कविता

बारिश के बाद

बैठती है धुंध पहाड़ियों पर 

थम गई हैं कुछ पल को 

बलखाती नदियाँ,

जलते शवों की लपटें 

बना रही हैं आकाश में तरंगें,

स्वर्ग की छांव में विचारमग्न

तट पर खड़ा देखता हूँ अपनी परछाई, 

हे मेरे गुरु, जी लेने दीजिए 

मुझे आज इस तरह

मानो कल मैं रहूँ ही नहीं।

 —एक ईशा ब्रह्मचारी