
पिछले कुछ हफ़्तों की गतिविधियों पर एक नज़र
बिबेक देबरॉय भारत के प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति के अध्यक्ष ही नहीं हैं, बल्कि पारम्परिक संस्कृत रचनाओं के अंग्रेज़ी अनुवाद करने वाले एक सफल ग्रंथकार भी हैं। उनकी पुस्तक जो हाल ही में प्रकाशित हुई है – वह है शिव पुराण का अनुवाद, जो 3 खंडों में आई है। उन्होंने इन पुस्तकों को सद्गुरु को समर्पित किया है। वे ईशा योग केंद्र आए और नाग के सान्निध्य में सद्गुरु से भेंट की। इस दौरान शिव के विभिन्न आयामों को एक वर्तमान गुरु के नज़रिए से देखा गया।
इस दिलचस्प बातचीत में सद्गुरु ने शिव के कई आयामों पर प्रकाश डालते हुए शिव से जुड़े प्रतीक चिह्नों, धार्मिक कर्मकांडों और अपने बोध के विस्तार के महत्व के बारे में बताया।
प्रतीक और वास्तविक के अंतर को पहचानने पर ज़ोर डालते हुए सद्गुरु ने यंत्र, तंत्र और मंत्र पर गहरी अंतर्दृष्टि डाली। उन्होंने इस बात की भी चर्चा की कि मानव जाति को मिली हुई शक्तियों के ग़लत इस्तेमाल का भय हमेशा रहता है, अगर वह चेतना द्वारा संचालित नहीं हो। कुछ आध्यात्मिक आयामों को समझने में विज्ञान की सीमाओं के बारे में चेतावनी देते हुए उन्होंने एकमात्र बुद्धि पर भरोसा न करने के बारे में कहा।
आध्यात्मिक साधना के बारे में बताते हुए उन्होंने यह स्पष्ट किया कि इसका अंतिम उद्देश्य एक विशेष स्तर की शांति और स्थिरता तक पहुंचना है। उन्होंने निरंतर साधना की ज़रूरत पर बल देते हुए आध्यात्मिकता की राह में किसी भी तरह के शॉर्टकट से बचने की सलाह दी।
सद्गुरु ने अध्यात्म में आगे बढ़ने के लिए ख़ुद के बारे में मनमोहक विचारों से छुटकारा पाने की आवश्यकता को बताते हुए इस बात का सुझाव दिया कि असाधारण बनने के लिए सबसे पहले ‘अति-साधारण’ बनना बहुत आवश्यक है।
पूर्णिमा की पावन रात्रि पर सद्गुरु ने यंत्र-समारोह में भाग लेने वालों को लिंग भैरवी का प्राण-प्रतिष्ठित रूप प्रदान किया।
सद्गुरु के साथ अगला यंत्र-समारोह ईशा योग केंद्र, कोयंबटूर में 25 से 27 दिसंबर को होगा।
जैसे ही सूरज डूबने लगा, ध्यानलिंग और चंद्रकुंड के बीच शांत स्थान पर दर्शन के लिए सद्गुरु ने अपना आसन ग्रहण किया। दिन की बढ़ती गर्मी से संबंध जोड़ते हुए सद्गुरु ने आने वाले 11-12 महीनों में सौर-ऊर्जा के बढ़ने की बात कहते हुए धरती माँ और उस पर रहने वाले सभी प्राणियों पर इसके होने वाले असर की बात की।
उन्होंने कहा कि बढ़ी हुई सौर-ऊर्जा के प्रति पृथ्वी की प्रतिक्रिया के आधार पर कई तरह के परिणाम सामने आ सकते हैं। उनमें से एक सम्भावना हो सकती है कि तापमान में वृद्धि हो, जबकि ज्वालामुखियों के अधिक फटने से सूर्य की गरमी में कमी हो सकती है और वातावरण में ठंडक भी देखी जा सकती है। सद्गुरु ने इन परिवर्तनों की वजह से मॉनसून के पैटर्न में संभावित बदलाव आने की बात कहते हुए वनस्पतियों को बचाए रखने की बात पर ज़ोर डाला जिससे मरुस्थलीकरण से बचा जा सके।
इन सारे परिवर्तनों से गुज़रते समय सद्गुरु ने सबको अपने शरीर की ज़रूरतों की तरफ ध्यान देने के लिए कहा। आध्यात्मिक खोज में लगे लोग इस सौर-ऊर्जा के झरने को अपने लाभ के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं, बशर्ते वे इसके लिए पहले से तैयार हों। सद्गुरु ने यह भी कहा कि अगर आप जीवन के लिए तैयार हैं तो हर समय सही समय होता है।
भारतीय क्रिकेट टीम के चैंपियन रह चुके वीरेंद्र सहवाग ईशा योग केंद्र में तीसरी बार आए। सद्गुरु से भेंट के बाद उन्होंने सूर्यकुंड में डुबकी लगाई, लिंग भैरवी को पूजा अर्पित की और आसपास के गाँवों के जनजातीय बच्चों को भोजन भी परोसा।
अपनी इस यात्रा के बाद उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफार्म X पर (जिसे पहले ट्विटर के नाम से जाना जाता था) पोस्ट किया, ‘गुरु के साथ यात्रा हुई तेज। ईशा योग केंद्र की तीसरी यात्रा - हर बार पहले से अधिक गहरी अनुभूति। सद्गुरु एक अद्भुत जीवन हैं और हम वास्तव में भाग्यशाली हैं कि इतने महान गुरु का सान्निध्य हमें प्राप्त है। कई आयामों में उन्होंने अविश्वसनीय कार्य किया है, जिनमें से अधिकांश तो लोगों ने नोटिस भी नहीं किया है। बहुत-बहुत आभार सद्गुरु, इतने प्रेम, करुणा और ख़ुद को दूसरों के लिए समर्पित करने की तत्परता के लिए। आपकी कृपा से हम आत्मीयता और अपने भीतर के दैवीय पहलू को जानने का अमूल्य परमानंद प्राप्त कर सकें।’
भारत के 77वें स्वतंत्रता दिवस पर आश्रमवासी, ब्रह्मचारी, स्वयंसेवक और आगंतुक सुबह 7 बजे सद्गुरु के सान्निध्य में झंडा फहराने के लिए एकत्रित हुए।
ईशा संस्कृति और ईशा होम स्कूल के छात्रों ने भारत के समृद्ध और विविधतापूर्ण संस्कृति के सम्मान में राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ की मनमोहक प्रस्तुति पेश की।
शाम के समय आदियोगी को ‘हर घर तिरंगा’ के तहत भारतीय ध्वज के रंगों से प्रकाशित किया गया। इस अवसर पर सद्गुरु ने कहा, ‘आदियोगी सृष्टि के परम एकत्व को दर्शाते हैं।’ इस एकत्व को अपने भीतर अनुभव कर पाने को ही योग कहते हैं। बहुत समय से मानव जाति अपने बीच के अंतर को भेद-भाव का रूप देकर आपसी टकराव में जी रही है। आज समय है जब हम हर उस चीज़ को गले लगाएं जो एक जीवन है और सृष्टि के साथ एकत्व या योग में रहें। इस छोटे से जीवन में यही एक संभावना बेहतर भविष्य के लिए एकमात्र राह है। आदियोगी और योग के रूप में ख़ुशहाली के लिए दी गई उनकी तकनीक, अतीत की बात नहीं, बल्कि भविष्य और भविष्य में इस धरती पर मानव ख़ुशहाली के लिए है।’
भारत के 77वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर ईशा फाउंडेशन ने ‘योग फॉर स्ट्रेस मैनेजमेंट एंड होलिस्टिक वैलनेस’ अभियान का शुभारम्भ किया। यह अभियान भारतीय सेना के दक्षिणी कमांड के साथ मिलकर किया गया है। इस सहभागिता का लक्ष्य 10,000 से भी ज़्यादा सक्रिय ड्यूटी सैनिकों को सप्ताह भर लम्बा पारम्परिक हठ योग कार्यक्रम मुफ्त में प्रदान करना है, जो 9 राज्यों में 23 स्थानों पर कमांड के कार्यक्षेत्र के अंतर्गत तैनात हैं।
सद्गुरु ने समझाया कि ये योग अभ्यास मानसिक संतुलन, स्थिरता और भीतरी ख़ुशहाली के लिए डिज़ाइन किए गए हैं। इस अभियान का शुभारम्भ लेफ्टिनेंट जनरल अजय कुमार सिंह, दक्षिण कमांड के जनरल अफसर कमांडर-इन-चीफ द्वारा किया गया। उन्होंने खासतौर पर सैनिकों द्वारा बढ़ती हुई चुनौतियों का सामना करने के लिए भारत के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मूल से दोबारा जुड़ने के महत्व पर ज़ोर दिया। उन्होंने सद्गुरु को उनके निरंतर दिए जाने वाले प्रोत्साहन के लिए आभार प्रकट किया।