

सद्गुरु एक भरमाने वाली ज़ेन-कहानी को स्पष्ट करते हुए समझा रहे हैं कि सही रास्ता कैसे चुन सकते हैं।
प्रश्न: सद्गुरु, एक बार एक शिष्य ने ज़ेन गुरु से पूछा, ‘क्या मेरे लिए टेढ़ा रास्ता लेना सही है या सीधा, जिस पर मेरी आत्मा मुझे ले जाती है?’ गुरु ने जवाब दिया, ‘जो उत्तर दिशा की ओर सीधा रास्ता चुनेगा, उसे उत्तर दिशा दिखेगी। जो दक्षिण का रास्ता चुनेगा, उसे दक्षिण दिखाई देगा। जो सीधा रास्ते पर पूर्व की तरफ बढ़ेगा, उसे सिर्फ़ पूर्व दिखेगा। जो पश्चिम का सीधा रास्ता चुनेगा, वह पश्चिम देखेगा। जो टेढ़ा रास्ता चुनेगा, वो सभी दिशाएं देखेगा।’ क्या आप हमें जेन गुरु का यह जवाब समझा सकते हैं?
सदगुरु: ऐसा इसलिए कहा गया था क्योंकि तब लोग अलग-अलग विचारधाराओं से खुद को जोड़ रहे थे। जब ज़ेन गुरु ने कहा, ‘एक सीधा रास्ता,’ तो वो एक कट्टरता वाले मार्ग के बारे में बात कर रहे थे - जो शास्त्रों और शिक्षाओं का एक निश्चित तरीक़े से पालन करते हैं। इसलिए, अगर आप उत्तर की तरफ देख रहे हैं, वो रास्ता बस उत्तर को जाएगा। अगर आप पश्चिम की तरफ जाते हैं, तो रास्ता सिर्फ़ पश्चिम जाएगा, पूर्व बस पूर्व जायेगा, और दक्षिण सिर्फ दक्षिण। लेकिन अगर आप टेढ़ा रास्ता लेते हैं, तब आप सभी दिशाएं देखेंगे, लेकिन आप कहीं पहुँच नहीं पाएंगे।
अगर आप टेढ़ा रास्ता लेते हैं, तो आपकी यात्रा मनमोहक होगी, लेकिन आप वापस उसी जगह पहुँच जाएंगे। तो आप यहाँ पर्यटन के लिए हैं, या आप कहीं पहुंचना चाहते हैं – सवाल बस यही है। अगर आप सोचते हैं एक टेढ़ा रास्ता लेने का मतलब है कि आप टेढ़े हो सकते हैं, तो ऐसा नहीं है। आप रास्ते में एक मोड़ ले सकते हैं, लेकिन आपको सीधे रास्ते पर ही चलना होगा। ऐसा मत सोचिए कि ज़ेन गुरु आपकी कुटिलता को मंज़ूरी दे रहे हैं। अगर आप चालाक हैं, तो कोई रास्ता नहीं है। अगर आप सीधे हैं, तो हर जगह रास्ता है। मूल रूप से, टेढ़े या सीधे रास्ते जैसी कोई चीज़ नहीं है क्योंकि आध्यात्मिक यात्रा अपने भीतर मुड़ने के बारे में है।
आपके साथ आध्यात्मिक प्रक्रिया तब नहीं होगी जब आप ऊपर, नीचे, या चारों दिशाओं में देखेंगे, बल्कि तब होगी जब आप अपने अंदर देखेंगे। जो अंदर है वो आयाम रहित है। जिसका कोई आयाम नहीं है, वहाँ सीधे या टेढ़े रास्ते से नहीं पहुंचा जा सकता, वहाँ वही पहुंचेंगे जो अपने अंदर सीधे हैं। यह चिंता मत कीजिए कि रास्ता सीधा है या टेढ़ा, ऊपर है या नीचे - ये सब, आपको बस रोमांच का एहसास कराने के लिए बनाया गया है।
दरअसल कोई रास्ता है ही नहीं। आपने अपने पूरे जीवन को बाहर की तरफ बढ़ाया हुआ है, जो कि भ्रम है। अगर आप बाहर देखना बंद कर दें, तो सब अंदर ही है। एक तरह से ध्यान का मतलब यही है। अगर आप अपनी आँखें बंद करके बैठते हैं, तो पहले बाहरी पागलपन जारी रहेगा। लेकिन अगर आप किसी सही तरह की मौजूदगी में बैठें, एक बार जब आपकी बाहरी बकवास ख़त्म हो जाती है, फिर कोई भटकाव, कोई बाधा नहीं होगी।
अगर सभी भटकाव दूर हो जाएं, तो आप जो भी देखेंगे, आपको उससे प्रेम हो जाएगा। अगर आप बिना किसी भटकाव के एक कीड़े को देखते हैं, एक फूल, एक तिनके, एक पहाड़, एक चट्टान, या फिर रेत के एक कण को देखते हैं, तो आप उससे पूरी तरह प्रेम करेंगे। ध्यान का यही अर्थ है। इसलिए न आप सीधे रास्ते पर जाएं, न ही टेढ़े रास्ते पर। आपको खुद के साथ सीधा होना सीखना होगा। कहीं जाने की कोशिश न करें - बस यहाँ रहें क्योंकि कहीं और नहीं जाया जा सकता।
जब हम ‘मार्ग’ कहते हैं, तो आपका दिमाग स्वाभाविक रूप से कहीं जाने के बारे में सोचने लगता है। दरअसल जाने की कोई जगह नहीं है। इसका मतलब ठहराव नहीं है। ‘कुछ’ का मतलब एक मात्रा होती है, ‘कुछ नहीं’ कोई मात्रा नहीं है - यह एक आयाम है जिसे मापा नहीं जा सकता। यह एक संभावना है जिसकी न शुरुआत है न अंत। ‘कहीं’ का मतलब कोई बहुत छोटी सी जगह है, जहाँ जाने का कोई अर्थ नहीं है। ‘कहीं नहीं’ एक सीमाहीन स्थान है। इसलिए, अगर आप उत्तर में जाते हैं, आप ‘कहीं’ पहुंचेंगे। अगर आप दक्षिण में जाते हैं, आप ‘कहीं’ पहुंचेंगे। अगर आप पूर्व या पश्चिम जाते हैं, आप ‘कहीं’ पहुंचेंगे। अगर आप इधर उधर जाते हैं, आप बस ‘कहीं’ पहुंचेंगे। यह हमारा इरादा नहीं है। हम ‘कहीं’ जाना नहीं चाहते, क्योंकि हमारी यात्रा सीमित से सीमाहीन होने तक की है। जो सीमाहीन है वो है ‘कहीं नहीं।’ ‘कहीं नहीं’ ही एकमात्र सीमारहित स्थान है।
तो, क्या हम अजीबोगरीब तर्कों का इस्तेमाल करके बस सर्कस का मज़ा ले रहे हैं? आपने यह सवाल पूछा, क्योंकि आपका दिमाग अभी भी उस स्थिति में है, जहाँ हर दिन वह इसे नकारने का नया तरीक़ा ढूंढता है। हर दिन आप एक नया तर्क निकालते हैं कि यह कैसे नहीं हो सकता। आपका दिमाग अभी भी उसी स्थिति में है। आपको यह तार्किक दिमाग पसंद है जो हर दिन आपको सीमाओं में बांधे रखने का नया तरीक़ा निकालता है। तो, आइए इसे तार्कित दिमाग के दृष्टिकोण से देखते हैं।
बुद्धिमत्ता को यह पता है कि हम कुछ सीमाओं में बंधे हैं। और आपको भी पता है कि आपको इन सीमाओं के परे जाना है। कई बार, आपने कुछ सीमाओं को पार भी किया है, लेकिन फिर आप नई सीमाओं के दायरे में घिर जाते हैं। अगर आप अपनी बुद्धिमत्ता का इस्तेमाल पूरी गहनता से करें, तो स्पष्ट रूप से यह आभास होगा कि यह आपको आगे ले जाने वाला वाहन नहीं है। अगर आप नहीं जानते कि बुद्धिमत्ता से परे कैसे जाना है, तो कम से कम बुद्धिमत्ता को निराश तो कीजिए। अगर आप बुद्धिमत्ता को चिढ़ाएँगे तो वो नीचे रहेगी। जब वो नीचे रहती है,
तब हम आपके साथ कुछ चीज़ें कर सकते हैं।
चाहे आपको कोई भी दीक्षा न दी गई हो, फिर भी अगर आप कुछ समय तक बस अपनी आँखें बंद कर लें, तो आप देखेंगे की कुछ समय बाद दिमाग की गतिविधि कम हो जाएगी। शुरुआत में यह तेज़ होगी क्योंकि यह चाहेगा कि आप अपनी आँखें खोलें, क्योंकि दिमाग सूचना या जानकारी के बिना ज़्यादा देर नहीं रह सकता। इसे हर दिन कुछ मसाला चाहिए, नहीं तो यह फलेगा-फूलेगा नहीं। अगर आप बस अपनी आँखें बंद करके कुछ समय के लिए बैठ जाएँ तो बुद्धिमत्ता नीचे रहेगी। यह आपके पालतू कुत्ते की तरह होगी। हम इसे मारना नहीं चाहते।हमें यह चाहिए, लेकिन तब, जब इसकी ज़रूरत हो। हम चाहेंगे कि जब ज़रूरत नहीं है तब यह चुपचाप बैठी रहे।
एक बार जब आपकी बुद्धिमत्ता नीचे आ जाती है और आप इसे पर्याप्त समय देते हैं, तब असली बुद्धिमत्ता काम करना शुरू कर देगी। जिसे आप बुद्धिमत्ता व विवेक कहते हैं और जो सृष्टि का स्रोत है, वो अलग नहीं है। एक बार आपके अंदर असली विवेक काम करना शुरू कर देगा, तब आप स्वाभाविक रूप से खुश रहेंगे – आप किसी दूसरे तरीक़े से हो ही नहीं सकते। यह ऐसा कुछ नहीं है जिसे आप पाने की इच्छा करेंगे। आप इसका निर्माण नहीं करते। यह ऐसा ही है। केवल जब आप स्वाभाविक रूप से आनंदमय हैं, तभी आप ‘कुछ नहीं’ के तल में उतरने के
लिए तैयार हैं। तब आप सही मायने में ‘कहीं नहीं’ जाने के लिए तैयार हैं।
जब आप कहते हैं, ‘मैं असीम की तलाश में हूँ,’ आप एक ऐसे गड्ढे में गिरने की बात कर रहे हैं, जिसका कोई तल ही नहीं है, जो खतरनाक नहीं है। बस धरातल वाला गड्ढा असुरक्षित है। अगर गड्ढे का तल ही नहीं है, फिर कूदने में क्या समस्या है? आप अनंतकाल तक झूलते हुए, बिना किसी हानि के, और किसी भी चीज़ से अनछुए रहेंगे। अगर आप बिना तले के गड्ढे में गिरेंगे, तब आप सही मायने में आनंदमय होंगे। नहीं तो आप लगातार कहीं जाने के बारे में सोचते रहेंगे। आप कहीं नहीं जा सकते। आप जहाँ भी जाते हैं, चाहे आप उत्तर की तरफ़ जाएँ या
दक्षिण की तरफ़, आपके जीवन के सभी अनुभव आपके भीतर ही घटित हो रहे हैं। यह एक जाल नहीं है, एक दरवाज़ा है।
