प्रश्नकर्ता: नमस्कारम सद्गुरु! मेरे मन में कई सालों से एक ज्वलंत प्रश्न घूम रहा है। मैं समर्पण की कोशिश करता रहा हूँ, लेकिन ये इतना कठिन है ...

ईश्वर के आगे समर्पण करना हमारी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपरा में सामान्य बात है, लेकिन क्या आपने कभी समर्पण के वास्तविक महत्व के बारे में सोचा है? इस लेख में सद्गुरु समर्पण को लेकर बने हुए कुछ भ्रमों को दूर करते हुए बताते हैं कि आपको समर्पण के लिए किस बात पर ध्यान देना चाहिए।
प्रश्नकर्ता: नमस्कारम सद्गुरु! मेरे मन में कई सालों से एक ज्वलंत प्रश्न घूम रहा है। मैं समर्पण की कोशिश करता रहा हूँ, लेकिन ये इतना कठिन है ...
सद्गुरु: समर्पण के बारे में आपकी क्या धारणाएँ हैं? आप किसे समर्पित होना चाहते हैं? यह भारत के लोगों की समस्या है, क्योंकि एक समय था जब यह देश आध्यात्मिक रूप से जीवंत था और करीब-करीब पूरी जनसँख्या किसी न किसी आध्यात्मिक साधना में लीन थी। आज भी लोग उनसे जुड़े शब्दों को जानते हैं, जैसे, ‘कर्म’, ‘प्रारब्ध’, ‘मुक्ति’, ‘मोक्ष’, ‘आत्मा’, ‘परमात्मा’, आदि, लेकिन किसी तरह की आध्यात्मिक साधना नहीं जानते।
आध्यात्मिक साधना का मतलब ऊपर या नीचे देखना, प्रार्थना करना या मंदिर जाना नहीं है। आध्यात्मिकता का मतलब है अपने शारीरिक और मानसिक दायरे से परे कुछ अनुभव करना। ज़्यादातर लोगों का जीवन उनके शरीर और मन तक ही सीमित है। यदि कोई व्यक्ति इसके परे कुछ अनुभव कर रहा है तो उसे अध्यात्म कहेंगे।
अब आप कहते हैं, ‘मैं समर्पण करना चाहता हूँ।’ अगर मैं एक रस्सी लेकर आपको एक कुर्सी से बाँध दूँ, फिर आप कहें कि ‘मैं आकाश में उड़ते एक पक्षी की तरह मुक्त होना चाहता हूँ’, तो ऐसा होना संभव नहीं है। इसके लिए आपको जानना होगा कि रस्सी को कैसे खोलना या काटना है। मुक्ति एक अस्पष्ट और अद्भुत विचार है जो आपको कही नहीं ले जाता। अगर आप ये समझें कि आपको कौन बाँध रहा है और उसे ख़त्म कर सकें, तभी आप बेहतर स्तर पर जा सकते हैं। अगर आप वो सभी चीज़ें जो आपको बांधती हैं, उन्हें ख़त्म करते रहे तो एक दिन सारे बंधन समाप्त हो जाएंगे। तब हम कहते हैं कि आप मुक्त हैं।
आपको समर्पण का विचार इसलिए आया क्योंकि भारतीय परंपरा में अध्यात्म की शब्दावली जनसाधारण की भाषा में थी। लेकिन आज अध्यात्म का अनुभव वाला पहलू खो गया है और केवल शब्दावली रह गई है। इस शब्दावली से आप दूसरों को धोखा दे सकते हैं या नियंत्रित कर सकते हैं लेकिन ये आपके जीवन के लिए समाधान नहीं है। शब्दावली केवल सामाजिक दृष्टि से उपयोगी है, आपके भीतर इसका कोई उपयोग नहीं।
‘मुझे समर्पण करना है, मुझे आत्मज्ञान प्राप्त करना है,’ इस तरह के विचार अपने मन में मत लाइए। इस तरह के विचारों को गंभीरता से लेने वाले लोग अपने जीवन में अक्सर मूर्खतापूर्ण काम करते हैं। ऐसा मत कीजिए। आपकी बुद्धिमत्ता आपके जीवन का सबसे ऊँचा पहलू है। यह दुनिया में एक गंभीर समस्या है कि जब लोगों को ‘प्रेम’ कहना होता है, वे ‘ईश्वरीय प्रेम’ कहते हैं। आपको प्रेम की जरूरत है, आपको कैसे पता कि ईश्वर को भी प्रेम की जरूरत है? हो सकता है वह प्रेम से मुक्त हों।
इसी तरह जब लोग कहना चाहते हैं, ‘आनंद’ वे कहते हैं, ‘ईश्वरीय आनंद।’ जब वे कहना चाहते हैं, ‘शांति’ वे कहते हैं ‘स्वर्गीय शांति।’ लोग ये शब्दावली बिना ये जाने इस्तेमाल करते हैं कि वे खुद के साथ क्या कर रहे हैं। वह हर चीज़ जिसे इंसान करने के लिए सक्षम है, उन्हें स्वर्ग के नाम भेज दिया गया है। आपके मन के लिए ये बहुत महत्वपूर्ण है कि आध्यात्मिक शब्दजाल में फँसकर अपने लिए बेकार का भ्रम पैदा न करे।
खुद से ये मत पूछिए, ‘मैं कैसे समर्पण करूँ?’ स्पष्टतः आप नहीं जानते कि समर्पण किसे कहते हैं, क्योंकि आप अपनी इच्छा से समर्पण नहीं कर सकते। अगर आपकी इच्छा है तो आप समर्पण कैसे कर सकते हैं? अगर आप यहाँ केवल बैठे रहें और कुछ न करें तब आपने समर्पण किया है। क्या आप सांस ले रहे हैं? कई तरह से आपने इस वायुमंडल के बुलबुले के आगे समर्पण किया है। क्या आप कह सकते हैं कि ‘नहीं, मैं सांस नहीं लूंगा, मैं हवा की प्रकृति के आगे समर्पण नहीं करता। मैं बिना सांस लिए केवल यहाँ बैठा रहूँगा।’ क्या यह संभव है?
अगर आप अपने अस्तित्व को ध्यान से देखें तो यह एक गहरा समर्पण है। इन सबके अभाव में एक पल भी जीवित रहना संभव नहीं। हमें नहीं पता कि ये कैसे काम करते हैं पर ये हमारे लिए काम कर रहे हैं। धरती, सूर्य, चन्द्रमा, आकाशगंगा और शून्य आकाश, ये सब हमारे लिए काम कर रहे हैं। क्या आप इन सबको समझ सकते हैं, और इनसे काम करा सकते हैं? ये सब अपने-आप ही चल रहा है।
जीवनयापन ही एकमात्र मुद्दा है और इसको सँभालने के लिए बहुत बुद्धि की जरूरत नहीं। हरेक कीड़ा, पक्षी, पशु अपना जीवनयापन करने की क्षमता रखता है। आपके पास इतना सारा दिमाग है, आपको इसे सँभालना आना चाहिए। समस्या यह नहीं है कि आप अपना जीवनयापन नहीं कर सकते, समस्या यह है कि आपको किसी दूसरे से बेहतर जीवनयापन चाहिए। जीवन तो बस घटित हो रहा है। आपको बस खुद को ठीक तरह से रखना है इस जीवन के उपहार को ग्रहण करने के लिए।