
यहाँ सद्गुरु ‘सार्वभौमिक मातृत्व’ की अवधारणा पर प्रकाश डालते हैं - हमारे अपने बच्चों से परे, सभी जीवन को महत्व देना और उनका पोषण करना। योग के सार को बताते हुए, उन्होंने ‘सार्वभौमिक मातृत्व’ की धारणा को वैश्विक मुद्दों के लिए एक परिवर्तनकारी नज़रिए के रूप में सुझाया।
प्रश्नकर्ता: एक माँ होने के नाते मैं ‘संसार भर की माँ’ होने के विचार से खुद को जोड़ पाती हूँ। क्या पूरे जगत की माता होने की भावना पैदा करने से हम वाक़ई उन सभी समस्याओं का हल कर सकते हैं जिन्हें आज हम वैश्विक स्तर पर महसूस कर रहे हैं?
सद्गुरु: चलिए मानते हैं कि कोई इंसान सबसे बुरा है। तब भी यदि वह घर से बाहर कदम निकालता है तो क्या सूरज उसे अपनी रोशनी देना बंद कर देगा? क्या पेड़ ऑक्सीजन रोक लेंगे, सिर्फ इसलिए कि वह आदमी अच्छा नहीं है? बिलकुल नहीं! जब पूरी प्रकृति ऐसा कोई फ़ैसला नहीं कर रही, तब आप ऐसा करने वाले कौन होते हैं? आपके पास क्या अधिकार है कि आप यह निर्णय लें कि कौन अच्छा है और कौन बुरा? कौन हमारा है कौन हमारा नहीं है?
मातृत्व का महत्व जन्म देने में नहीं है, बल्कि एक दूसरे जीवन को अपना हिस्सा समझने में है। इसी वजह से हम मातृत्व के सामने सर झुकाते हैं। जब आपके बच्चे बड़े हो जाते हैं तो हो सकता है आप उनका भी आँकलन करने लगें, उन्हें भी अच्छे या बुरे का लेबल देने लगें, लेकिन जब तक बच्चा गर्भ में रहता है और उसके जन्म के थोड़े समय बाद तक भी आप एक दूसरे जीवन को अपना ही हिस्सा समझते हैं। यही योग है।
योग का अर्थ है - मिलन या एकत्व, और एक मां के रूप में आप एक ख़ास स्तर का एकत्व महसूस करते हैं। हम इसी भावना के सामने सर झुकाते हैं। आपके बच्चे आपकी ओर इसलिए नहीं देखते या आपको इसलिए प्यार नहीं करते क्योंकि आपने उन्हें जन्म दिया है। बल्कि इसलिए, क्योंकि आपने उन्हें अपने हिस्से के रूप में स्वीकार किया है।
शारीरिक रूप से पैदा कर देने से नहीं, बल्कि आप किस हद तक बच्चे को अपने हिस्से के रूप में शामिल करने में सक्षम हैं, यह आपको एक माँ के रूप में सशक्त बनाता है। कोई भी अपनी जागरूकता में या अचेतन होकर भी प्रजनन कर सकता है। मातृत्व का असली महत्व अपने आसपास के जीवन को अपने हिस्से के रूप में शामिल करने की आपकी क्षमता में है। यही आपके जीवन के अनुभव की गहराई को तय करता है।
दुनिया का हर विज्ञापन विशिष्ट होने का प्रचार करता है क्योंकि वे आपको अपना सामान बेचने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन जब आप समावेशी हैं, सबको शामिल कर सकते हैं तभी जीवन घटित होता है। जब आप विशिष्ट होते हैं तो केवल आपका मनोवैज्ञानिक नाटक घटित होता है। तो आप यहाँ क्या केवल अपना मनोवैज्ञानिक नाटक अनुभव करने के लिए आए हैं या जीवन को पूरी गहनता में अनुभव करने के लिए? जब आप रोज़मर्रा की बकवास में फंस जाते हैं तो हो सकता है आप यह समझ न पाएं।
यदि कोई आपके सिर पर बंदूक तान दे या डॉक्टर आपसे कहे कि बस कुछ ही दिन आपके पास बचे हैं, शायद तभी आप जान सकेंगे कि जीवन ही सबसे कीमती चीज है। सवाल यह है कि जीवन के मूल्य को जानने के लिए आप किसी ऐसी परिस्थिति का इंतजार क्यों करें? जीवन इस बारे में है कि आप इसे कैसे अनुभव करते हैं। क्या आपके जीवन का अनुभव सतही है या गहरा? हम माताओं की तरफ़ इसीलिए देख रहे हैं क्योंकि एक तरीके से उनके पास गहन अनुभव होता है - भले ही थोड़े समय के लिए, लेकिन उन्होंने एक दूसरे जीवन को अपने हिस्से के रूप में स्वीकार किया है।
यह सिर्फ़ प्रजनन की घटना की वजह से नहीं हुआ, बल्कि इसलिए हुआ क्योंकि आप किसी दूसरे जीवन को अपना हिस्सा बनाने के लिए तैयार थे। आप यही भाव जीवन के हर क्षण रखने के लिए तैयार क्यों नहीं हैं? हर चीज को आपके शरीर से जुड़े होने की जरूरत क्यों है? बायोलॉजी (जीव विज्ञान) आप के अस्तित्व का सबसे बुनियादी पहलू है। यदि आप बुनियादी स्तर तक ही रहना चाहते हैं तो यह आपका चुनाव है। लेकिन आपके भीतर कुछ ऐसा है जो हमेशा उससे ज्यादा होना चाहता है जो अभी आप हैं।
आप चाहे जो भी हों, जितना भी हों, आपमें उससे थोड़ा ज़्यादा होने की स्वाभाविक चाहत है। यदि आपने अपनी चाहत के लिए कुछ नहीं किया तो हो सकता है दुनिया की नज़रों में सब कुछ बढ़िया चल रहा हो, लेकिन फिर भी आपका चेहरा लटका रहेगा, और आपको कारण भी पता नहीं होगा। बहुत सारे लोग इस स्थिति में हैं। क्या आपको याद है आपने अपनी अंतिम हंसी कब सुनी थी। क्या आपको हंसाने के लिए किसी को एक चुटकुला सुनाना होगा या आपको गुदगुदी लगानी होगी?
जब आप एक बच्चे थे तो आपके भीतर जीवन हर पल फूट रहा था। जब आपकी उम्र बढ़ती है तो बहुत सारी चीजें जिनमें शारीरिक और मानसिक चपलता भी है घट सकती है, लेकिन आपकी जीवंतता कभी नहीं घटनी चाहिए।
जब जीवंतता चली जाती है तब हम आपको मरा हुआ कहते हैं। हो सकता है आपमें 5 साल के बच्चे की तरह चुस्ती-फुर्ती ना हो लेकिन आप उसके जितना जीवंत जरूर रह सकते हैं।
आपकी जीवंतता कम होती जा रही है क्योंकि आप चारों ओर दीवारें बना रहे हैं – अपने व्यक्तित्व को और मज़बूत कर रहे हैं। योग का अर्थ यही है - अपनी व्यक्तिगत सीमाओं को सचेतन होकर तोड़ना, जिससे आप व्यक्तित्व न रहकर सार्वभौमिक अस्तित्व बन सकें। यही मानव होने की सुंदरता है। अगर आप चाहें तो यहाँ बैठे-बैठे सारे ब्रह्मांड को अपने भीतर रख सकते हैं। कोई आपको नहीं रोक सकता। आप पूरे संसार को अपना बना सकते हैं। लेकिन कई लोग इस धरती पर अजनबियों की तरह रहते हैं, जैसे कि यह उनकी नहीं है।
यह ब्रह्मांड इतना विशाल है कि न तो वैज्ञानिक और न ही धार्मिक लोग इसका आदि और अंत जान पाए हैं। इस विस्तृत ब्रह्मांड में हमारा सौरमंडल एक छोटे से बिंदु की तरह है। इसमें हमारी पृथ्वी एक बेहद सूक्ष्म बिंदु की तरह है। और इस बेहद सूक्ष्म बिंदु में आपका घर और भी अधिक सूक्ष्म बिंदु की तरह है। लेकिन इसके भीतर रहकर आप सोचते हैं कि आप एक बड़े इंसान हैं। यह एक गंभीर मुद्दा है। इसका मतलब है कि आप अपने अस्तित्व के संबंध में कुछ भी नहीं जानते।
चलिए मैं आपसे एक सवाल पूछता हूँ। आप यहाँ पैदा होने से पहले कहाँ थे? आप एक बहुत लंबे समय के लिए मृत थे और जब मर जाएंगे तो एक बार फिर बहुत लंबे समय के लिए मृत रहेंगे। आप यहाँ बहुत थोड़े समय के लिए जीवित हैं। और समय के इस छोटे से अंतराल में कितनी सारी समस्याएं पैदा होती हैं। इन समस्याओं का कोई अस्तित्व नहीं है। आपने इन्हें अपने दिमाग में बनाया है। इंसान की तकलीफ़ उसके दिमाग में पैदा होती हैं और यही मानव की सीमाएं हैं।
अपनी क्षमताओं को खो देना और आप जो कर सकते हैं उसे न कर पाना – यह सबसे बुरा नुक़सान है। दुर्भाग्य से यह 99.9% लोगों की सच्चाई है। इसकी वजह सिर्फ यह है कि अपने अस्तित्व की उनकी समझ बहुत सीमित है। इस दृष्टि से जगत की माँ होना बहुत आवश्यक है। अगर आप अपने जीवन का हर क्षण संसार भर की माँ होने के भाव में जीते हैं तो आपका जीवन बदल जाएगा।