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काशी यात्रा : मंदिर से श्मशान तक के अनुभव

दो साल के अंतराल के बाद सद्‌गुरु ने लगभग एक हज़ार साधकों के साथ काशी, यानी वाराणसी की तीर्थ यात्रा की
शुरुआत की, जो उत्तर प्रदेश में गंगा किनारे बसा एक शहर है। काशी, जिसका अर्थ है ‘रोशनी का एक स्तंभ।’ काशी, जिसे
‘इतिहास से पुराना शहर’ कहा जाता है, समय की कसौटी पर हमेशा खरा उतरा है। क्रूर आक्रमणों और बर्बादी के बाद भी
इस शहर की अनोखी ऊर्जा लगभग अछूती रही है। यहाँ हम रोशनी के शहर में प्रतिभागियों की यात्रा के संगी बनेंगे।

Saudis and Expats Converge to Hear Sadhguru Speak about Save Soil (12 May)

Sadhguru received a very warm welcome in Riyadh. He addressed an enthusiastic and highly engaged public gathering organized by the Embassy of India, Riyadh, answering questions of all kinds, and of course – talking about Soil.

पहला दिन: सारनाथ - जहाँ बुद्ध ने दी थी अपनी पहली शिक्षा

काशी–यात्रा सारनाथ दर्शन के साथ शुरू हुई - जो बौद्ध धर्म के चार मुख्य तीर्थ स्थलों में से एक है। कहा जाता है कि सारनाथ का धामेक स्तूप वो सटीक जगह है जहाँ महात्मा बुद्ध ने अपने पांच अनुयायियों को अपना पहला उपदेश दिया था।
प्रतिभागियों ने सारनाथ संग्रहालय का भी दौरा किया, जो बुद्ध की बेहतरीन मूर्तियों और बौद्ध वस्तुओं से भरा हुआ है।सारनाथ में प्रतिभागी न केवल बौद्ध संस्कृति में मग्न हुए बल्कि शांति और साधना से भी ओतप्रोत हुए।

Saudis and Expats Converge to Hear Sadhguru Speak about Save Soil (12 May)

Sadhguru received a very warm welcome in Riyadh. He addressed an enthusiastic and highly engaged public gathering organized by the Embassy of India, Riyadh, answering questions of all kinds, and of course – talking about Soil.

दूसरा दिन: काशी विश्वनाथ से मार्कण्डेय महादेव तक

सारनाथ के अद्भुत अनोखे वातावरण ने भक्तों को उसके लिए तैयार किया जो आगे आने वाला था - काशी विश्वनाथ मंदिर में मंगला आरती का अनुभव लेने का अवसर, जहाँ बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक उपस्थित है। माना जाता है, इसे स्वयं
आदियोगी ने प्रतिष्ठित किया था। मंगला आरती दिन की पहली आरती होती है जो मंदिर में हर सुबह 3 से 4 बजे के बीच होती है, ब्रह्म मुहूर्त के समय।

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आरती के बाद दिन भर के लिए ऊर्जावान होकर, सारा दल वाराणसी के देवी मंदिरों के दर्शन के लिए पैदल निकल पड़ा, विशालाक्षी मंदिर, मीर घाट पर निर्मित शक्ति स्थलों में से एक, और अन्नपूर्णा मंदिर, जो अन्न की देवी को समर्पित है।

भक्तगण उसके बाद काल भैरव के मशहूर मंदिर की तरफ बढ़े - शिव का सबसे भयानक और उपसंहारक रूप - जहाँ सबने काल भैरव आरती की शक्तिशाली ऊर्जा और कृपा का अनुभव किया, इसके बाद महामृत्युंजय मंदिर में लिंग दर्शन किए, जहां शिव के उस रूप की पूजा होती है जिसने मृत्यु पर विजय प्राप्त कर ली है।

चाहे पर्यटक हो या तीर्थयात्री, जो भी काशी आता है उसके लिए पवित्र गंगा में नौका विहार एक मुख्य आकर्षण है। भक्तगण नाव पर बैठकर गंगा और गोमती नदी के संगम में जाने के लिए उत्साह से भरे थे। नौका विहार के बाद सबको मार्कण्डेय महादेव मंदिर में ध्यान करने का मौका मिला। दंतकथाएं बताती हैं कि जब कोई इस लिंग के आस-पास होता है, तो मृत्यु उसे छू नहीं सकती।

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तीसरा दिन: सद्‌गुरु के साथ सत्संग और मणिकर्णिका घाट

आखिरकार सद्‌गुरु के साथ सत्संग का वो मुख्य अवसर आया जिसका लम्बे समय से इंतज़ार था: सद्‌गुरु बोधि दिवस। 23 सितंबर की सुबह सद्‌गुरु ने काशी विश्वनाथ मंदिर में अभिषेक किया, जिसके बाद भक्तों को नवनिर्मित काशी कॉरिडोर में सद्‌गुरु के दर्शन हुए। पैदल यात्रियों के लिए बना चौड़ा रास्ता काशी विश्वनाथ मंदिर को तीन मुख्य घाटों से जोड़ता है।

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बोधि दिवस का सत्संग दोपहर के बाद शुरू होना था। सद्‌गुरु के हॉल के अंदर आने से पहले काशी विश्वनाथ मंदिर के पुजारियों ने - जो कुछ साल पहले कोयंबटूर के ईशा योग केंद्र में अगस्त्य जयंती के मौके पर सप्तऋषि आरती करने आ चुके हैं - सद्‌गुरु का स्वागत ऊर्जा से भर देने वाली आरती से किया।

सत्संग में सद्‌गुरु ने कई विषयों को छुआ, स्त्रीत्व के सही मतलब से लेकर, किसी की माँ की मृत्यु से उबरने तक, और किस तरह से लोग काशी के विकास में योगदान दे सकते हैं।

मणिकर्णिका घाट, जो श्मशान घाटों में सबसे श्रेष्ठ है, और हमारे अस्तित्व के परम सत्य - मृत्यु का लगातार स्मरण कराता है, यहाँ समय बिताए बिना काशी की तीर्थयात्रा अधूरी है। इसलिए सत्संग के बाद भक्तगण मणिकर्णिका घाट की तरफ बढ़े, जहाँ उन्हें सद्‌गुरु के साथ थोड़ा और समय बिताने का मौका मिला। घाट के प्राकृतिक और गहन वातावरण में प्रतिभागी इस सत्य के प्रति जागरूक हुए कि हम इंसान यहाँ बहुत कम समय के लिए हैं।

चौथा दिन: महादेव को समर्पित कुछ और मंदिर

आखिरी दिन भी मंदिर दर्शन के बिना नहीं था - मंदिरों और धार्मिक स्थलों से भरा हुआ यह शहर! सुबह के समय भक्त मल्लिकार्जुन महादेव और बैद्यनाथ मंदिर की तरफ उमड़े, यह दोनों ही मंदिर आंध्र प्रदेश के मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग और
झारखण्ड के बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग के ऊर्जा प्रतीक हैं। काशी-यात्रा का यह कार्यक्रम गुरु पूजा के साथ संपन्न हुआ।