12000 से भी ज़्यादा लोगों ने योगेश्वर लिंग की प्राण-प्रतिष्ठा के ऐसे सुअवसर को अनुभव करने का सौभाग्य प्राप्त किया, जो जीवन में बिरले ही मिल पाता है। यह प्रतिष्ठा 15 जनवरी 2023 की सुबह संपन्न हुई।
बेंगलुरु के मशहूर ‘नंदी हिल्स’ की पहाड़ियों के बीच में स्थित सद्गुरु सन्निधि में अक्टूबर 2022 में नाग-स्थान को प्रतिष्ठित किया गया था, जिसमें दुनियाभर से 16000 से भी ज्यादा लोगों ने भाग लिया था। 3 घंटे चलने वाली प्रतिष्ठा की इस प्रक्रिया में सब विस्मय और परमानन्द की लहरों में डूब गए थे। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि जब सद्गुरु ने योगेश्वर लिंग प्रतिष्ठा की घोषणा की, तो फिर से हज़ारों की तादाद में लोग उस गूढ़ प्रक्रिया को अनुभव करने के लिए आतुर थे।

साँसें थामकर प्रतीक्षा
सर्दियों की सुबह थी और उस पर ठिठुरन पैदा करने वाली हवा चल रही थी, जिसकी वजह से वहाँ बैठे श्रद्धालुगण अपने शॉल को थोड़ी-थोड़ी देर बाद कुछ और कसकर लपेट लेते। सफ़ेद वस्त्रों में ये श्रद्धालुगण आदियोगी की 112 फ़ीट की भव्य प्रतिमा के सामने पालथी मारकर बैठे थे। आकाश में से उभरता हुआ प्रतिमा का विलक्षण मुख, निहारने वालों को सम्मोहन और विस्मय में बांध रहा था।
जैसे-जैसे श्रद्धालुगण 'योग योग योगेश्वराय' का मंत्रजाप करते जा रहे थे, प्रतिष्ठा का माहौल धीरे-धीरे गहराता जा रहा था। जब सद्गुरु ने प्रवेश किया तब ऐसे लगा मानो समय थम गया हो। वे सहज चाल से कदम रख रहे थे। उनकी आँखें एक अलग ही भाव से भीड़ को निहार रही थीं। लोग इस बात से विस्मित हो रहे होंगे कि वे ऐसा क्या देख पा रहे हैं जो हमारी आँखों से दूर है। उनकी उपस्थिति लोगों को छू लेने वाली थी। जैसे ही उन्होंने अपना आसन ग्रहण किया, एक अद्भुत शांति छा गई।

एक गूढ़ प्रक्रिया की शुरुआत
एक प्रतिभागी ने बाद में साझा करते हुए बताया, ‘वो पहला क्षण जब मैंने देखा कि सद्गुरु पहुंच गए हैं, मेरे शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। मैं समझा नहीं सकता पर वो बहुत शक्तिशाली थी।’
सद्गुरु ने विभिन्न रूपों की प्रतिष्ठा करने के महत्व के बारे में बताया और समझाया कि कैसे कोई प्रतिष्ठित स्थान लोगों के जीवन को शक्तिशाली और उन्नत बनाता है। उसके बाद उन्होंने कुछ ऐसी गहन और शक्तिशाली प्रक्रियाओं की शुरुआत की जिसने कई लोगों को आंसुओं में डुबो दिया। प्रतिभागी जिस स्तर की भागीदारी और अनुशासन के साथ प्रतिष्ठा की क्रियाओं में डूब गए, वो सचमुच भाव-विभोर कर देने वाला था।
सद्गुरु ने प्रतिभागियों को तो आसान निर्देश दिए, लेकिन उन्होंने स्वयं योगेश्वर लिंग की प्रतिष्ठा में विस्तृत क्रियाएं शुरू कर दीं, जिनमें बेल-पत्र, पवित्र विभूति, हल्दी, कुमकुम और 5 मूल तत्व शामिल थे।
इस तरह की गूढ़ प्रक्रिया की शब्दों में व्याख्या करना निरर्थक होगा, किन्तु सद्गुरु जो कुछ कर रहे थे उसकी जटिलता को कोई अनदेखा नहीं कर सकता था। कुछ ऐसे पल भी आते जब ऐसा लगता जैसे सद्गुरु बिलकुल सूख गए हों। इस प्रक्रिया का कुछ ऐसा मूल्य उन्हें चुकाना पड़ रहा था। लेकिन इस कठिन ज़िम्मेदारी और अटूट ध्यान के साथ उन्होंने प्रतिष्ठा को सम्पूर्ण किया। जब सूर्योदय की लालिमा ने आदियोगी के मस्तक को सुशोभित किया, तो ऐसा लग रहा था मानो सूर्य की किरणों के अलावा भी कुछ और है जो आदियोगी के मुख-मंडल की चमक को बढ़ा रहा है।

प्रतिभागियों का अनुभव
एक प्रतिभागी ने कहा, ‘मैं यहाँ कल से उपस्थित हूँ और मैं ये अनुभव कर सकता हूँ कि आदियोगी में कल की अपेक्षा आज क्या बदलाव दिख रहा है। मैं उसे ठीक से तो नहीं बता सकता लेकिन ये कुछ ऐसा है मानो कल मैं जो देख रहा था वह एक प्रतिमा थी और आज वह स्वयं शिव हैं।
प्रतिष्ठा के समापन के बाद सद्गुरु प्रतिभागियों के बीच से चल रहे थे और उनकी उपस्थिति प्रतिभागियों में भावनाओं की लहर पैदा कर रही थी। उस क्षण की गहनता का अनुभव करने के बाद लोगों के ह्रदय कृतज्ञता के भाव से भर गए थे कि वे इस प्रक्रिया में भागीदार बन सके।
दूसरे प्रतिभागी ने अपना अनुभव साझा करते हुए कहा, ‘मुझे लगता है कि इसने मुझे सचमुच बदल दिया है। हो सकता है भविष्य में मैं इस बात का वर्णन कर सकूँ कि यहाँ क्या हुआ, लेकिन अभी के लिए यह एक रहस्य ही है।

112 फ़ीट आदियोगी का अनावरण
जब प्रतिष्ठा संपन्न हुई, स्वयंसेवक तब भी ऊर्जा से लबालब थे। कई प्रतिभागी रुके रहे और उन्होंने संध्या की तैयारियों में अपना योगदान दिया। सूर्यास्त के साथ-साथ 2 लाख से भी ज़्यादा लोग आदियोगी के अनावरण के भव्य समारोह में भाग लेने के लिए पहुंचने लगे।
कर्नाटक के मुख्य मंत्री बसवराज बोम्मई, राज्य स्वास्थ्य मंत्री डॉ. के.सुधाकर और शिक्षा राज्य मंत्री बी.सी.नागेश ने उपस्थित रहकर इस समारोह की शोभा बढ़ाई। उन्होंने इस समारोह के एक मुख्य आकर्षण आदियोगी दिव्य दर्शनम का भी आनंद लिया।
इसके बाद उन्होंने कर्नाटक के प्रचलित लोकनृत्य 'कमसले' और 'डोल्लू कुनीथा' के अलावा 'ठेल्लम' नृत्य का भी आनंद लिया, जो कि केरला का एक पारम्परिक अग्नि नृत्य है।
Saudis and Expats Converge to Hear Sadhguru Speak about Save Soil (12 May)
Sadhguru received a very warm welcome in Riyadh. He addressed an enthusiastic and highly engaged public gathering organized by the Embassy of India, Riyadh, answering questions of all kinds, and of course – talking about Soil.
राधे जग्गी और ईशा संस्कृति ने भरतनाट्यम का अद्भुत प्रदर्शन किया जो ‘मिट्टी बचाओ अभियान’ पर आधारित था। उनकी कला-कौशल का प्रदर्शन सांस थामकर देखने लायक था।
उसके पश्चात् सद्गुरु ने मंच पर आकर इस अभियान के महत्व के ऊपर प्रकाश डाला और बताया कि कैसे ‘मिट्टी बचाओ अभियान’ के सौ दिवसों के दौरान उन्हें जो समर्थन प्राप्त हुआ वो बढ़ता ही जा रहा है। इसके पश्चात् उन्होंने 'नटाली' से परिचय करवाया जो करीब 8000 किमी की साइकिल यात्रा करके इस अभियान के बारे में जागरूकता फ़ैलाने के लिए फ्रांस से बेंगलुरु आई थीं।
इस सम्मोहक संध्या का सारांश पेश करते हुए स्वयं सद्गुरु ने कहा:
#आदियोगी जीवन के प्रति एक जागरूक प्रतिक्रिया के लिए और जागरूक धरती के निर्माण के लिए सारी संभावनाएं भेंट करते हैं। कल का भविष्य उन लोगों का होगा जो विश्व के लिए एक जिम्मेदार और उत्तरदायी समाधान भेंट कर सकेंगे। आपको आनंद और आदियोगी की कृपा प्राप्त हो! स्नेह और आशीर्वाद. -सद्गुरु