
हाथ जुड़ जाते हैं, सिर झुक जाता है
मन जपता है मंत्र,
फिर भी आत्मा में होती है एक गहरी शांति।
हे मेरे गुरु, आपकी कृपा में हो रहे सराबोर
हो रहे हैं आपके संग एक
जो है आपकी दिव्य इच्छा।
अतीत के निशान, भविष्य का भय
कर देते हैं नष्ट
वर्तमान के अनमोल पलों को
बनकर आप प्रकाश,
करते हैं पोषित अमृत बनकर
और लहराता है हमारे भीतर
एक प्रेम का सागर!
हे गुरु, शिखर पर होते हैं आप
अपने भीतर आनंदित और धन्य
फिर भी आप उतर आए हैं,
हमारी शोर भरी घाटी में
और चुना है आपने सब कुछ साझा करना,
परवाह करना और मुस्कुराकर जीत लेना
हमारा मन, दिल और आत्मा,
हाँ, नहीं छोड़ा कुछ भी!
हे सद्गुरु, हमारे खुशी के आंसू
बहते हैं निरंतर
आपके शब्द करते हैं प्रबुद्ध
और आपका मौन देता है हमें चमक
साधना करती तीव्र भीतर की आग को
भक्ति विलीन करती है हमें शून्य में।
हम धन्य हैं कि आपकी कृपा में,
रह सकते हैं युगों तक!
-डॉ सुजीत कुमार मुल्लापल्ली, मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट, चेन्नई