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नाग-प्रतिष्ठा : 800 सालों में पहली बार

16000 से ज़्यादा लोगों ने अपने जीवन में एक दुर्लभ अनुभव हासिल किया जब वे सद्‌गुरु के साथ ईशा योग केंद्र बेंगलोर में नाग प्रतिष्ठा के साक्षी बने।

यह नाग प्रतिष्ठा 9 अक्टूबर, आश्विन पूर्णिमा,

की रात्रि को संपन्न हुई।


Saudis and Expats Converge to Hear Sadhguru Speak about Save Soil (12 May)

Sadhguru received a very warm welcome in Riyadh. He addressed an enthusiastic and highly engaged public gathering organized by the Embassy of India, Riyadh, answering questions of all kinds, and of course – talking about Soil.

एक जीवंत स्थान में प्रवेश

नंदी हिल्स का पहाड़ी इलाका, विशाल खुला आकाश और भरपूर प्राकृतिक सौंदर्य के बीच शोभायमान ईशा योग केंद्र, बेंगलुरु, में लंबे समय से प्रतीक्षित नाग प्रतिष्ठा के लिए हज़ारों की संख्या में लोग श्वेत वस्त्रों में एकत्रित थे।

परिसर में प्रवेश करते ही लोगों को 112 फ़ीट ऊँची आदियोगी की भव्य प्रतिमा के दर्शन हुए। नाग-प्रतिष्ठा का पुण्य स्थान उस प्रतिमा के सामने ही मौजूद था। नाग की पवित्र प्रतिमा एक बड़े से काले वस्त्र में ढंकी हुई थी जिस पर कन्नड़ में ‘नाग नाग नागेन्द्राय’ लिखा हुआ था। उसमें कुछ ऐसा रहस्यमय और सम्मोहक था जो हर किसी को अपनी तरफ खींच रहा था।

माहौल में कौतुहल और अनुमान का कोहरा छाया हुआ था जिसमें इकट्ठे हुए लोगों की बातचीत हलचल पैदा कर रही थी। ऐसे में लाउड-स्पीकर से आता नाग-मन्त्र का निरंतर जाप लोगों के कौतुहल और उत्सुकता को और बढ़ा रहा था। जैसे ही घड़ी में 3 बजे, नाग-प्रतिष्ठा में भाग लेने आए लोगों ने ख़ुद को समर्पित करते हुए नाग मंत्र का जाप प्रारम्भ कर दिया।

प्रतिष्ठा : एक गूढ़ आयाम का अनुभव

अगला घंटा तेज़ी से बीत गया और जल्दी ही सब लोग अपने-अपने स्थान पर एक विशेष शॉल ओढ़कर बैठ गए, जिसकी पहले ही ऊर्जा-प्रतिष्ठा की गई थी। सद्‌गुरु हाथ में रस-दंड लिए नाग प्रतिमा के पास पहुंचे। ये रस-दंड पारे का एक ऊर्जा से प्रतिष्ठित किया हुआ दंड था जो नाग-प्रतिष्ठा के लिए बेहद महत्वपूर्ण था। बिना और अधिक समय लिए सद्‌गुरु ने प्रतिष्ठा प्रारम्भ कर दी।

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सद्‌गुरु ने प्रतिष्ठा में भाग लेने वालों को एक ख़ास तरह से तैयार की गई क्रिया कराना शुरू किया जिसमें कुछ विशेष बीज 1 मंत्रों का उच्चारण करते हुए ख़ास चक्रों पर ध्यान केंद्रित करना था। इसी बीच ब्रह्मचारियों ने मक्खन, हल्दी , कुमकुम और अस्ति (ऊर्जा- प्रतिष्ठित भस्म) से नाग प्रतिमाओं पर लेप किया और सद्‌गुरु ने प्रत्येक लेप के पश्चात आरती की।

[1] बीज ध्वनियाँ जो मानव शरीर के विभिन्न चक्रों से सम्बंधित हैं

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ठीक उसके बाद प्रकृति माँ ने बारिश की मूसलाधार बौछारों से सबको सराबोर कर दिया। कुछ देर के लिए थोड़ी अफरा-तफरी मच गई जब प्रतिभागी बारिश से बचने के लिए अपने छाते, रेनकोट वग़ैरह निकालने लगे। कुछ लोगों ने इन बौछारों से सराबोर होने का फ़ैसला किया। पानी की हरेक बूँद उनकी ग्रहणशीलता को बढ़ा रही थी।

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ईशा फाउंडेशन का अपना संगीत बैंड, ‘साउंड्स ऑफ़ ईशा’ ने एक विशेष मंत्र ‘नाग नागम आश्रयैहम’ के मंत्र को संगीत और जबरदस्त ड्रमबीट्स के साथ पेश करके समां बाँध दिया। जबकि कुछ प्रतिभागी एकाग्रता से प्राण-प्रतिष्ठा की प्रक्रिया देख रहे थे, कुछ लोग हर्षोन्माद में अपनी आँखें बंद करके शक्तिशाली ऊर्जा में सराबोर हो रहे थे।

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साढ़े तीन घंटे की तीव्रता के बाद प्राण-प्रतिष्ठा की प्रक्रिया समाप्ति की ओर पहुंचने लगी। सद्‌गुरु ने सबको बधाई दी और कहा कि सबकुछ वैसा ही हुआ जैसा सोचा गया था, ‘यहाँ तक कि सही मात्रा में बारिश भी।’ उन्होंने प्रतिभागियों को नाग के पास आकर उन्हें स्पर्श करके प्रसाद ग्रहण करने के लिए कहा जिसे वे अपने माथे और गले के निचले भाग में लगा सकते थे।

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दूसरे चरण के लिए सद्‌गुरु एक बिन बुलाए मेहमान को अपने हाथ में लपेटे मंच पर पहुंचे। सब लोग आश्चर्य से देख रहे थे जब वे जनसमूह को सम्बोधित करते हुए बड़ी ही सरलता से अपने हाथ में लपेटे उस नाग को संभाल रहे थे। उन्होंने कहा कि कैसे नागों को कई सदियों से अहितकर समझा गया है और ये हमारी जिम्मेदारी है कि हम इस नज़रिए में बदलाव लाएँ। उन्होंने कहा कि एक विषैले
जीव के साथ भी अगर ठीक से बर्ताव किया जाए तो यह एक ईश्वरीय संभावना बन सकता है।

सद्‌गुरु ने पारे के बारे में भी विस्तार से बताया जिसे आम तौर पर लोगों ने ग़लत समझा है। प्रतिष्ठा से पूर्व प्रतिभागियों को तांबे का सर्प दिया गया था। इसके बारे में बताते हुए सद्‌गुरु ने कहा कि उसे नाग को अर्पित करने से जीवन में विस्तार होता है और सबको परिसर छोड़ने से पहले उसे नाग को अर्पित करने के लिए कहा।

आध्यात्मिकता के लिए आवश्यक संरचना

लोगों में ख़ुशी की हिलोरें उठने लगीं जब सद्‌गुरु ने ईशा योग केंद्र, बेंगलुरु में होने वाली प्राण-प्रतिष्ठा के भावी कार्यक्रमों के बारे में बताना शुरू किया। सद्‌गुरु ने बताया कि सबसे पहले योगेश्वर लिंग की स्थापना 15 जनवरी 2023 के दिन होगी। उन्होंने आगे खुलासा करते हुए बताया कि इस केंद्र के लिए भविष्य की योजनाओं में आदियोगी आलयम और लिंग भैरवी के अलावा 8 प्रोग्राम हॉल भी शामिल हैं जिसमें भाव स्पंदना प्रोग्राम अगले साल जून तक प्रारम्भ करने की उम्मीद है।

सद्‌गुरु ने बेंगलुरु के स्वयंसेवकों, ब्रह्मचारियों और निर्माण कार्य के दल को धन्यवाद दिया जिन्होंने रात-दिन काम करके 112 फ़ीट ऊँची आदियोगी की प्रतिमा केवल साढ़े चार महीनों में खड़ी कर दी। आगे आने वाले प्रोजेक्ट्स के बारे में बताकर सबसे आग्रह करते हुए उन्होंने कहा कि बेंगलुरु केंद्र के लिए पूरा सहयोग दें, क्योंकि इसे संभव बनाने के लिए आपके पास जो कुछ है उन सबकी जरूरत होगी, ‘आपका दिमाग, शरीर, हाथ, आपकी जेबें, सब कुछ।’