
आइए चलते हैं एक ऐसे दिलचस्प आयाम में जहाँ ‘क्वांटम फिज़िक्स’ का मिलन योगिक संस्कृति के साथ होता है। एक क्वांटम फिज़िसिस्ट और सद्गुरु के बीच के अनोखे वार्तालाप को जानिए जब वे ‘पॉली एक्सक्लूशन प्रिंसिपल’ को द्वैतवाद के गूढ़ सिद्धांत के साथ जोड़कर देख रहे हैं।
प्रश्न: क्वांटम फिज़िक्स का एक जाना माना सिद्धांत है 'पॉली एक्सक्लूशन प्रिंसिपल’ जो बताता है कि एक जोड़े के दो कणों में हमेशा एक का घुमाव (स्पिन) ऊपरी दिशा में होता है और दूसरे का घुमाव नीचे की ओर होता है। इस विषय में योगिक दृष्टिकोण से आपके क्या विचार हैं?
सद्गुरु: अस्तित्व में मौजूद द्वैतवाद को हम आमतौर पर इस सिद्धांत से जोड़ते हैं। एक तत्व का घुमाव दक्षिणावर्ती(क्लॉकवाइज़) होता है और दूसरे का घुमाव वामवर्ती(एंटीक्लॉकवाइज़) होता है जिसे आप ऊपरी और निचली दिशा कह रहे हैं। यह पूरी सृष्टि जो भौतिक रूप में हमें दिखाई देती है इन दोनों आयामों के बीच घटित होती है। अगर यह घूमना रुक जाए तो यह सृष्टि भी इस तरह नहीं रहेगी।
इसे ही शिव-शक्ति के नाम से भी जाना जाता है। हमारे शरीर के भीतर इसे ईड़ा और पिंगला के रूप में जानते हैं। मानव शरीर में इस बात का स्पष्ट अनुभव किया जा सकता है कि ईड़ा की गति वामवर्ती होती है जबकि पिंगला का घूमना दक्षिणावर्ती है। योगिक प्रक्रिया से इसे पलटा भी जा सकता है। अगर आप किसी एक के घूमने की दिशा उल्टी कर दें तो दूसरे का घुमाव ख़ुद ही पलट जाता है।
हमारी संस्कृति में अर्धनारीश्वर का रूप इसी द्वैतवाद का प्रतीक है। इसमें शिव को आधे पुरुष और आधे स्त्री के रूप में दिखाया जाता है। इसका मतलब यह नहीं है कि वह शारीरिक रूप से आधे पुरुष और आधे स्त्री हैं। बल्कि यह हमारे भीतर सृष्टि की आतंरिक संरचना को दिखाता है जहाँ एक भाग दक्षिणावर्ती घूम रहा है और दूसरा भाग वामवर्ती घूम रहा है।
बाएं तरफ की ईड़ा स्त्रैण गुण दर्शाती है। गुणों के संदर्भ में वामावर्त दिशा को स्त्रैण गुण से जोड़ा जाता है और दक्षिणावर्त दिशा को पौरुष गुण से जोड़ा जाता है। सृष्टि के हरेक पहलू के लिए ये सत्य है, जिसमें हमारी धरती भी शामिल है। हम जो हैं उसकी भौतिक रचना सिर्फ इस ग्रह का एक हिस्सा है। इस ग्रह की प्रकृति और बाकी सृष्टि ही हमारे शरीर में साकार है क्योंकि ये एक ही प्रक्रिया है।
इस धरती पर उत्तरी गोलार्थ में जब आप नल खोलते हैं तो पानी दक्षिणावर्त दिशा में घूमते हुए गिरता है। यही अगर आप दक्षिणी गोलार्थ में करें तो पानी वामावर्त दिशा में घूमता है। इन दोनों गुणों का अंतर ही है जिसके वजह से सब कुछ अपनी जगह टिका हुआ है। इस अंतर के अभाव में इस ग्रह का अपनी धुरी पर घूमना ही इसके विनाश का कारण हो जाता। इसलिए योगिक दृष्टिकोण से पारम्परिक समझ के अनुसार गुरुत्वाकर्षण शक्ति का कोई अस्तित्व नहीं है। ये दो शक्तियों की विपरीत प्रकृति ही है जो हर चीज को बांधकर अपनी जगह बनाए रखती है। यही शक्तियों की विसंगति हमारे शरीर को भी बांधकर रखती है।
अगर आप ये शरीर छोड़ना चाहते हैं तो आपको केवल एक आयाम को उसकी सहज गति में रखते हुए दूसरे आयाम की गति को उलटना होता है। ये एक कोरी कल्पना लग सकती है लेकिन ऐसी वास्तविक घटनाएं हुई हैं जब किसी योगी को किसी कमरे में बंद करके बाहर से ताला लगा दिया गया था और थोड़ी देर बाद खोलने पर वहाँ केवल उनके कपड़े दिखे, शरीर गायब था। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि जब आप एक हिस्से को सहज रखते हुए दूसरे की गति को पलट दें तो शरीर स्वयं ही अस्तित्व से अस्तित्वहीनता की ओर जाकर अभौतिक हो जाता है।
मैंने ये पहले भी कहा है। किसी को मुझे श्मशान तक ले जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। मैं स्वयं वहाँ तक जाऊंगा और मैं अपना शरीर भी पीछे नहीं छोडूंगा। अगर एक हिस्से को, वो जैसा है, वैसा ही रखते हुए दूसरे हिस्से को पलट दिया जाए तो अस्तित्व से अस्तित्वहीनता की ओर जाकर शरीर ख़ुद अपना भौतिक रूप खो देगा।
प्रश्न: भौतिक विज्ञान की एक शाखा ‘क्वांटम मैकेनिक्स’ में खोज के कई क्षेत्रों में चीजें अंतिम रूप से तय नहीं हैं, मतलब कि वे संभावनाओं के साथ काम करते हैं न कि विशुद्ध सिद्धांत के साथ। ‘क्वांटम मैकेनिक्स’ का एक आवश्यक पहलू है द्वैतवाद जिसमें एक बिंदु होता है और एक उसका पूरक होता है। एक हिस्से में हुआ कम्पन दूसरे हिस्से को प्रभावित करता है। कुछ लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि अगर यह द्वैतवाद लुप्त हो जाए तो ये ब्रह्मांड अपना स्वरुप खो देगा क्योंकि वे मानते हैं कि ब्रह्मांड की संरचना द्वैतवाद पर टिकी है। क्या आप इसके बारे में कुछ बता सकते हैं?
सद्गुरु: योगिक संस्कृति में इसे हम हज़ारों सालों से जानते हैं। अगर आप अपने आस-पास देखें तो आप पेड़ की एक पत्ती को भी ठीक से समझ नहीं सकते, चाहे आप अपना पूरा जीवन ही उसमें क्यों न लगा दें। आप जिस तरह उस तक पहुंचते हैं, आप उसे समझ ही नहीं सकते। अस्तित्व की प्रकृति को समझने का केवल एक ही तरीक़ा है और वह है अस्तित्वहीन हो जाना।
दरअसल अंश और संपूर्ण का विचार मानव मन की उपज है। लेकिन जीवित रहने के लिए यह भेद ज़रूरी है। इस द्वैत के बिना सृष्टि का निर्माण संभव नहीं है। इस चर्चा के लिए आपकी और मेरी दोनों की आवश्यकता है। अगर हम दोनों यहाँ एक अस्तित्व के रूप में बैठे होते तो कोई चर्चा नहीं होती। चाहे वो कोई मौखिक वार्तालाप हो या ब्रह्मांड की गतिविधि, दो का होना ज़रूरी है।
आध्यात्मिकता का सम्पूर्ण सार ख़ुद में डूब जाने में है क्योंकि सम्पूर्ण सृष्टि वहीं से निकलती है। अगर आप इस बात को नहीं मानते कि आजकल की आधुनिक विधियों के परे भी जानने का कोई तरीक़ा है, तो आप वहीं ठहरे रहेंगे।
इस द्वैत के बिना सृष्टि का निर्माण संभव नहीं है।
अगर आप पुराने समय और आज के ज़माने के योगियों पर गौर करें तो आप देखेंगे कि वे सब एक दूसरे से सहमत हैं, हो सकता है उनके रास्ते अलग-अलग हों। हो सकता है किसी योगी का मार्ग या समझ कुछ विशेष हो, लेकिन वे किसी दूसरे मार्ग का खंडन भी नहीं करेंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि वे जानते हैं कि इस सृष्टि का प्रत्येक परमाणु शिव तक पहुंचने के लिए एक मार्ग है। आप किस मार्ग को अपनाएंगे, ये पूरी तरह आप पर निर्भर करता है।
हमारे अनुभव में स्पेस को एक ऐसी चीज के रूप में देखा जाता है जिसका विस्तार भी हो सकता है और वह सिकुड़ भी सकता है। समय और स्पेस हमारे मन के बनाए हुए हैं। हम कहते हैं कि ब्रह्मांड एक अंतहीन स्पेस है, साथ ही इसे एक सरसों के बीज में भी सिकोड़ा जा सकता है क्योंकि समय और स्पेस फैलने योग्य हैं। मुझे लगता है कि विज्ञान ने भी ऐसा ही कुछ पाया है।
सृष्टि का प्रत्येक अंश सृष्टिकर्ता तक पहुंचने का एक मार्ग है, लेकिन जिस अंश को आप सबसे आसानी से खोल सकते हैं, वो आप ख़ुद हैं, क्योंकि यही एक चीज है जिस तक आपकी पहुँच सबसे ज़्यादा है। आप कैसे और किस तरह से इस तक पहुंचना चाहते हैं ये आप पर निर्भर करता है। अगर आज से 500 साल बाद कोई मेरे नाम से किसी मत की शुरुआत कर दे तो हो सकता है वह यही कहे कि ‘बस इसे ऐसे ही करना है।’ ‘इसे ऐसे ही करना है’ ये किसी अज्ञानी का कथन होगा, किसी योगी ने आज तक ऐसा नहीं कहा है।
योग और अध्यात्म का यही मूल स्वभाव है। जब आप पूरी तरह अस्तित्वहीन हो जाएँगे, केवल तभी आप इस अस्तित्व को जान पाएंगे।
