
लगभग 1 साल पहले 9 अक्टूबर 1922 को पूर्णिमा के दिन सद्गुरु ने बेंगलुरु में ‘सद्गुरु सन्निधि’ में शक्तिशाली नाग की प्राण प्रतिष्ठा की थी।
इस साल 21 अगस्त 2023 को नाग-प्रतिष्ठा के बाद की पहली नाग पंचमी मनाई गई। यह अवसर पवित्र नागों के लिए मनाया जाने वाला उत्सव है। इस कार्यक्रम का सीधा प्रसारण ऑनलाइन किया गया।
प्रतिभागियों को नाग को अर्पण करने का अवसर मिला।
इस अवसर पर सभी का स्वागत करने के बाद सद्गुरु ने विभिन्न संस्कृतियों और क्षेत्र में नागों या सर्पों के महत्व पर बात की। उन्होंने मानवीय बोध को बढ़ाने के महत्व पर जोर दिया। इसके लिए उन्होंने इस विचार पर जोर दिया कि हमारी क्षमताओं का विस्तार हमें सामान्य इंद्रियों के बोध से परे ले जाता है, और जीवन की समझ को विस्तार देता है।
उन्होंने आगे समझाया कि नागों के साथ जुड़ने से समझ को विस्तार देने में मदद मिलती है और हर किसी को अपनी व्यक्तिगत राय को किनारे करके इसमें भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया। सद्गुरु ने भविष्य में नागों से जुड़े कुछ विशेष योग अभ्यास शुरू करने की योजना के बारे में बात की। उन्होंने कहा कि जीवन को सामाजिक मानदंडों या बाहरी प्रभावों तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। बल्कि हमारे भीतरी अनुभवों और बोध को हमारी गतिविधियों को राह दिखानी चाहिए।
सद्गुरु ने इस अनुष्ठान की शुरुआत नाग आरती से की।
प्रतिभागियों को पुराने समय के नागमंडल पूजा का अनुभव हासिल करने का अवसर मिला। पवित्र नाग या सांपों की कृपा प्राप्त करने वाला यह पारंपरिक अनुष्ठान सद्गुरु की उपस्थिति में नाग तीर्थ में उडुपी वैद्यों के द्वारा आयोजित किया गया।
इस प्रक्रिया में नागमंडल नृत्य नाम का एक अनुष्ठान-नृत्य शामिल था जिसके बारे में यह माना जाता है कि यह नागों की दिव्य उपस्थिति का आह्वान करता है।
आसपास के पारंपरिक जत्थे या गांव के मेले में न केवल भोजन के स्टॉल, खेल और हस्तकला की दुकानें थी बल्कि स्वदेशी मवेशी की नस्लों और आज़माए गए कृषि उपकरणों का भी प्रदर्शन किया गया।
पारंपरिक विरासत एवं समुदाय के इन पहलुओं ने इस पवित्र अनुष्ठान के लिए सांस्कृतिक मंच सजाने का काम किया।