उत्सव का सही अर्थ
आप कहेंगे, ‘सद्गुरु, क्या आप ये कहना चाह रहे हैं कि हमें नए साल का उत्सव नहीं मनाना चाहिए?’ देखिए, आपको हर चीज़ का उत्सव मनाना चाहिए। लोग सोचते हैं कि उन्हें उत्सव मनाने के लिए बहाना चाहिए। मैं इसकी सराहना करता हूँ, लेकिन मुझे किसी बहाने की ज़रूरत नहीं है। आपके भीतर उत्सव किसी घटना के कारण नहीं होता, बल्कि इसलिए होता है क्योंकि आप उल्लास से छलक रहे होते हैं। जब ये जीवन उल्लासमय बन जाता है तो हर चीज़ उत्सव हो जाती है।
अगर आप नहीं जानते कि अपने अस्तित्व के स्तर पर उल्लासमय और उत्सवपूर्ण कैसे हुआ जाता है तो सारे उत्सव अपनी किसी न किसी चीज को ढँकने की एक कोशिश भर होंगे - चाहे वो चीज आपकी बेचैनी हो, किसी चीज़ के लिए आपका भय हो, किसी के लिए गुस्सा और नफ़रत हो, या किसी चीज़ के लिए आपकी आक्रामकता। इन चीज़ों को दबाने या छिपाने के लिए आप उत्सव मनाने का अभिनय कर रहे हैं।
उत्सव कोई कार्य नहीं है। उत्सव आपके होने का तरीका है। उत्सव किसी ख़ास पल तक सीमित नहीं होता है। ये तो हर समय हो रहा है। जीवन एक उत्सव है। उत्सव का ये मतलब नहीं कि आपको कोई विशेष चीज़ करनी है। सवाल ये है कि क्या आपका जीवन उल्लास से छलक रहा है? लोग पार्टी में जाने को लेकर बहुत उत्साहित रहते हैं – मैं इसकी सराहना करता हूँ, लेकिन अगर आप उन लोगों से एक दिन बाद मिलें तो वे आम तौर पर अच्छी हालत में नहीं होते।
उत्सव कोई कार्य नहीं है। उत्सव आपके होने का तरीका है।
यदि आप दूसरे दिन भी उतने ही उल्लासमय रहना चाहते हैं तो मुझे कहना चाहिए कि आप मेरी तरह 24 घंटे नशे में रहिए - पर ये नशा बाहर नहीं मिलता। ये सिर्फ तभी हो सकता है जब आप खुद ही नशा हों। जीवन सबसे उत्तम नशा है। जीवन एक ही समय पर सबसे ऊँचे दर्जे का नशा और सबसे ऊँचे स्तर की जागरूकता – दोनों है। अगर आप इसे नहीं छू पाते तो आपको ये छोटे-मोटे उत्सव मनाने होंगे।
मान लीजिये कि मैं आपको एक पिन चुभाता हूं - यह आपके बहुत अंदर तक जाएगा, क्योंकि यही दर्द की प्रकृति है। दुर्भाग्य से, अधिकतर लोग पीड़ा की ही गहराई को जानते हैं। नहीं – गहराई ख़ुशी में हो सकती है, आनंद में हो सकती है, प्रेम में हो सकती है, और सबसे बढ़कर शांति में हो सकती है। अगर शांति का एक गहरा भाव आप में स्थापित हो जाए, तो आपको किसी और चीज की जरूरत नहीं होगी। लेकिन अधिकतर लोग सबसे गहन शांति मरने पर ही अनुभव करते हैं।
शंकरन पिल्लई की गड़बड़ गणना
एक बार ऐसा हुआ। शंकरन पिल्लई बीमार हुए और वे डॉक्टर के पास गए। डॉक्टर ने उनसे कहा, ‘आपके पास ज़्यादा से ज़्यादा तीन साल का जीवन शेष है।’
शंकरन पिल्लई ने जाकर अपने दोस्तों से कहा, ‘डॉक्टर ने मुझे बताया है कि मेरे पास जीने के लिए सिर्फ़ तीन साल हैं। मैं क्या करूँ?’
तब उन्होंने कहा, ‘तुम दूसरे डॉक्टर से राय क्यों नहीं लेते?’
तो वे दूसरे डॉक्टर के पास गए। और फिर उन्होंने सोचा ‘केवल दूसरी राय ही क्यों? तीसरी और चौथी राय क्यों नहीं?’ फिर वे दो और डॉक्टरों के पास भी गए। फिर वे बहुत खुश होकर दोस्तों के पास लौटे।
दोस्तों ने पूछा, ‘क्या हुआ? क्या दूसरे डॉक्टर ने कुछ अलग बताया?’
‘नहीं, नहीं, मैं चार अलग-अलग डॉक्टरों के पास गया और हर एक ने मुझे जीने के लिए तीन साल दिए, तो अब मेरे पास 12 साल की ज़िंदगी है!’
देखिए, इस दुनिया में लेन-देन की ज़रूरत है। जहाँ तक ज़रूरत हो, आप लेन-देन कीजिए – अपने लिए, अपने समुदाय के लिए, अपने देश के लिए, या आप जिसके लिए भी काम करते हों उसके लिए। लेकिन ध्यान रखिए कि लेन-देन आपके अस्तित्व की प्रकृति और आपके समय की प्रकृति को तय नहीं करता।
अगर आप समय के गुलाम बन जाते हैं तो आप इस लेन-देन वाली दुनिया के गुलाम बन जाते हैं। आप ये विश्वास करना शुरू कर देते हैं कि आप बहुत सारी चीज़ें ले रहे या दे रहे हैं, आप कुछ पा रहे हैं या खो रहे हैं। नहीं, एकमात्र चीज़ जो आपने पाई है वो है समय, जिसे आप लगातार खो रहे हैं। जब तक आप अपने अस्तित्व के समयहीन आयाम को नहीं छूते यहाँ कुछ भी पाने को नहीं है।
अपने अस्तित्व से पर्दा उठाना
इस सृष्टि में, आप जो भी सोचते हैं, अनुभव करते हैं या लेते-देते हैं उसका कोई अर्थ नही है। दरअसल ये चीजें अपना कोई असर नहीं छोड़तीं। सवाल ये है क्या आपके अस्तित्व से पर्दा उठ पाया है या वो लेन-देन के पर्दे से ढंका हुआ है? अगर आपके अस्तित्व पर से पर्दा उठ गया है तो उसका असर इस सृष्टि पर पड़ेगा। नहीं तो आप जो चाहे पहन सकते हैं, आप जितने चाहें सज-धज सकते हैं, आप दुनिया की सबसे समझदारी वाली बातें कर सकते हैं – ये सब केवल आपकी सामाजिक बकवास के बीच मायने रखते हैं। ये सब बस उसी सीमा तक मायने रखते हैं। आप एक इंसान हैं और समाज का एक हिस्सा हैं, लेकिन उससे भी बढ़कर आप एक जीवन हैं, एक अस्तित्व हैं। उसके बाद ही ये सारे सामाजिक किरदार निभाने हैं।
इस सृष्टि में, आप जो भी सोचते हैं, अनुभव करते हैं या लेते-देते हैं उसका कोई अर्थ नही है। दरअसल ये चीजें अपना कोई असर नहीं छोड़तीं।
तो इस साल हमारे लिए क्या होने वाला है? आपको समझना चाहिए कि इस शरीर के बनने में हालाँकि सबसे आधारभूत आनुवंशिक सामग्री आपके माता–पिता से आती है, लेकिन बाक़ी के पदार्थ आपके खाने से मिलते हैं। ये निर्माण इस कारण हो पाता है क्योंकि आप एक जीवन हैं, क्योंकि आप एक अस्तित्व हैं। ये कैसा बनेगा ये इस बात पर निर्भर करेगा कि आप कैसे हैं। अगर आप अपने अस्तित्व को पर्दे से बाहर ला पाते हैं, तो इस दुनिया में आपका शरीर, आपका मन, आपकी भावनाएं और आपके लेन-देन बहुत हद तक वैसे होंगे जैसा आप चाहते हैं।