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आखिर हिंदू कौन हैं और क्या है सनातन धर्म की विशेषता?

सद्‌गुरु बता रहे हैं कि हिंदू होने का सही अर्थ क्या है और कैसे इस सभ्यता के सार को पीढ़ियों तक सुरक्षित रखा गया। सबसे गहन शास्त्रीय संगीत, गणित, अध्यात्म और संस्कृति के विविध चित्र हिमालय से हिंद महासागर तक फैली इस भूमि पर जन्मे हैं। आप भी इस सभ्यता के आकर्षण में गोता लगाइए।

प्रश्नकर्ता: नमस्कारम सद्‌गुरु! मेरा प्रश्न यह है कि वास्तव में हिंदुत्ववाद क्या है?

हिन्दू कोई वाद नहीं बल्कि एक सभ्यता है

सद्‌गुरु: हिंदू कोई वाद नहीं है। हिंदू एक भूमि है, जो समय के साथ एक सभ्यता बन गई। राजनीतिक परिस्थितियों और शक्ति संघर्षों के कारण लोग इसे तोड़-मरोड़ सकते हैं, लेकिन वास्तव में हिंदू की जड़ भूमि ही है। वह भूमि जो हिमालय से इंदु सागर या हिंद महासागर के बीच स्थित है, उसे हिंदू कहा जाता है। जो लोग यहाँ रहे वह स्वाभाविक रूप से हिंदू हो गए और यह क्षेत्र हिंदुस्तान के नाम से जाना जाने लगा जिसका अर्थ है हिंदुओं की भूमि।

जब मानव बुद्धि दंड, अपराध बोध और स्वर्ग के लालचों से मुक्त हो जाएगी तो स्वाभाविक रूप से अपनी परम प्रकृति को खोजेगी।

यह सभ्यता किसी एक के विश्वास, सीख या किताब की उपज नहीं है। यहाँ भूगोल, भाषा, जाति, भोजन और संस्कृति की अपार विविधता है। यह सभ्यता, भय, अपराध बोध और लालच से मुक्त मानव की देन है। जब मानव बुद्धि दंड, अपराध बोध और स्वर्ग के लालचों से मुक्त हो जाएगी तो स्वाभाविक रूप से अपनी परम प्रकृति को खोजेगी।

इस खोज में इस सभ्यता ने गणित, खगोल शास्त्र, और संगीत को पाया। यदि आधार में जटिलता की बात करें तो भारतीय शास्त्रीय संगीत जैसा कुछ भी नहीं। इसकी गवाही दुनिया का हर निपुण संगीतकार दे सकता है। जब आधार जटिल हो तो इस पर कुछ भी बनाया जा सकता है, इसकी कोई सीमा नहीं। ऐसे ही यहाँ गणित और खगोल शास्त्र की भी बहुत जटिल समझ है।

विज्ञान और जानने की ललक

इस सभ्यता में हजारों साल पहले भी हम जानते थे कि पृथ्वी गोल है और सूर्य के चारों ओर घूम रही है। हमने कभी यह नहीं माना कि पृथ्वी ब्रह्मांड का केंद्र है। हम इस समझ पर पहुंचे क्योंकि हम खोजी थे, विश्वासी नहीं। यदि आप सच में विज्ञान को मानते हैं तो आपको एक खोजी होना होगा। आप एक विश्वासी होकर वैज्ञानिक नहीं बन सकते, क्योंकि विश्वास का अर्थ है कि आपने ऐसी बातों के बारे में नतीजा निकाल लिया है जिसके बारे में आप कुछ भी नहीं जानते।

इस तलाश में हम गणित, संगीत, खगोल शास्त्र और अध्यात्म - बहुत सारी जादुई और रहस्य से भरी चीजों के बारे में जाना। जैसे-जैसे हमारी खोज और समझ गहरी और बहुत गंभीर हो गई तो हमने ‘कुछ नहीं’ को पाया। जब हमने ‘कुछ नहीं’ को पाया तो हमने उसे शिव कहा। तब हमने जाना कि हर एक चीज का आधार ‘कुछ नहीं’ था। इस ब्रह्मांड का सबसे बड़ा जादू यह है कि हर एक चीज ‘कुछ नहीं’ से आती है और वापस ‘कुछ नहीं’ में चली जाती है। हर एक चीज, आप और मैं, यह ग्रह, यह सौर मंडल, यह आकाशगंगा और यह पूरा ब्रह्मांड मात्र एक अभिव्यक्ति है।

इस ब्रह्मांड का सबसे बड़ा जादू यह है कि हर एक चीज शून्य से आती है और वापस शून्य में चली जाती है।

यह सभ्यता कई तरीकों से खोज की सभ्यता है। सबसे व्यवस्थित और अनुशासित तरीक़ों से लेकर सबसे जंगली तरीकों तक – खोज का कोई भी तरीक़ा वर्जित नहीं है। यहाँ अघोरी, तांत्रिक और दूसरे कई तरह के लोग और कई तरह के मार्ग हैं। महत्वपूर्ण चीज यह है कि आप खोज रहे हैं, और आप जीवन के उस सार को छूना चाहते हैं जो आप हैं।

हम जानते हैं कि जीवन का सार किसी आकाशगंगा के केंद्र में नहीं बल्कि हर जीवन में है। चाहे आप एक पुरुष हों, स्त्री हों, जानवर हों या एक चींटी - जीवन का सार आपके भीतर है। जीवन संभव ही नहीं है – अगर जीवन का स्रोत आपके भीतर धड़कता न रहे।

कर्म और धर्म

आज निश्चित रूप से मानव बुद्धि आज से हजार साल पहले की तुलना में कहीं ज्यादा सक्रिय है। क्योंकि अतीत की तुलना में यह हठधर्मिता और सिद्धांतों से कम प्रभावित है। लोग यह समझने लगे हैं कि जब तक आप अपने जीवन को अच्छी तरह से नहीं सँभालते, यह अच्छे से काम नहीं करेगा। इसका अर्थ है कि वे समझते हैं मेरा जीवन मेरा कर्म है और इसका मतलब है कि वह हिंदू बन गए हैं।

तो हिंदू कोई वाद, धर्म या जीवन का ख़ास तरीका नहीं है। हिंदू एक भूमि है। इस भूमि के कारण लोग हिंदू बने और लोगों के कारण यह सभ्यता हिंदू हो गई। इस सभ्यता के कारण यह देश हिंदुस्तान बन गया। यदि आप अपनी बुद्धि को भय, अपराध बोध, लालच आदि के प्रभाव से मुक्त कर देते हैं तो आप हिंदू बन जाते हैं।

लोग यह समझने लगे हैं कि जब तक आप अपने जीवन को अच्छी तरह से नहीं सँभालते यह अच्छे से काम नहीं करेगा।

हिंदू कोई ख़ास तरह के लोग नहीं है। इसे सनातन धर्म कहा जाता है। सनातन का शाब्दिक अर्थ है ‘शाश्वत,’ और धर्म का अर्थ होता है ‘कानून या नियम।’ तो शाश्वत कानून क्या है? जैसे हम यहाँ बैठे हैं हम सभी अलग-अलग हैं लेकिन अंत में हर कोई मिट्टी में चला जाएगा। चाहे वे आपको जलाएं या गाड़ें।

हर चीज एक ही स्रोत से आ रही है यह आप कब समझेंगे - जब आप मर जाएंगे या अभी? यदि आप इसे अभी समझने के लिए इच्छुक हैं तो आप सनातनी हैं। अगर आप अपनी शाश्वत प्रकृति तक पहुँचने के लिए इच्छुक हैं, तो आप सनातन धर्म यानी शाश्वत कानून के साथ तालमेल में हैं।

आपकी व्यक्तिगत अभिव्यक्ति की बहुत सारी सीमाएं हैं। इससे फर्क नहीं पड़ता कि आप जीवन में क्या बन गए हैं, अगर आप अपनी अभिव्यक्ति से पहचान जोड़े रखेंगे और इसके स्रोत को नहीं खोजेंगे, तो आप पीड़ा में रहेंगे। आप अस्तित्व की आधारभूत और शाश्वत प्रकृति तक नहीं पहुंचे हैं। एक बार जब आप अपने भीतर यह महसूस कर लेते हैं कि आपने इस शरीर को इकट्ठा किया है और आपको इसे त्याग देना है, तो आपकी बुद्धि यह खोजने लगती है कि आख़िर यह सब किसलिए है।

सनातन धर्म की शक्ति

पिछले 1000 साल में इस भूमि और इस पर रहने वाले लोगों ने भारी अत्याचार देखे हैं। फिर भी हमने अपने होने के तरीके को बचाकर रखा। इसकी वजह यह है - इस पूरी सभ्यता को स्वाभाविक तरीक़े से गढ़ा गया था। क्योंकि यह कोई धर्म (रिलिजन) नहीं है, इसलिए यहाँ कोई एक नेता नहीं है, जिसका सर काट देने से सब कुछ बिखर जाए। यहाँ कोई एक सिद्धांत या किताब नहीं है जिसे जला देने से सब कुछ खो जाए।

यह व्यक्तिगत खोज थी। आक्रमणकारियों ने वह सब कुछ किया जो संभव था - उन्होंने यहाँ के सारे नेताओं और धार्मिक गुरुओं को मारा, हजारों मंदिरों को नष्ट किया, लेकिन फिर भी वे सनातन धर्म को मार नहीं सके। क्योंकि यह हर किसी के ह्रदय और मन में था।

आप जानने की स्वाभाविक इच्छा को नहीं मार सकते। जैसा कि मैं कहता रहा हूँ – अगर आप अपने मन को भय, लोभ, अपराध बोध से मुक्त कर देते हैं तो यह जीवन स्वाभाविक रूप से अपनी शाश्वत प्रकृति को खोजने लगता है। यह एकमात्र ऐसी भूमि है जिस पर इतने बाहरी आक्रमण हुए फिर भी इसने अपनी संस्कृति को बहुत हद तक बचाए रखा। आप एक व्यवस्था को नष्ट कर सकते हैं लेकिन एक जानबूझकर और संगठित तरीक़े से फैलाई गई अव्यवस्था को नष्ट नहीं कर सकते।

इस संसार को वास्तव में क्या चाहिए

यदि हम इस संसार में लोगों को भय, अपराध बोध और लालच से मुक्त होने की दिशा में मोड़ दें, तो इस पूरी धरती पर सनातन धर्म अंकुरित हो जाएगा। सनातन धर्म का अर्थ यह नहीं कि हर कोई एक मंत्र का जाप करने लगेगा या पूजा करने लगेगा। बस हर कोई खोजने लगेगा। और बस यही मायने रखता है। हमें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह कैसे खोजते हैं। जब तक वे अपनी शाश्वत प्रकृति और परम संभावना को खोज रहे हैं हम उन्हें सनातनी कहते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि सनातन का अर्थ विशेष लोगों का समूह नहीं है सनातन का अर्थ है शाश्वत प्रकृति।

यदि हम इस संसार में लोगों को भय, अपराध बोध और लालच से मुक्त होने की दिशा में मोड़ दें तो इस पूरी धरती पर सनातन धर्म अंकुरित हो जाएगा।

तो हिंदुत्ववाद क्या है? यहां ऐसी कोई चीज नहीं है - कोई वाद नहीं है। दुर्भाग्य से लोग अपना धंधा चलाने के लिए इसे एक वाद बना रहे हैं। लेकिन मुझे अपने धंधे का भय नहीं है। मैं सिर्फ कायापलट देखना चाहता हूँ। बहुत सारे लोग सोचते हैं कि मैं पर्याप्त रूप से हिंदू नहीं हूँ, लेकिन चूँकि मैं इस भूमि पर जन्मा हूँ तो भौगोलिक रूप से मैं एक हिंदू हूँ। और चूँकि मेरी इच्छा सदैव ही अपनी शाश्वत प्रकृति को जानने की रही है तो मैं एक सनातनी हूँ, इसलिए नहीं कि मैं किसी दर्शन को मानता हूँ।

मैं चाहता हूँ कि हर एक इंसान अपनी परम प्रकृति को जाने, तब हर कोई सनातनी होगा। लेकिन यह मत सोचिए कि उनका धर्म बदला जा रहा है क्योंकि यहाँ बदलने को कुछ है ही नहीं। कोई विचारधारा नहीं, कोई दर्शन नहीं, कोई भगवान नहीं। बात बस इतनी ही है कि जब आपका ध्यान अभिव्यक्ति से उसके स्रोत की ओर बढ़ता है तब आप सनातनी हो जाते हैं।

अभिव्यक्तियों से स्रोत की ओर

अभिव्यक्तियां क्षणिक हैं। यह पद चिह्न की तरह हैं - आज है कल नहीं। लेकिन स्रोत हमेशा है। एक बार आपकी पसंद शरीर से स्रोत की ओर चली जाती है, तो आप सनातनी बन जाते हैं। आप एक शाश्वत प्रकृति को खोज रहे हैं। ऐसा पूरी दुनिया के साथ होना चाहिए। एक धर्म की तरह नहीं, एक दर्शन की तरह नहीं, बल्कि जानने की स्वाभाविक इच्छा के रूप में, कि जो भी अभी प्रकट है उसके परे क्या है।

अभिव्यक्तियां कई हैं और वह कमाल की हैं। लेकिन जब आप इन अभिव्यक्तियों से पहचान जोड़ लेते हैं, तो आप बहुत छोटे हो जाते हैं। इतने छोटे कि कई इंसान तो दूसरे जीवन रूपों को जीवन की तरह भी नहीं समझते। सनातनी होने का अर्थ किसी के जीवविज्ञान (बायोलॉजी) या मनोविज्ञान को अनदेखा करना नहीं है। हम इससे दूर नहीं जाना चाहते, हम इससे ऊपर उठना चाहते हैं, ताकि हम अपने जीवविज्ञान (बायोलॉजी) या मनोविज्ञान को जैसे चाहें वैसे इस्तेमाल कर सकें।

अभिव्यक्तियां क्षणिक हैं। यह पद चिह्न की तरह हैं - आज है कल नहीं। लेकिन स्रोत हमेशा है।

अभी बहुत सारे लोगों के लिए उनका सारा समय उनकी जैविक (बायोलॉजिकल) और मानसिक जरूरतों में ही खर्च हो जाता है। सनातन का अर्थ सारी अभिव्यक्तियों से ऊपर हो जाना है। आपकी सबसे बड़ी बाधाएं आपका ख़ुद का शरीर और आपका अपना मन है। यदि हम आपको ब्रह्मांड की सबसे पवित्र जगह ले जाएं और वहाँ सीढ़ियां हो लेकिन आप यह समझें कि वह सीढ़ियां रुकावटें हैं, तो यह एक त्रासदी होगी। अधिकांश लोगों के साथ यही हुआ है।

यह शरीर, यह मन, यह दिमागी क्षमता, भावनाएं, ऊर्जा, आपके भीतर के रसायन – ये सभी आगे बढ़ने के लिए सीढ़ियां हैं। लेकिन अभी आप इन्हें अपने जीवन में बाधाओं की तरह देख रहे हैं। चाहे आप इसे धर्म कहें, परिवार कहें, शादी कहें या और कुछ। ये सारे पहलू सीढ़ियों की तरह होने चाहिए जो आपको चढ़कर परे जाने में मदद करें। लेकिन दुर्भाग्य से ये सब रेतीले टीले बन गए हैं, जो आपके पाँवों को फँसा रहे हैं। एक बार जब आप अपने शरीर और मन को सीढ़ी की तरह बनाकर उसके ऊपर खड़े हो जाते हैं तो आप सनातनी हो जाते हैं।