जीवन के रहस्य

काशी: इस प्राचीन शहर का ऊर्जा-रूप क्या आज भी अखंड है?

पिछले हज़ार सालों में काशी की पवित्र नगरी को कई बार उजाड़ा गया। लेकिन काशी की ऊर्जा क्या आज भी अखंड है? क्या इसका निर्माण दोबारा किया जा सकता है? काशी में एक सत्संग के दौरान, सद्‌गुरु कुछ अचंभित करने वाली बातें बताते हैं - लोगों के लिए जो महत्वपूर्ण है, जरूरी नहीं कि वो काशी के लिए भी महत्वपूर्ण हो।

प्रश्नकर्ता: नमस्कारम सद्‌गुरु! मेरा प्रश्न काशी के बारे में है। आपने कहा कि काशी का ऊर्जा-शरीर ज़मीन से ऊपर है। पिछली कुछ सदियों में भौतिक नज़रिए से यहाँ जो विनाश हुआ, क्या उससे काशी के ऊर्जा-ढाँचे को भी क्षति पहुंची है? क्या आप काशी का पुनर्निर्माण करेंगे?

मचान और ऊर्जा-ढाँचे के बीच का फर्क

सद्‌गुरु: नहीं, काशी को पुनर्निर्माण की कोई आवश्यकता नहीं है। इसी तरह ध्यानलिंग का भौतिक ढांचा जो आप देखते हैं, दरअसल उसकी कोई ज़रूरत नहीं है। हम उसे हटा सकते थे क्योंकि उसका उपयोग केवल एक मचान के रूप में किया गया था। किसी इमारत को बनाने के लिए मचान का इस्तेमाल किया जाता है। एक बार इमारत तैयार हो जाने के बाद मचान को निकाल लिया जाता है। अगर आप मचान को रहने दें तो इमारत को पूरी तरह से उपयोग में नहीं लाया जा सकता।  मचान की तभी आवश्यकता होती है जब आप ढाँचे को जोड़ रहे हों। एक बार ढांचा जुड़ जाने के बाद आप उसे निकाल सकते हैं। जहाँ तक इमारत का सवाल है, हम मचान को निकाल लेते हैं, वरना ये हमें इमारत को पूरी तरह से इस्तेमाल करने में दिक्कत पैदा करता है। लेकिन इस तरह के ऊर्जा-ढांचे के लिए हम मचान को नहीं निकालते, क्योंकि अधिकतर लोग अपने देखने के बोध के जरिए आगे बढ़ते हैं। वे केवल वहाँ बस बैठकर कुछ अनुभव नहीं कर सकते, बल्कि उन्हें कुछ दिखना चाहिए। उसमें कुछ सांस्कृतिक तत्व, पारम्परिक क्रियाएं होनी चाहिए, वरना यदि वे किसी मंदिर में आएँ और अंदर कुछ न हो तो वे अचंभित हो जाएंगे।

इस तरह के ऊर्जा-ढांचे के लिए हम मचान को नहीं निकालते, क्योंकि अधिकतर लोग अपने देखने के बोध के जरिए आगे बढ़ते हैं।

हम मचान को रहने देते हैं, क्योंकि ज़्यादातर लोगों के लिए सबसे प्रभावशाली इंद्रिय बोध उनकी नज़र का होता है। बाकी चार इन्द्रियों का प्रभाव काफी कम होता है। लेकिन अगर आप खुद को सचमुच ग्रहणशील बना लें, अगर आप योगी बन जाएँ तो सबसे प्रभावशाली इंद्रिय बोध स्पर्श का होता है।

अपने फोकस को बदलकर अपनी अनुभूति को तेज़ करें

जब आप अपनी दृष्टि का उपयोग करते हैं तो आप कई तरह की विकृत छवियाँ ग्रहण करते हैं। लेकिन अगर आप अपनी आँखें बंद करके चीजों को छूते हैं तो जीवन कई तरीक़ों से आपको छूता है। जैसे-जैसे आपकी ऊर्जा की तीव्रता बढ़ती है, आपका अपनी विभिन्न इन्द्रियों को इस्तेमाल करने का अनुपात बदलता है। हो सकता है अभी आपकी दृष्टि का इंद्रिय बोध 65% हो, फिर ये बदलने लगेगा और आपके स्पर्श का इंद्रिय बोध 65-70% हो जाएगा। तब आपको कहीं देखने की जरूरत नहीं होगी। अगर आप अपनी आँखें बंद करेंगे और अपना हाथ आगे बढ़ाएंगे तो आपको पता चल जाएगा कि यहाँ कौन मौजूद है और कौन नहीं।

अब तो मैंने अपनी सूंघने की क्षमता को बहुत हद तक नष्ट कर दिया है, लेकिन मेरे जीवन में एक समय ऐसा था जब अगर मैं किसी हॉल में प्रवेश करूँ तो मुझे पता चल जाता था कि वहाँ कौन है और कौन नहीं है। ऐसा नहीं है कि ये लोगों के किसी ख़ास इत्र की वजह से होता था। मैं अक्सर किसी जंगल में जाने के लिए भी रात का समय चुनता था - कोई टॉर्च की रोशनी नहीं, केवल सूंघकर, किसी जंगली जानवर की तरह।

जानवर अधिकतर अपने जीवन का अनुभव करते हैं। ख़ासक़र मांसाहारी जानवरों में पाँचों इन्द्रियों में से उनकी सूंघने की क्षमता सबसे ताकतवर और महत्वपूर्ण होती है। उनके बाक़ी इंद्रिय बोध उतने अच्छे नहीं होते। यही कारण है कि कुत्तों को अपराधियों और कई तरह की चीजों को ढूंढने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

आप जो देख रहे हैं वो सच्चाई नहीं है

एक योगी अपने देखने पर भरोसा नहीं करता क्योंकि देखना बहुत ही भ्रामक हो सकता है। अगर मैं आपको केवल अपनी आँखों से देखूँ तो मैं सोच सकता हूँ कि, ‘ओह! ये कितना खुश है!’ सारी रिसेप्शनिस्ट और एयर-होस्टेस कितनी खुश दिखाई देती हैं। लेकिन अगर आप अपनी आँखें बंद करके अनुभव करें तो आपको समझ आएगा कि कौन वास्तव में कैसा है। दृष्टि बहुत ही भ्रामक हो सकती है। दुनिया में कोई भी आपको मूर्ख बना सकता है, अगर आप केवल अपनी दृष्टि पर भरोसा करते हैं। कोई चीज जो बहुत शानदार दिखती है, हो सकता है वास्तव में वो इतनी शानदार न हो। क्योंकि जो आप देखते हैं वो केवल एक प्रतिबिम्ब है। उस चित्र को आप जैसे चाहें वैसे पेश कर सकते हैं, जो उस वस्तु के वास्तविक रूप व प्रकृति से अलग होगा।

अगर आप सचमुच किसी चीज का बोध चाहते हैं, तो आप अपनी आँखें बंद कर सकते हैं। हो सकता है आप इसके बारे में जागरूक न हों, लेकिन कही अंदर एक स्वाभाविक बुद्धिमत्ता है जो आपको ये बताती है कि आँखें बंद कर लेने से आप बेहतर देख पाएंगे। आँखें बंद करने का दूसरा कारण ये भी हो सकता है कि आप ध्यान भटकाने वाले दृश्यों को हटाकर अपने विचारों का बेहतर तरीके से विश्लेषण करना चाहते हैं। अगर आपके स्पर्श का इंद्रिय बोध, कुल इंद्रिय बोध का 65-70% हो जाए तो आपको किसी को छूने की जरूरत भी नहीं रह जाएगी, आप बस अपनी मौजूदगी से सारी वस्तुओं की अनुभूति कर पाएंगे।

एक योगी अपने देखने पर भरोसा नहीं करता क्योंकि देखना बहुत ही भ्रामक हो सकता है।

मान लीजिए आप किसी कक्ष में 1000 लोगों के साथ बैठे हैं। कम से कम उनकी सांसें आपको छूती हैं लेकिन आप इसके प्रति जागरूक नहीं हैं। आपके इन्द्रिय बोध के अनुपात को पलटना जीवन के कुछ पहलुओं को समझने के लिए ज़रूरी है - नहीं तो आप जो देखते हैं आपके लिए बस वह उतना ही रह जाता है। यही कारण है कि मचान को हटाया नहीं जाता। वैसे भी जिस ऊर्जा-ढाँचे का निर्माण हो चुका है, वो अखंड रहता है लेकिन हमें अगर मचान हटाना ही है तो इसे शालीनता से किया जाना चाहिए - किसी आक्रमणकारी की तरह नहीं, जिसका उद्देश्य ही सब कुछ नष्ट करना हो। किसी आक्रमणकारी के द्वारा मचान हटाने का कोई मतलब नहीं है।  

हमें मचान वापस लगाना चाहिए लेकिन ये अभी न्यायालय में विचाराधीन है, यह मेरे निर्णय का विषय नहीं है। काशी खुद उस मचान के ऊपर निर्भर नहीं है, लेकिन लोगों की भावनाएं और इसके साथ उनका जुड़ाव उस मचान पर निर्भर करता है। यह उनके लिए वापस रखा जाना चाहिए, लेकिन काशी के लिए यह महत्वपूर्ण नहीं है।

काशी के घाव भरना

पिछले 8 सालों में काशी में जो कुछ भी हुआ है वो किसी चमत्कार से कम नहीं है। पहले आप इसे एक महान स्थान मानते थे लेकिन इसके बावजूद आसपास के लोग और हालत यह पक्का कर देते थे कि आपके लिए यहाँ का अनुभव अच्छा न हो। अब यहाँ के लिए बाक़ायदा एक प्रवेश द्वार है। बेशक कुछ विवाद हैं, कुछ लोगों को समस्या का समाधान नहीं चाहिए। कुछ लोगों के लिए समस्या एक बहुत बड़ा निवेश होता है, जो दूसरों की समस्या को सीढ़ी बनाकर प्रभुत्व में आ जाते हैं। अगर आपने समाधान ढूंढ लिया तो वे अपनी सीढ़ी खो देंगे। मैं उम्मीद करता हूँ कि अदालत की तरफ से कोई समाधान निकलेगा। मुझे लगता है कि वे इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। 

हमारे पास ऐसे ऐतिहासिक दस्तावेज़ हैं जो स्पष्ट रूप से बताते हैं कि इस मंदिर को नष्ट करने के लिए एक लिखित आज्ञापत्र दिया गया था। और जिन लोगों ने इसे नष्ट किया उन्होंने इस आज्ञा का पालन करने की पूरी रिपोर्ट दी कि कैसे वे इसके मलबे  को एक मस्जिद के निर्माण में इस्तेमाल करेंगे। इन ऐतिहसिक दस्तावेज़ों को अब तक संभालकर रखा गया है, इसलिए दरअसल विवाद संपत्ति को लेकर नहीं है। ये मुख्यतः सांप्रदायिक मुद्दों को सुलझाने का प्रश्न है, ये सुनिश्चित करने के लिए कि इससे कोई आग न भड़के।

ये सारे मामले सुलझने चाहिए क्योंकि देश में ऐसे रिसते हुए घाव लंबे समय के लिए मुनासिब नहीं हैं। अब जब लोग इनके प्रति जागरूक हैं तो आप उन्हें दोबारा वैसे ही नहीं सुला सकते जैसे ये पिछली कुछ सदियों से सोते रहे हैं।

आगे बढ़ने के लिए ज़रूरी विवेक

ये सब कहने के बाद, सवाल ये उठता है कि क्या काशी का पुनर्निर्माण होना चाहिए? हमें इस दिशा में सोचने की कोई आवश्यकता नहीं है। आज हम हर चीज़ से ज़्यादा अपने संविधान पर भरोसा करते हैं, तो हर किसी को कानून के मुताबिक चलना चाहिए और बात को ख़त्म करना चाहिए। आप इतिहास नहीं बदल सकते। दुनिया में हर तरफ किसी न किसी रूप में लोगों के ऊपर अत्याचार किये गए हैं। यहाँ ये बहुसंख्यक लोगों के साथ हुआ है। आपको इसे भूलना नहीं चाहिए क्योंकि अगर आप भूल गए तो ये दोबारा आपके साथ हो सकता है। लेकिन इसके साथ-साथ हमें गुजरी हुई बातों को लेकर अपने मन में द्वेषभाव भी नहीं रखना चाहिए।

हमें गुजरी हुई बातों को लेकर अपने मन में द्वेषभाव भी नहीं रखना चाहिए।

आज के समाज का आक्रमणकारियों के साथ कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन दुर्भाग्य से कुछ लोग अभी भी खुद की पहचान आक्रमणकारियों के साथ करते हैं। ऐसे लोगों में अफ़सोस और सुलह की भावना आनी चाहिए, बस ये समस्या समाप्त हो जाएगी। क्योंकि ये सबके जीवन का प्रश्न है, 300-400 सालों पहले हुई घटनाओं को लेकर झगड़ने का कोई मतलब नहीं है। कल का जीवन ख़राब था लेकिन उसे हमें आज और आने वाले कल में नहीं लाना चाहिए। यह जरूरी है कि आज और आनेवाले कल का जीवन सुखद हो। इस विवेक की आवश्यकता है।