
सद्गुरु अपने अकाट्य तर्कों के ज़रिए बता रहे हैं कि कैसे पूर्वी सभ्यता सृष्टि के जीवनदायी तत्वों का सम्मान करती रही है। कावेरी नदी से उनका व्यक्तिगत रिश्ता और आगे बढ़ते हुए ‘कावेरी कॉलिंग’ अभियान के लक्ष्यों को स्पष्ट करता यह आलेख आपको एक नया नज़रिया दे रहा है।
प्रश्न: जब मैंने कावेरी के किनारे होते हुए डेल्टा तक की यात्रा की, तब मैंने नदी के आसपास कई मंदिर, तीर्थस्थल और अनुष्ठान देखे। क्या आप कावेरी को एक देवी के रूप में देखते हैं, और इस दृष्टिकोण ने कावेरी कॉलिंग अभियान में आपके काम को कैसे प्रभावित किया है?
सद्गुरु: अगर आप कावेरी के किनारे बसे हुए हैं और आपने कभी सूखा देखा है, जब नदी में पानी बहुत कम हो जाता है, तो आपने खाने की चीजों और पानी की कमी का सामना किया होगा। सोचिए कि अगर ऐसे हालात की वजह से आप अपने बच्चों को खो दें, तो अगले साल जब कावेरी दोबारा अपने प्रवाह में बहेगी तो आप उसकी पूजा करेंगे या नहीं?
देवी-देवताओं की अवधारणा को समझने के लिए इसे एक दूसरे नज़रिए से देखना ज़रूरी है। पूर्वी सभ्यता में कोई एक देवी या देवता नहीं है बल्कि वह सब जो जीवन के लिए सहायक है, पूजनीय है। उदाहरण के लिए भोजन को अन्नलक्ष्मी, पेड़ों को वनश्री, गायों को कामधेनु कहा जाता है, क्योंकि ये सभी हमारे जीवन को पोषण देते हैं। जल और वायु को भी भगवान का दर्जा दिया गया है।
ये बातें कुछ लोगों को मूर्खतापूर्ण लग सकती हैं, और वे तर्क दे सकते हैं कि ईश्वर केवल एक है? आप कैसे इतने सारे भगवान बना सकते हैं? फिर यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि एक ईश्वर की अवधारणा इंसानों द्वारा विकसित की गई थी। दूसरी ओर, जल, वायु और मिट्टी इंसान द्वारा नहीं बनाए गए हैं, लेकिन हमारा अस्तित्व उन पर निर्भर करता है। अतीत में लोग जानते थे कि उनका अस्तित्व नदी पर निर्भर है, इसलिए वे नदी को देवी के रूप में पूजते थे। ये एक बहुत ही सुंदर नज़रिया है।
बढ़ती हुई आबादी का दबाव, सरकारी नीतियों, आधुनिक खेती और कुछ ऐतिहासिक समस्याओं की वजह से देश में कई स्तरों पर पतन हुआ है। मेरा बचपन कावेरी नदी के आसपास गुजरा है। हालाँकि मैंने उसे देवी के रूप में कभी नहीं देखा, लेकिन करीब 4 साल तक रोज मैं कावेरी नदी में तैरता था। एक बार तो मैं कावेरी नदी में राफ्टिंग करते हुए नदी जहाँ से शुरू होती है, वहाँ से मैसूरु के पास तक पहुंच गया, जहाँ नदी पर बने एक बड़े बाँध ने मेरी यात्रा को रोक दिया।
मेरा कावेरी के साथ एक बहुत ही ख़ास रिश्ता रहा है। भारत में हज़ारों महिलाओं का नाम कावेरी होता है। जब मैंने ‘कावेरी कालिंग’ अभियान शुरू किया तो मैंने हरेक गाँव में हर किसी को ये सलाह दी कि अगर किसी के यहाँ इस साल किसी लड़की का जन्म होता है तो उसका नाम 'कावेरी' रखा जाए। ऐसा इसलिए क्योंकि किसी की रक्षा करने के लिए उसके प्रति भावुक होना ज़रूरी है। इंसान हर उस चीज़ की रक्षा करता है जिसके साथ वो भावनात्मक रूप से जुड़ा होता है, नहीं तो जिससे उनका कोई मतलब नहीं होता, उसको लेकर वे बहुत लापरवाह होते हैं। जैसे कोई इंसान अपने बच्चे या जीवनसाथी की देखभाल अपने मोह और लगाव की वजह से ही करता है।
अगर कोई भावनात्मक लगाव नहीं है और जल को केवल एक संसाधन के रूप में देखा जाए तो उसके इस्तेमाल में लापरवाही बरती जाती है। यही रवैया आज के आधुनिक युग में देखा जा रहा है। मिट्टी और जल जीवन निर्माण करने वाले तत्व हैं। हमारे पूर्वजों ने इस बात को समझा। दक्षिण के महान ऋषि अगस्त्य मुनि अपनी ऊर्जा नदी के ठीक बीच में छोड़कर गए।
करीब 6000 साल पहले, नदी के मध्य-बिंदु के आसपास एक मंदिर (इरोड के पास कावेरी नदी के एक द्वीप पर नट्टात्रेश्वर मंदिर) बनाया गया था। इन नदियों के लिए भविष्य में कुछ ख़तरों का अनुमान देखकर एक दूरदर्शी सोच के साथ इस मंदिर को बनाया गया था। इसका अनुमान भी उन्होंने तब लगा लिया था जबकि दक्षिण भारत में घने वर्षावन थे। इस मंदिर में कई तरह के अनुष्ठान स्थापित किए गए, जो नदी के जल-स्तर पर निर्भर करते थे। इसका उद्देश्य यह था कि लोगों के मन में नदी के प्रति जागरूकता बनी रहे जो कि समय के साथ धीरे-धीरे ख़त्म हो गई है।
अब कावेरी गर्मियों में करीब 175 किमी के बाद ज़मीन पर ही सूख जाती है। यह हालत क़रीब चार से साढ़े चार महीने तक रहती है। इस डेल्टा क्षेत्र के किसान किसी समय अपनी ज़मीन पर इतना गर्व महसूस करते थे कि वे इसकी तुलना सोने से करते थे। लेकिन आज वे यहाँ साल में केवल एक फसल ही उगा पाते हैं। किसी समय वे यहाँ एक साल में 4 फसल उगाते थे। इसका नतीजा यह हुआ है कि ये किसान जो एक समय में इस इलाक़े के संपन्न लोगों में गिने जाते थे, आज कई मुश्किलों से जूझ रहे हैं।
साढ़े चार महीने तक यहाँ कोई डेल्टा नहीं होता, कोई नदी नहीं होती। तो आख़िर डेल्टा किधर चला जाता है? रेत-माफिया रेत निकाल ले जाते हैं, इसके साथ ही वे उपजाऊ जलोढ मिट्टी को भी ले जाते हैं जिसका पूरी सभ्यता के विकास में योगदान था। लगभग 12 हज़ार साल पहले कावेरी डेल्टा पॉइंट पर एक बंदरगाह हुआ करता था जहाँ व्यापारियों के जहाज रुका करते थे। इस क्षेत्र की सारी समृद्धि कावेरी द्वारा लोगों के जीवन में लाई गई चीज़ों का नतीजा थी। इसीलिए कावेरी को देवी का दर्जा दिया गया जो संपन्नता, ख़ुशहाली और कल्याण लाती है।
क्या मैं भी इसे इसी रूप में देखता हूँ? मैं उस सांचे में नहीं ढला हूँ। मैं जानता हूँ कि चीजों की कद्र कैसे की जानी चाहिए। मुझे उन्हें देवी या देवता के स्तर तक उठाने की जरूरत नहीं है। मैं जानता हूँ कि आपके पास जो सबसे अमूल्य वस्तु है वह आपका जीवन है, न कि भगवान। तो मैं उस हरेक चीज को, जो मेरे जीवन को गढ़ती है, उसे पवित्र मानता हूँ। अगर आप उसे देवी-देवता के रूप में देखना चाहते हैं तो बिलकुल ठीक है, लेकिन मेरा मन उस तरह से काम नहीं करता। फिर भी मैं इस बात की सराहना करता हूँ कि लोगों के मन में नदी के प्रति इतनी गहरी भावनाएं हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि इन भावनाओं के अभाव में हो सकता है वे अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए इस नदी को तबाह कर दें। दुर्भाग्य से ये बर्बादी काफ़ी हद तक हो चुकी है।
इस वर्ष, कावेरी कॉलिंग का लक्ष्य पूरे तमिलनाडु में 1 करोड़ 10 लाख पौधे लगाने का है। यह कोई वनरोपण कार्य नहीं है, बल्कि यह पेड़ों पर आधारित खेती है। कावेरी कॉलिंग की सफलता को देखते हुए केंद्र सरकार ने 13 नदी-घाटियों की एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की है। कावेरी नदी-घाटी करीब 83,000 वर्ग किलोमीटर में फैली हुई है और 52 लाख किसानों को शामिल करती है जिनके साथ हम करीब से जुड़कर काम कर रहे हैं। ये अभियान किसी राज्य में बहुत प्रगति पर है, कहीं थोड़ा धीमा है, इसके प्रोत्साहन के लिए कई नियम लागू किये गए हैं जिनमें किसानों के लिए वृक्षों की बढ़त पर आधारित सब्सिडी भी है।
यह तरीका बहुत बढ़िया काम कर रहा है लेकिन इसकी प्रगति की रफ़्तार से मैं संतुष्ट नहीं हूँ। लक्ष्य केवल 250 लाख वृक्ष नहीं बल्कि 242 करोड़ वृक्ष होना चाहिए। अगर हम अपने जीवनकाल में कुछ ठोस बदलाव देखना चाहते हैं तो हमें इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य को अगले 6-8 वर्षों में हासिल करना होगा। अगर हम इसे हासिल कर पाते हैं तो अगले 15-20 वर्षों में हम नदी के स्वास्थ्य में स्पष्ट बदलाव देख पाएंगे। दुर्भाग्य से प्रगति की रफ़्तार धीमी है क्योंकि लोग आज भी यह समझने में चूक रहे हैं कि नदी के सूख जाने का हमारे और धरती के प्रत्येक प्राणी के जीवन पर क्या असर होगा।
जब हमने इस प्रोजेक्ट को सैंपल के तौर पर UNCCD के सामने रखा जो हमारे भागीदार भी हैं, तो उन्होंने टिप्पणी करते हुए कहा, ‘यह कोई सैंपल नहीं है। इस समय यह धरती का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट है।’ उन्हें लगता है कि ये सबसे बड़ा प्रोजेक्ट है लेकिन मुझे लगता है कि ये काफ़ी नहीं है। मैं कोई भी कार्य अपनी संतुष्टि के लिए नहीं करता हूँ। अगर मैं अपनी आँखें बंद कर लूँ तो मैं इस सारे संसार से निर्लिप्त हूँ। जब तक ये समस्या का हल नहीं हो, मुझे इसमें शामिल होने में कोई दिलचस्पी नहीं है।
क्या हम समाधान ला सकते हैं? समाधान मिल सकता है, परिस्थितियां बेहतर हो सकती हैं। सुधार हो भी रहे हैं लेकिन इसकी गति धीमी है। इसका मतलब है कि इससे पहले कि हम बदलाव देखें, एक पीढ़ी को कठिन समस्याओं से गुजरना होगा। मैं इसे एक समझदारी भरा रास्ता नहीं मानता। इंसान का तरीक़ा समस्याओं का पूर्वानुमान लगाकर उनसे बचने का होना चाहिए, न कि समस्याओं से घिरने के बाद उससे उबरने का। दुर्भाग्य से हमारी मौजूदा रफ़्तार देखकर यही लगता है कि हम समस्या से बचने की नहीं, घिरने के बाद उससे उबरने की तैयारी कर रहे हैं। अब हमारा लक्ष्य है इस रफ़्तार को बढ़ाना जिसके लिए चारों ओर से समर्थन की ज़रूरत है।
इस देश के इतिहास में यह देखा गया है कि जब कोई ऋषि कुछ सुझाव देता था तो राजा उसे अपनी पूरी क्षमता से कार्यान्वित कराता था जिसके फलस्वरूप तेज़ गति से काम पूरा होता था। मैं राजतन्त्र में वापस जाने का सुझाव नहीं दे रहा हूँ, लेकिन हमारे गणतंत्र को थोड़ा विवेकपूर्ण होने की बात कर रहा हूँ। दक्षिण के कई मंदिर इसलिए बनाए गए क्योंकि उस समय के ऋषि समझते थे कि लंबे समय तक किसी वस्तु को तब तक बचाया नहीं जा सकता जब तक कि उसके साथ भावनात्मक लगाव पैदा न किया जाए। आखिरकार आप उन्ही वस्तुओं की परवाह करेंगे जिनके साथ आप मजबूत भावनात्मक सम्बन्ध रखते हों।
जब कोई भावनात्मक रिश्ता न हो तो आप आज किसी चीज़ की परवाह कर भी लेंगे तो हो सकता है कल उसे छोड़ दें। केवल वही चीजें आपके साथ आजीवन रहती हैं जिनके साथ आपका भावनात्मक सम्बन्ध हो। इसलिए उन्होंने लोगों के मन में इसके लिए गहरे भावनात्मक सम्बन्ध बनाने पर काम किया। लेकिन अब क्या हम इन भावनाओं में निवेश कर रहे हैं? हम नहीं कर रहे हैं। मैं ये नहीं कहता कि ये आपकी देवी है। मैं केवल पूछ रहा हूँ कि अगर आपको तीन दिन तक पीने के लिए पानी नहीं मिले तो क्या जल आपके लिए भगवान नहीं बन जाएगा?’
दरअसल भगवान का विचार लोगों के मन में इसलिए आया क्योंकि उनके पास सृष्टि के स्रोत की कोई स्पष्ट व्याख्या नहीं थी। पूर्वी सभ्यता में 'भगवान' के लिए कोई एक अवधारणा नहीं है। जो भी एक सामान्य क्षमता के निश्चित स्तर से ऊपर हो उसे हम दिव्य कहते हैं। उदाहरण के लिए लोग सचिन तेंदुलकर को 'क्रिकेट का भगवान' कहते हैं, क्योंकि उनका कौशल सामान्य मानवीय सीमाओं के परे है। दूसरे शब्दों में हम उत्कृष्टता को पूजते हैं।
हम अपने रोजमर्रा के जीवन के लिए होने वाली जरूरी चीजों को भी पूजते हैं जैसे कि मिट्टी और हमारे इस्तेमाल में आने वाले औज़ार आदि। एक किसान कभी अपने हल या ट्रेक्टर को नमस्कार किए बिना इस्तेमाल नहीं करता। वह जानता है कि ये चीजें उसके जीवन के लिए ज़रूरी हैं। यही सम्मान खेती में इस्तेमाल होने वाले पशुओं को भी दिया जाता है। वह उन सारी चीजों को जो उसके जीवन में योगदान करती हैं, पवित्र मानता है, जो कि अच्छी बात है।
नहीं तो आजकल वो सारी चीजें जो हमारे जीवन में योगदान देती हैं उनके लिए आदर और श्रद्धा में कमी है। चाहे वो मिट्टी हो, नदी हो, पहाड़ हो, पेड़ हो, हमारे आसपास के लोग हों, इनके प्रति श्रद्धा भाव में कमी एक अपराध है।