
जैसे-जैसे हम जीवन में आगे बढ़ते हैं, हमारा दिमाग आत्मचिंतन और बहुत ज्यादा सोच में उलझने लगता है, जिससे मानसिक और भावनात्मक संघर्ष पैदा होता है। लेकिन कैसा हो अगर एक ऐसा आसान सा हल मिल जाए जो ना केवल ये समस्या दूर करे बल्कि हमारी असली क्षमता को खोजने और जीवन में स्पष्टता हासिल करने में भी मददगार हो?
प्रश्नकर्ता: सद्गुरु, मेरे आत्मचिंतन ने मुझे जीवन में कई बार महत्वपूर्ण नतीजों तक पहुँचाया है, लेकिन मैं ये कैसे जानूं कि कब ये आत्मचिंतन, बहुत अधिक चिंतन या कहें कि टालमटोल में बदल जाता है?
सद्गुरु: आपके नतीजे कोई मायने नहीं रखते, क्योंकि आपकी विचार प्रकिया जीवन नहीं है – ये ऐसी चीज़ है जिसे आप अपने दिमाग में बनाते हैं। मान लीजिए आप गाड़ी चला रहे हैं। सामने देखने के बजाय यदि आप शीशे में पीछे का नजारा ही देखते रहेंगे तो आपको रिवर्स गियर में चलना चाहिए, टॉप गियर में नहीं। इस देश में हम आत्मचिंतन पर विश्वास नहीं करते। अपनी ही गड़बड़ियों का विश्लेषण करते रहने से काम नहीं चलेगा। अगर आप उससे एक दूरी बना लें तभी आप स्पष्ट रूप से उसे समझ पाएँगे कि वो क्या है, और फिर आपको उसके बारे में सोचना नहीं पड़ेगा।
मान लीजिए आपको आज रात को दिल्ली हवाई अड्डे से उड़ना है। आपकी उड़ान का समय हो गया है, लेकिन बहुत ज़्यादा ट्रैफिक जाम लगा हुआ है। आप ट्रैफिक जाम का कैसे अनुभव करते हैं? हो सकता है आप अपनी सपनों की कार में बैठे हों, लेकिन इस समय वह भी अच्छी नहीं लग रही होगी। जैसे-तैसे आप हवाई अड्डे पहुँच जाते हैं और हवाई जहाज में बैठ जाते हैं और वो उड़ान भरता है। एक बार आप ऊपर उठ जाते हैं, और फिर वहाँ से जब नीचे देखते हैं तो पाते हैं कि ट्रैफिक जाम अब भी लगा हुआ है। लेकिन अब वही ट्रैफिक जाम बहुत सुन्दर दिखने लगता है, सफ़ेद और लाल बत्तियों की एक खूबसूरत कतार। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि जब थोड़ी दूरी बन जाती है तब दिक्कत नहीं रहती।
अगर मैं आपसे ये कहूँ कि एक ऊँचे मंच पर चढ़िए-उतरिए और ये पता लगाइए कि ये धरती गोल है या समतल, तो आप इसे समतल ही महसूस करेंगे। ये विवाद कि धरती गोल है या समतल तब सुलझ सका जब हमने महासागरों की यात्रा करनी शुरू की और हम देख सके कि धरती गोल है। फिर हमने उड़ना शुरू कर दिया और तब उसका आकार स्पष्ट हो गया ।
बाद में हम चंद्रमा पर भी पहुँच गए और वहां से नीचे देखा तब ये पूरी तरह स्पष्ट हो गया। एक चीज़ जो इतनी सरल थी, हम उसे धरती पर चलते हुए नहीं देख पा रहे थे। यही शरीर और दिमाग के साथ होता है। योग में हम शरीर और मन को अलग-अलग नहीं देखते। दरअसल हम इसे ‘मन’ इसलिए कहते हैं क्योंकि इसमें कुछ बुद्धिमत्ता और याद्दाश्त होती है। आपके शरीर की हर कोशिका में उससे कहीं ज्यादा याद्दाश्त होती है जितना आपका दिमाग रख सकता है। आपको याद नहीं है कि पांच पीढ़ियों पहले आपकी परदादी की परदादी कैसी दिखती थीं, लेकिन उनकी नाक अभी भी आपके चेहरे पर है। आपको याद नहीं है कि लाखों साल पहले आपके पूर्वज कैसे थे, लेकिन आपकी त्वचा की कोशिकाओं को उनकी त्वचा का रंग याद है। ये बुद्धिमत्ता और याद्दाश्त आपके पूरे शरीर में फैली हुई है।
कम से कम इतना तो आप देख ही रहे हैं कि आपका तंत्रिका तंत्र पूरे शरीर में फैला हुआ है। तो मन एक जगह पर नहीं है। यहाँ एक मन का शरीर है, एक याद्दाश्त का, एक भौतिक शरीर है और एक ऊर्जा शरीर। यदि आप अपने केवल एक ही हिस्से को देखते हैं और लगातार उसमें दखल देने की कोशिश करते रहते हैं बगैर ये जाने कि बाकी चीज़ें कैसे काम करती हैं, तो ये कुछ ऐसा ही होगा मानो आप हैंडब्रेक लगाकर गाड़ी चलाने की कोशिश कर रहे हों। बहुत सारे लोग ये नहीं समझ पाते, वे सोचते हैं कि ऐक्सेलेरेटर ज़्यादा दबाने से गाड़ी आगे बढ़ेगी। यदि आप हैंडब्रेक ऑन रखकर गाड़ी चलाएंगे तो उसमें आग लग सकती है।
अभी बहुत सारे लोग इसी तरह के हैं। उन्होंने स्कूल या कॉलेज जाकर बाहरी जानकारियाँ इकट्ठी कर ली हैं जिससे उनमें थोड़ी सी बुद्धिमत्ता जाग गई है। इससे वे कई तरह की चीज़ें कर रहे हैं, जैसे आत्मचिन्तन। ऐसे विचारों ने इंसान की परेशानियाँ बहुत बढ़ा दी हैं।
जो जानकारी आप इकट्ठी करते हैं वह किस तरह की है और उसको आप किस तरह से तरह प्रॉसेस करते हैं, उसी से तय होती है आपकी मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया। यदि आप इसे किनारे कर दें तो इसका आप पर कोई प्रभाव नहीं होगा। जब आप चाहें तो आप इसका इस्तेमाल कीजिए, जब ज़रूरत न हो, इसे किनारे रख दीजिए। अभी लोग हर समय सोच रहे हैं। मैं आपका अपमान नहीं करना चाहता लेकिन जिसे आप आत्मचिंतन कह रहे हैं वो एक प्रकार का मानसिक दस्त है जो बिना रुके चलता जा रहा है। दरअसल सोचने का मतलब ये होना चाहिए कि पूरी जागरुकता के साथ अपने विचारों का इस्तेमाल कर एक निश्चित दिशा में जाना। अगर यह बस लगातार चलता रह रहा है तो ये मानसिक दस्त है।
इन दोनों के बीच अंतर करना बहुत ज़रूरी है - क्या ये एक जागरुक विचार प्रक्रिया है या ये बस बेतहाशा चलता जा रहा है?
आत्मचिंतन पिछले जीवन में झांकना है। यदि आप युवा हैं और आत्मचिंतन करते हैं तो आप पहले ये महसूस करेंगे कि आप बहुत लंबा जीवन जी चुके हैं। शेक्स्पीयर ने कहा ‘रहूँ या न रहूँ’ - ये एक सबसे बुद्धिमान प्रश्न माना जाता है। अगर आप परम आनंदित हैं तो क्या आप ये सोचेंगे ‘रहूँ या न रहूँ?’ जब आप परेशान होते हैं और जीवन आपके लिए बोझ बन जाता है सिर्फ तभी आप ऐसा सोचते हैं।
आत्मचिन्तन चाहे छोटे पैमाने पर हो या फिर बड़े पैमाने पर, मानसिक रोग का आधार हो सकता है। आप अपने दिमाग के कचरे के डिब्बे में से समाधान ढूँढने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि उसमें केवल वही है जो आपकी पांच इन्द्रियों के ज़रिए आप तक पहुंचा है। आपका कंप्यूटर उस डाटा के परे कुछ नहीं कर सकता जो आपने उसमें भरा है। बिलकुल यही आपके दिमाग के साथ भी है। अगर आप जानते हैं कि डाटा किस तरह का है और सॉफ्टवेयर भी आपने बनाया है तो आप ये भी जानते हैं कि ये क्या कर सकता है और क्या नहीं। अधिक सोचने की और आत्मचिंतन करने की कोई ज़रूरत नहीं है। आपको समझ में स्पष्टता लाने की ज़रूरत है। यदि आप सब कुछ स्पष्ट देख सकते हैं तो आत्मचिंतन की कोई आवश्यकता नहीं है।
हम जीवन को आत्मचिंतन, नैतिकता, मूल्यों, विचार, दर्शन, राय, आदर्श आदि से ठीक करने की कोशिश कर रहे हैं। ज़रूरत इसकी नहीं है। जो ज़रूरी है वो ये है कि ये जीवन सबसे अधिक जिंदादिली के साथ जिया जाए। यदि आप हर समय चमकते रहेंगे तो आप शारीरिक रूप से बढ़िया होंगे, आपकी प्रतिभा निखरेगी और सब कुछ ठीक से हो पाएगा। क्या इसका अर्थ ये है कि इस दुनिया में सब कुछ वैसा होगा जैसा आप चाहते हैं? नहीं। दुनिया में कभी भी 100% वह नहीं होगा जो आप चाहते हैं।
चूँकि आप युवा हैं इसलिए आपमें से अधिकाँश का ये सपना होगा कि आपको जीवन में एक परफ़ेक्ट साथी मिले। मैं आपका सारा रोमांस ख़त्म नहीं करना चाहता, मैं बस आपको ये बता रहा हूँ कि आप बहुत बुरी तरह से निराश होने वाले हैं। अस्तित्व की यही प्रकृति है, इस दुनिया में कोई भी बिलकुल वैसा नहीं हो सकता जैसा आप चाहते हैं। लेकिन एक विकल्प है, आप खुद को वैसा बना सकते हैं जैसा आप चाहते हैं। आपको यही करने की ज़रूरत है।