सद्गुरु बताते हैं कि हम एक प्रजाति के तौर पर मूल रूप से अभी भी पूरी तरह विकसित नहीं हो पाए हैं। दुनिया को रूपांतरण की बहुत ज़रूरत है, और इसलिए ‘जागरूक धरती’ का निर्माण बहुत ज़रूरी हो गया है। और यहाँ साधना की भूमिका शुरू होती है। सदगुरु बताते हैं कि कैसे साधना आपके लिए और दुनिया के लिए बदलाव की गति को तेज़ कर सकती है।
प्रश्नकर्ता: सद्गुरु, आप ‘जागरूक धरती’ के निर्माण की बात करते हैं। मैं यह जानने के लिए उत्सुक हूँ कि आख़िर हमारी मानव-जाति की जागरूकता ख़त्म या कम कैसे हो गई?
सद्गुरु: परेशानी यह है कि आप जागरूकता को कोई ठोस चीज या योग्यता समझते हैं। जागरूकता बहुत नाज़ुक है। हो सकता है इस क्षण आप जागरूक हों, अगले पल नहीं। यह बिजली के बल्ब के वोल्टेज की तरह है। जो रोशनी मुझ पर डाली जा रही है, उसकी वोल्टेज नियंत्रित है। जब उन्हें अच्छा वीडियो चाहिए, वो वोल्टेज को एक ख़ास स्तर पर रखते हैं। जब वो मुझे थोड़ा परेशान करना चाहते हैं, वो इसे बढ़ा देते हैं। जब उन्हें लगता है कि मैं अच्छा नहीं दिख रहा हूँ, वो इसे ख़ास प्रभावों के लिए कम कर देते हैं। वोल्टेज यह तय करता है कि रोशनी कितनी होगी। तो वोल्टेज को बढ़ाने की ज़रूरत है।
साधना से आपकी वोल्टेज बढ़ जाती है
आप जो साधना करते हैं - सूर्य क्रिया, शाम्भवी, शक्ति चालन क्रिया और शून्य - यह आपके सिस्टम में बदलाव करके इसकी क्षमता बढ़ाती है। यह कड़ी मेहनत करने जैसा लगता है, लेकिन यह ऊर्जा तंत्र को मजबूत करता है और उसे ज़्यादा वोल्टेज लेने के काबिल बनाता है। अगर आपका ऊर्जा तंत्र विकसित नहीं है, तो कई चीजें बस क्षण भर के लिए होंगी, ठहर नहीं पाएँगी। यही वजह है कि आपको सम्यमा तक लाने के लिए 4 से 5 साधना कार्यक्रम कराना ज़रूरी हो जाता है। उस तैयारी के बिना आपका ऊर्जा तंत्र इस संभावना को बेकार कर देगा।
कार्यक्रम के दौरान एक पल के लिए आप शायद कुछ अनुभव कर सकते हैं, लेकिन ऊर्जा तंत्र में पर्याप्त ढाँचागत शक्ति न होने के कारण, यह तुरंत ग़ायब हो जाएगा। आप में से कई लोगों ने भाव-स्पंदन के दौरान कुछ ऐसे पल महसूस किए होंगे जब आपको लगा कि आपको आत्मज्ञान मिल गया, क्योंकि यह आपको वैसी स्थिति में ले आता है। कई साधकों ने भाव-स्पंदन के बाद अपनी साधना को और भी गहनता से करना शुरू कर दिया क्योंकि इस अनुभव ने उनके भीतर चिंगारी सुलगा दी, और उन्हें महसूस हुआ कि यह एक संभावना है।
अगर आप अपने सिस्टम को ज़्यादा ऊर्जा ग्रहण करने के लिए तैयार करते हैं, तो आप ऊर्जा के स्तर पर आत्म-ज्ञान पा सकते हैं।
साधना आपके सिस्टम को मजबूत करने के लिए है, क्योंकि अगर ज़रूरी तैयारी के बिना वोल्टेज बढ़ा दी जाए तो कुछ जल जाएगा। अगर आप अपने सिस्टम को ज़्यादा ऊर्जा ग्रहण करने के लिए तैयार करते हैं, तो आप ऊर्जा के स्तर पर आत्म-ज्ञान पा सकते हैं, जो कि एक नीचे लटके फल की तरह है, जिसे हासिल करना आसान होता है। आप अपनी ऊर्जा को उस जगह ले जा सकते हैं, जहाँ ऊर्जा के स्तर पर आप कभी भ्रमित नहीं होंगे।
आपके पास तब भी मानसिक समस्याएं रह सकती हैं, भावनात्मक उलझनें, और कार्मिक चीज़ें भी हो सकती हैं, लेकिन ऊर्जा के स्तर पर आप जीवंत होंगे, जो आपको किसी भी तरह के इलाक़े से गुजरने की आज़ादी देगा। इलाक़ा फिर भी नुक़सान पहुँचा सकता है, लेकिन आप उससे गुजर पाएंगे क्योंकि आपके पास एक शक्तिशाली गाड़ी है। नहीं तो आप पहले ही कदम पर दलदल में फँस जाएंगे। इसीलिए पहली कोशिश हमेशा लोगों को ऊर्जा के एक स्तर तक लाने की होती है, जिससे वो बड़ी संभावनाओं के योग्य बन जाएं।
[1] गहन ध्यान और अभ्यास का एक आवासीय कार्यक्रम

इंसानियत पर अभी भी काम चल रहा है
होमो-सेपियन्स यानी मानव-प्रजाति, एक प्रजाति के रूप में अभी भी पूरी तरह विकसित नहीं हुई है। हम अभी भी निर्माण की कोख में हैं। पर्यावरण का बुलबुला एक तरह की कोख है, और इसी तरह सौर मंडल भी। आप इससे निकलकर आकाश में नहीं घूम सकते। भूतकाल में कुछ ऐसे प्राणी रहे हैं जो कहीं और से आए थे और कुछ तो यहीं विकसित हुए, वे जहाँ भी चाहें वहाँ जा सकते थे। खुद आदियोगी में भी मानव होने की कोई निशानी नहीं दिखती है। आज की अंतरिक्ष टेक्नोलॉजी के बिना भी सब जगह जाना उनके लिए संभव था, क्योंकि वो पूरी तरह विकसित हो चुके थे।
अब जब हम इतनी सशक्त प्रजाति हैं, यह बहुत ज़रूरी है कि हम पूर्ण सचेतन होकर काम करें।
यह आपके लिए भी संभव है, लेकिन हो सकता है कि आपका भौतिक शरीर इसके लिए तैयार नहीं हो। भूतकाल में ऐसी कई घटनाएं हुई हैं जिन्हें आज लोग दंतकथाएं कहते हैं। ऐसे लोगों ने जिन्हें अपने बारे में बताने या कहानियाँ बनाने की कोई ज़रूरत नहीं, उन्होंने बताया है कि कैसे वे अपने शरीर को सुरक्षित रख पाए और कैसे वे कहीं और जा पहुँचे। आपने शंकराचार्य, शुक्राचार्य, और कई दूसरे ऋषियों के बारे में सुना होगा जिन्होंने मानवीय सीमाओं के परे यात्रा की। इन सीमाओं के बीच हम बस अचेत अवस्था में रह सकते हैं। लेकिन इंसान के रूप में हमारे पास सचेतन होने की संभावना है। एक बंदर को सचेतन बनाना संभव नहीं है। इसके पास बुद्धिमत्ता है, लेकिन इसके पास इतनी स्थिरता नहीं है कि इसे कभी भी सचेतन बनाया जा सके। इंसान लगभग वहां पहुँच चुका है। अगर वो थोड़ी और कोशिश करे, तो वह अपनी मंज़िल पा लेगा।
कोई पूछ सकता है, ‘सद्गुरु, जागरूक धरती बनाने के लिए इतनी मेहनत क्यों? हम दस लाख सालों तक इंतज़ार क्यों नहीं कर सकते?’ ऐसा भी हो सकता है, लेकिन तब मैं यहाँ नहीं रहूँगा, इसलिए मैं अभी कोशिश कर रहा हूँ। यह दुनिया के लिए बहुत महत्वपूर्ण कदम है। हो सकता है यह पूर्ण रूपांतरण न ला सके, लेकिन कम से कम एक महत्वपूर्ण बदलाव तो शुरू होगा। यही सही समय है, क्योंकि मानव जाति पहले कभी इतनी सशक्त नहीं थी जितनी आज है। मानव जाति ने बहुत से बेहतरीन काम किए हैं, और उन्होंने बहुत ही बुरे काम भी किए हैं। लेकिन अब जब हम इतनी सशक्त प्रजाति हैं, यह बहुत ज़रूरी है कि हम पूर्ण सचेतन होकर काम करें।

हर्षवर्धन श्रृंगला, जो 2023 में भारत की जी-20 अध्यक्षता के चीफ़ कोऑर्डिनेटर हैं, ने 15 अगस्त 2022 को घोषणा की कि जी-20 की कम से कम एक महत्वपूर्ण बैठक ईशा योग केंद्र, कोयम्बटूर में होगी।
हमारे भविष्य को आकार देने में जागरूकता का योगदान
इस साल, भारत के पास G20 की अध्यक्षता है। G20 में 19 मुख्य देश और यूरोपियन यूनियन है, जिन सबकी GDP मिला दें तो पूरी दुनिया की GDP का 84%, और कुल अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का 75% इन देशों में होता है। जनसंख्या की दृष्टि से देखें तो विश्व की दो-तिहाई आबादी इन देशों में रहती है। G20 सम्मेलनों में से एक ईशा योग केंद्र, कोयंबटूर में होगा। आमतौर पर, ऐसे कार्यक्रम सरकारी जगहों या पाँच सितारा होटलों में होते हैं, जहाँ खाना और पेय पदार्थ भरपूर मात्रा में उपलब्ध होते हैं।
G20 सम्मेलनों में से एक ईशा योग केंद्र, कोयंबटूर में होगा।
यह शायद पहली बार है कि यह सम्मेलन एक आध्यात्मिक केंद्र में हो रहा है। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत ने यह मानना शुरू कर दिया है कि हमारी संस्कृति में आध्यात्मिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण है। इस वर्ष उन्होंने G20 के लिए जो विषय चुना है वो है - ‘एक धरती, एक परिवार, एक भविष्य।’ यह चेतना को एक नैतिक सिद्धांत के रूप में पेश करता है, लेकिन यह एक अच्छी शुरुआत है। इन 20 देशों के कुछ प्रतिशत हिस्से की सोच भी अगर एक धरती, एक परिवार, एक भविष्य, की तरफ बढ़ती है, तो जितनी ताकत इन देशों के पास है, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि ये बहुत बड़ा बदलाव ला सकते हैं।
इंसान की चेतना को बढ़ाने के सन्दर्भ में देखें तो सब कुछ ठीक होना शुरू हो गया है। इसे लगातार आगे बढ़ाने के लिए हमें ज़रूरी प्रयास और प्रतिबद्धता दिखाने की ज़रूरत है जिससे हम इस पीढ़ी के लोगों में कम से कम कुछ प्रतिशत बदलाव देख सकें, ख़ास तौर पर एक दूसरे को देखने और अनुभव करने के तरीके में। यह संभव है क्योंकि 2022 में यू ट्यूब में हमारे 3.5 अरब व्यूज हुए हैं, हम देख रहे हैं कि कैसे इस संख्या को बढ़ाने के साथ-साथ इसे उन लोगों के लिए एक आध्यात्मिक प्रक्रिया में भी बदला जाए। अगर एक अरब लोग भी जीवन को एक ख़ास तरीके से समझना और अनुभव करना शुरू कर देते हैं, तो यह दुनिया प्रभावशाली तरीके से बदल सकती है।