जीवन के प्रश्न

क्या समाज से यौन उत्पीड़न को कभी ख़त्म किया जा सकता है?

विचार करने पर मजबूर कर देने वाले इस आलेख में सद्‌गुरु यौन उत्पीड़न की समस्या को सम्बोधित करते हुए इस बात पर संकेत करते हैं कि अंततः सारी  समस्याएं जिनका सामना आज मानव जाति कर रही है वे मूलतः चेतना के अभाव से निकलती हैं। अपना अद्भुत दृष्टिकोण साझा करते हुए वे बताते हैं कि हम आधुनिक तकनीकों का उपयोग पूरे विश्व में चेतना के विकास के लिए कर सकते हैं, ताकि हर तरह का उत्पीड़न ख़त्म हो। दरअसल मानव जाति के पास ये जिम्मेदारी है कि वह ऐसा वातावरण तैयार करे जहाँ प्रत्येक जीवन फल-फूल सके।

प्रश्न: जब हम बड़े हो रहे थे, उन दिनों मैंने अपने मित्र का उत्पीड़न होते देखा है और इसके गहरे प्रभाव को भी मैं समझती हूँ। आपको क्या लगता है कि क्या करने से हम अपने बच्चों को यौन उत्पीड़न से बचा सकते हैं?

सद्‌गुरु: हज़ारों सालों से हम यौन उत्पीड़न की समस्या से जूझ रहे हैं लेकिन इसको समाप्त नहीं कर पा रहे हैं, चाहे वह किसी लड़की का हो या लड़के का, महिला का हो या फिर पुरुष का। हम कानून और सामाजिक व्यवस्था में सुधार के ज़रिए कुछ हद तक इसको सँभाल सकते हैं, लेकिन कोई भी समाज इससे पूरी तरह निजात नहीं पा सका है। भारत में यौन शोषण की समस्या को अक्सर दूसरे देशों के मुक़ाबले ज़्यादा बढ़ा-चढ़ाकर बताया जाता है।  

आंकड़े बताते हैं कि यदि हम प्रतिशत देखें तो यौन शोषण की घटनाएं भारत में कम हैं। लेकिन जनसंख्या अधिक होने की वजह से संख्या बड़ी हो जाती है। तो ये किसी एक समाज या एक देश के बारे में नहीं है। दुर्भाग्य से यह पूरे विश्व की मानव समस्या है।  

इसका उपाय है – मानव जाति को अधिक सचेतन बनाना, ताकि वह अपनी ज़रूरतों और मजबूरियों को बाध्यतापूर्ण तरीके से नहीं बल्कि सचेतन होकर सँभाले। एक सचेतन दुनिया बनाना बहुत कठिन दिखाई दे सकता है लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। एक जागरूक मानव सभ्यता बनाने का सुअवसर, अगर अब तक कभी आया है तो वह आज है। पुराने ज़माने में कई महान व्यक्ति आए लेकिन जब उन्होंने कुछ कहा तो केवल कुछ लोग ही सुन सके। बेशक वे कितने ही महान क्यों न रहे, लेकिन उनके पास एक माइक्रोफोन भी नहीं था। जब कृष्ण ने कुछ कहा, केवल अर्जुन सुन सके।

एक जागरूक मानव सभ्यता बनाने का सुअवसर, अगर अब तक कभी आया है तो वह आज है।

आज तकनीकी विकास की वजह से हमारे पास सुविधा है कि हम यहाँ बैठे-बैठे पूरी दुनिया से बात कर सकते हैं। ऐसे ज़माने में जब हमारे पास पूरी मानव सभ्यता को सम्बोधित करने की ताकत है, फिर भी अगर हम इसे न करें तो इसका केवल यही मतलब है कि हमारे दिलों में पर्याप्त प्रेम नहीं है। हमें इस अवसर का उपयोग मानव जाति को रूपांतरित करने में करना चाहिए जिससे केवल यौन उत्पीड़न ही नहीं बल्कि वे सभी प्रकार के उत्पीड़न ख़त्म हो सकें जो मनुष्य इस धरती के प्रत्येक प्राणी के ऊपर करता है, जिसमे वह ख़ुद भी शामिल है।  

हम अपनी तरफ से जो सबसे बेहतर कर सकते हैं, कर रहे हैं। अगर आप इसका हिस्सा बनना चाहते हैं तो आप भी जो सबसे बेहतर कर सकते हैं, ज़रूर कीजिए। ‘जागरूक धरती’ अभियान इसी के बारे में है। हम मानसिक स्वास्थ्य को केंद्र बिंदु बना रहे हैं क्योंकि जब तक लोग समस्या को नहीं समझेंगे, वे समाधान को भी नहीं समझ पाएँगे। इसलिए हम एक तरह की समस्या पर प्रकाश डाल रहे हैं। 

शारीरिक स्तर की यौन जरूरतों को आसानी से सँभाला जा सकता है लेकिन यह तो लोगों के दिमाग में घुसा हुआ है जिससे चीज़ें काबू से बाहर हो जाती हैं।

यौन शोषण आपकी क्षमता पर एक सवाल है कि आपमें अपनी शक्तियों को जागरूकता से इस्तेमाल करने की क़ाबिलियत है या नहीं। कुछ लोगों ने कामुकता को बुराई का लेबल दे दिया है जबकि कुछ लोग खुलेआम इसके पीछे पड़े हैं। लेकिन यह आपका केवल एक स्वाभाविक हिस्सा है।  

क्योंकि इसे बुराई बना दिया गया इसलिए लोगों के मन में यह बहुत बड़ा हौवा बन गया। जब  कामुकता प्रजनन अंगों में न होकर दिमाग में हो तो ये गलत जगह पर है। जब ये गलत जगह पर हो तो कई तरह के विकार पैदा होंगे, जिसकी वजह से बाध्यकारी परिस्थितियां पैदा होंगी।

शारीरिक स्तर की यौन जरूरतों को आसानी से सँभाला जा सकता है लेकिन यह तो लोगों के दिमाग में घुसा हुआ है जिससे चीज़ें काबू से बाहर हो जाती हैं। अगर इंसान सचेतन होता वह हर चीज़ को उसकी सही जगह पर रखता। हमें एक अधिक जागरूक मानव जाति की जरूरत है। पहले कभी इससे बेहतर अवसर नहीं आया था जब एक जागरूक धरती बनाने की कोशिश भी की जाए। तो आइए इसे हम सब मिलकर संभव बनाएँ।