सितंबर 2023

यादें

क्या करोगे मुझे बस याद?

या करोगे मुझे आत्मसात?

या फिर जोड़-तोड़कर बनाओगे

कोई छवि अपने ही ढंग की?

मानो कर रहा हो कोशिश कोई

गढ़ने की मुझे

मेरी ही त्वचा की मृत कोशिकाओं से।

झड़ते हैं मुझसे हर दिन

ऐसे मेरे कोटि-कोटि अंश

जो हो सकते हैं पर्याप्त तुम्हारे लिए

अगर हो तुम बस एक संग्राहक।

चला जाऊंगा जब मैं

तब यादें, छवि और आवाज़ें

ला सकती हैं तुम्हारे नयनों में

आंसू - आनंद के या वेदना के।

पर अगर दो तुम अनुमति

तो घुसकर तुम्हारे अंदर 

मैं कर दूँगा ऐसा विध्वंस

कि होगा पहचानना मुश्किल,

क्योंकि मैं कर दूँगा नष्ट

उन समस्त यादों को

जो देती हैं तुम्हें रूप

एक व्यक्ति का जो तुम हो।

यादें नष्ट होंगी - कड़वी भी और मीठी भी

क्योंकि नहीं है मेरा उद्देश्य

तुममें मिठास घोलना,

बेशक न ही बढ़ाना कड़वाहट

बल्कि छोड़ देना तुम्हें

किसी मुद्रित छाप की तरह नहीं

बल्कि एक उपस्थिति की तरह,

जो जीवन है।


इसे शेयर करें