवन की प्रक्रिया क्या है? इसका क्या अर्थ है? यहाँ मेरे अस्तित्व का उद्देश्य क्या है? क्या मैं बस आकर गायब हो जाऊंगा, या इसका कुछ मतलब भी है?’

ये ऐसे सवाल हैं जिनसे कोई भी इंसान नहीं बच सकता, बशर्ते कि कोई बहुत छोटी उम्र से आपको यह न बताए कि ‘तुम यह हो, वह हो। तुम स्वर्ग या नरक में जा रहे हो।’ ये सवाल अच्छे हैं, यह भ्रम अच्छा है। लोग ‘मैं नहीं जानता’ के महत्व को नहीं समझते हैं। यह आपके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण चीज़ है। क्योंकि जिस क्षण आप समझते हैं ‘मैं नहीं जानता,’ जानने की लालसा, चाहत या खोज एक स्वाभाविक परिणाम है। एक बार जब खोज तीव्र हो, तो जानना दूर नहीं है।

जीवन के बारे में जो कुछ भी आप जानना चाहते हैं, उसके लिए आपको सूक्ष्मदर्शी या दूरबीन से खोजने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि आप स्वयं जीवन हैं। दुनिया में आपकी एक पहचान हो सकती है, लेकिन बुनियादी रूप से, आप जीवन हैं, और यही एकमात्र जीवन है जिसे आप अनुभव कर सकते हैं। अगर मैं सुंदर पेड़ों को देखता हूँ तो मैं उनका अनुभव केवल अपने भीतर करता हूँ, जैसे मैं उन्हें भीतर महसूस करता हूँ। दूसरा कोई तरीक़ा नहीं है जिससे मैं इन पेड़ों का बाहर अनुभव कर सकूं।

यह हर चीज़ के लिए सच है। सभी अनुभव - दुख और सुख, खुशी और ग़म, पीड़ा और परमानंद केवल आपके भीतर ही घटित हो सकते हैं। जब आपको यह एहसास हो कि ‘मुझे नहीं पता’ और फिर देखना शुरू करें, तो स्वाभाविक रूप से आप इसे समझ जाएंगे। फिर, अपने अस्तित्व की प्रकृति का पता लगाना और अपने भाग्य का कर्ता-धर्ता बनना स्वाभाविक परिणाम है। समस्या यह है कि हम विश्वास प्रणालियों, विचारों, शास्त्रों और विचारधाराओं जैसी चीज़ों से ‘मुझे नहीं पता’ को मार देते हैं।

मुझे लगता है कि आपने रेगिस्तान में यही किया है। मुझे नहीं पता कि आप किस रेगिस्तान में गए थे।

मैथ्यू मैक्कनौगी: मैं सहारा और फिर पश्चिम टेक्सास गया था।

सद्‌गुरु: एक रेगिस्तान में, आप अकेले हैं, और जैसा कि आपने कहा, शुरू में आप भ्रमित थे और संघर्ष कर रहे थे, लेकिन फिर जैसे आपने ध्यान देना शुरू किया… क्योंकि जब आपके पास ध्यान देने के लिए कुछ और नहीं होता है, तब स्वाभाविक है कि आप अपने चलने के तरीक़े पर, शरीर की हर एक मांसपेशी पर, सांस पर, दिल की धड़कन पर ध्यान देने लगते हैं। तब आप यह देखना शुरू कर देंगे कि जिसे आप ‘मैं’ कहते हैं, वह एक संपूर्ण ब्रह्मांड है। एकमात्र ब्रह्मांड और एकमात्र दुनिया जिसे आपने कभी अनुभव किया है वह सिर्फ़ वही है जो आपके भीतर हुआ है। एक बार जब आप इसे महसूस कर लेते हैं, तो आप अपने भीतर की दुनिया को वैसे ही ठीक कर लेते हैं जैसे आप चाहते हैं। बाहरी दुनिया में, हम अपनी तरफ़ से बेहतरीन करते हैं।

मैथ्यू मैककोनाघी: बिलकुल सही। क्या आपको लगता है कि ज्यादातर समय, इसका कारण यह होता है कि हम इसकी तलाश नहीं करते हैं या ‘मुझे नहीं पता’ को महत्व नहीं देते?

सद्‌गुरु: ‘मुझे नहीं पता’ को ज्यादातर नीची नज़र से देखा जाता है।

मैथ्यू मैककोनाघी: ‘मुझे नहीं पता’ एक अंधकार की तरह है। या ऐसा है, ‘ओह, मुझे नहीं पता!’

सद्‌गुरु: मैं इसे स्पष्ट कर दूं –‘मुझे पता है’ एक अंधकार की तरह है। मान लीजिए कि आप गाड़ी चला रहे हैं, आपके पीछे एक ट्रक आ रहा है, और आप इसे आईने में देखते हैं। क्या आप देखते हैं कि ट्रक के पीछे क्या है? आप जानते हैं कि एक ट्रक आ रहा है, लेकिन वह एक ‘ब्लाइंड स्पॉट’ बन जाता है, क्योंकि यह बाकी सब के लिए रास्ता रोक देता है।

आपको लगता है कि ‘मुझे पता है’ - यह आपके दिमाग में एक धब्बा है। यह आपको कुछ और देखने की अनुमति नहीं देता। ‘मैं नहीं जानता’ आपके आस-पास की चीज़ों के बारे में नहीं है। आप और मैं एक दूसरे से यहां इतनी दूर बैठकर बातें कर रहे हैं, एक गोल ग्रह पर, इतनी बड़ी चीज हर समय घूम रही है, और जबरदस्त गति से अंतरिक्ष में भी आगे बढ़ रही है। यह ब्रह्मांड कहां से शुरू होता है और कहां खत्म होता है, यह कोई नहीं जानता।

कहीं विशाल रिक्तता के बीच में, सोलर सिस्टम नामक एक छोटा सा रचनातंत्र, उस पर एक बहुत छोटी पृथ्वी नामक ग्रह, उसमें टेक्सास एक छोटा सा कण है, उसमें ऑस्टिन शहर एक बेहदसूक्ष्म कण जैसा है, उसमें आप हैं एक बड़े आदमी - यही समस्या है। क्योंकि जिस क्षण आप सोचते हैं - ‘मुझे पता है’ -आप अपनी धारणा में बड़े हो जाते हैं। एक बार जब आप बड़े हो जाते हैं, तो अनिवार्य रूप से, आप ख़ुद को मूर्ख बना लेते हैं। इस जीवन में आप इसे महसूस करें या नहीं, जिसके पास देखने के लिए आंखें हैं, वह देखेगा कि यह एक बेहद मूर्ख इंसान है।

मैथ्यू मैककोनाघी: वाह!बहुत बढ़िया। ‘मुझे पता है’ यह एक अंधकार वाला स्थान है। लेकिन दुनिया इसका उल्टा बताती है, कि ‘नहीं, आप जानते हैं।’ ‘आत्म-आश्वासन, आत्मविश्वास - भले ही वह झूठा विश्वास हो - हम उसे अपने नश्वर जीवन में पुरस्कृत करते हैं, धन, नौकरी, नीले रिबन और स्वर्ण पदक जैसी चीज़ो से। लेकिन मुझे आपकी बात बहुत अच्छी लगी। ‘मैं नहीं जानता’ का सहारा लेना उसे ढूंढने के लिए जिसे आप नहीं जानते एक बहादुरी की बात है।

सद्‌गुरु: हाँ। देखिए, अभी, मैं जानता हूँ कि आप मैथ्यू हैं। मैं दूसरा नाम लेने की हिम्मत भी नहीं करूँगा ...

मैथ्यू मैककोनाघी: मैककोनाघी।

सद्‌गुरु: मैककोनाघी।

मैथ्यू मैककोनाघी: ‘मैडोना क्या कहेगी’ के साथ ताल जमता है। [दोनों हंसते हैं]

सद्‌गुरु: मैं जानता हूं कि आप मैथ्यू मैककोनाघी हैं, लेकिन क्या मैं वास्तव में आपको जानता हूँ? मैं नहीं जानता । जब मैं किसी व्यक्ति को देखता हूं, तो मुझे उनके साथ बातचीत करने के लिए जो चीजें पता होनी चाहिए वो शायद मुझे पता हों। लेकिन क्या आप किसी जीवन को पूरी तरह से जानते हैं? आप नहीं जानते। तो, ‘मैं नहीं जानता’ का अर्थ यह नहीं है कि आप अज्ञानी हैं। ‘मुझे नहीं पता’ का सीधा सा मतलब है कि ‘शायद अभी मैं सिर्फ सतह देख रहा हूँ, लेकिन मैं गहराई तक देखने को इच्छुक हूँ।’ लेकिन जिस क्षण मैं कहता हूं, ‘ओह, मुझे पता है कि मैथ्यू क्या हैं, ’वह मेरे दिमाग में बस एक फाइल है,बात ख़त्म।

यह समझना बहुत जरूरी है कि आपके पास कितना भी ज्ञान क्यों न हो, भले ही आपने इस धरती के सभी पुस्तकालयों को पचा लिया हो, फिर भी, आप जो जानते हैं वह इस ब्रह्मांडीय अंतरिक्ष में तुच्छ है। लेकिन हमारी अज्ञानता असीम है। तो, पूरी योग प्रणाली में हम हमेशा अज्ञानता से पहचान रखते हैं। क्योंकि अगर मैं अपने अज्ञान से पहचान रखता हूँ, तो मैं जागूँ या सोया रहूँ, मेरी बुद्धि हमेशा चालू रहती है, यह कभी नहीं सोती है।

जिस क्षण मैं कहता हूँ ‘मुझे पता है,’ मेरी बुद्धि सोने चली जाती है,आलसी हो जाती है। यह अनिवार्य रूप से यह तय करता है कि आपका जीवन कितना खूबसूरत होगा। अपनी बुद्धि को कभी भी यह कहकर सोने न दें कि आप सब कुछ जानते हैं। जो आप नहीं जानते वह अनंत संभावना है। क्या आप इस असीम संभावनाओं को छीन लेना चाहते हैं क्योंकि आप एक किसी बिंदु को जानते हैं?

मैथ्यू मैककोनाघी: ‘मैं नहीं जानता’ अज्ञानता नहीं है, यह एक अंतहीन संभावना है।

सद्‌गुरु: अज्ञानता असीम चीज़ है - ज्ञान बहुत सीमित चीज़ है।