जीवन के रहस्य

गौतम बुद्ध के पूर्व जन्मों की 3 कहानियाँ

क्या आपने कभी सोचा है कि महान गुरुओं ने ज्ञान प्राप्ति के लिए कैसे साधना की?
यहाँ प्रस्तुत हैं गौतम बुद्ध के पूर्व जन्मों की

3 आश्चर्यजनक घटनाएँ:

सद्‌गुरु: बुद्ध बनने से पहले गौतम ने ज्ञान प्राप्ति के लिए कई जन्मों तक काफ़ी कोशिशें कीं। क्योंकि आगे ले जाने वाला कोई ख़ास गुरु उनके पास नहीं था, ना ही उनमें ऊर्जा की स्वाभाविक तीव्रता थी, इसलिए उन्होंने करुणा और प्रेम जैसे गुणों से ख़ुद को पूर्ण करने की कोशिश की। कई सुंदर कथाओं में उन्होंने अपने पूर्वजन्मों के बारे में बताया है।

राजा ने पक्षी को बचाने के लिए अपना मांस भेंट किया

बुद्ध एक जन्म में राजा शिबी के नाम से जाने जाते थे। अपने पूर्वजन्मों के सत्कर्मों से उनका जन्म राजपरिवार में हुआ था। आगे जाकर उन्होंने कई युद्ध किए और एक बड़े साम्राज्य के सम्राट बने। फिर उन्हें अपने अपना पिछला जन्म याद आया और इस बात का बोध हुआ कि उनका जन्म एक राजा बनने और शासन करने के लिए नहीं हुआ है, बल्कि मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रयास करने और दूसरों को आध्यात्मिक मार्ग दिखाने के लिए हुआ है। तब उन्होंने करुणा के मार्ग पर चलना शुरू किया।

एक दिन वे जंगल में बैठे थे और साधना की कुछ क्रियाएं करना चाहते थे। तभी एक घायल पक्षी तड़पता हुआ उनकी गोद में आकर गिरा। उन्होंने पक्षी को उठाया और देखा कि किसी शिकारी के तीर से पक्षी का एक पंख टूटा हुआ है। अपने वस्त्र में से एक टुकड़ा फाड़कर वे उस घायल पक्षी की मरहम पट्टी करने की कोशिश करने लगे। इसी बीच शिकारी वहां आ पहुंचा और बोला, ‘ये पक्षी मेरा है, आपको इसे मुझे देना होगा।’ राजा शिबी ने कहा, ‘ये पक्षी मेरी गोद में आकर गिरा है, तो मुझे इसे तुम्हे देने की जरूरत नहीं है।’

शिकारी ने उन्हें याद दिलाया, ‘आप राजा हैं, आप ख़ुद इस राज्य के क़ानून हैं और आप ही क़ानून तोड़ रहे हैं। इस राज्य का कानून है कि शिकार उसी का होता है जिसने उसे मारा हो। क्या आप इस राज्य का नियम तोड़ना चाहते हैं? और मेरे भोजन का क्या होगा? ये मेरी आजीविका है। आप मेरे शिकार किए हुए पक्षी पर अपना दावा कर रहे हैं। आने वाली पीढ़ियां आपको इस कार्य के लिए धिक्कारेंगी। आपको ऐसा राजा कहा जाएगा जो ख़ुद नियम बनाता है, और फिर अपनी सुविधा के लिए उन नियमों को तोड़ता है।’

तब राजा शिबी ने कहा, ‘मैं राज्य के नियमों को जानता हूँ, लेकिन मैं उनसे भी ऊपर के नियमों को जानने और उनके अनुसार चलने की कोशिश कर रहा हूँ। केवल मुझे इस एक पक्षी के प्रति करुणा की इजाज़त दे दो।’ शिकारी ने कहा, ‘नहीं, मुझे किसी ऊपर के कानून के बारे में नहीं पता। मुझे तो केवल इस राज्य के कानून के बारे पता है। मैं उसी के आधार पर चलता हूँ और आपसे भी उसी क़ानून पर चलने की उम्मीद करता हूँ।’ शिबी ने उस पक्षी की तरफ देखा। वह पक्षी शिबी की तरफ दयनीय होकर देख रहा था। तब राजा शिबी ने कहा, ‘ठीक है, इस पक्षी के वज़न के बराबर मैं तुम्हें अपनी जंघा से मांस काटकर दूंगा।’

शिकारी ने राजा की तरफ देखा और उसे लगा कि ये राजा की उसे धोखा देने की एक चाल है। शिकारी ने कहा, ‘ठीक है, इस पक्षी का वज़न कीजिए और मुझे उतने वजन का मांस दे दीजिए, क्योंकि मुझे तो भोजन चाहिए।’ शिबी ने एक छुरा निकला, अपनी जंघा का कुछ हिस्सा काटा और शिकारी को दे दिया। इस घटना के बाद वे अपना शेष जीवन लंगड़ाते हुए चलते रहे।

[1] In some versions of the story, it is a hawk.

दान की पराकाष्ठा

अगले जन्म में वे फिर से राजा बने। आध्यात्मिक मार्ग पर अब वे कहीं ज्यादा आगे बढ़ गए थे और जानते थे कि वे अंतिम मुक्ति की तरफ़ बढ़ रहे हैं, इसलिए अपनी सारी धन-दौलत दान में दे रहे थे। उन्होंने ऐसी कई भव्य जगहें बनवाईं जहां लोग अपनी आध्यात्मिक साधना के लिए आकर रह सकें। वह लोगों की हर माँग नि:संकोच पूरा करने लगे। उनके दान की बातें चारों ओर फ़ैल गईं और हर किसी को पता था कि अगर उसे कुछ चाहिए तो उसे केवल वहां जाकर राजा से मांग करनी है। वे कभी किसी को 'ना ' नहीं कहते थे, चाहे वो जो भी मांगे। उन्होंने अपने जीवन में ये वचन लिया था कि अगर किसी ने कुछ माँगा तो वे कभी 'ना ' नहीं कहेंगे।

वे इस सीमा तक पहुँच गए कि उन्होंने कहा, ‘अगर कोई मेरे शरीर के अंग भी मांगे तो उन्हें भी मैं काटकर दान कर दूंगा।’ देवताओं के राजा इंद्र को लगा कि ये व्यक्ति तो बहुत लोकप्रिय हो रहा है। हर कोई इसकी तारीफ़ कर रहा है।’ तो एक दिन इंद्र एक बूढ़े और अंधे ब्राह्मण का वेश धरकर उस राजा के पास आए। राजा ने उनसे पूछा, ‘आपको क्या चाहिए?’ ब्राह्मण ने कहा, ‘मैंने अपनी दोनों आँखें खो दी हैं। आपके पास दो खूबसूरत आँखें हैं। आपको इस जीवन के लिए एक आँख काफी है। आप अपनी एक आँख मुझे दे सकते हैं।’

राजा ने कहा, ‘इस क्षण तक किसी ने मुझे ये सुअवसर नहीं दिया था। मैं वास्तव में इस इंतज़ार में था कि कोई कुछ बहुत बड़ी चीज़ माँगे। आप पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने इतनी बड़ी मांग रखी है। मुझे इतनी ख़ुशी है कि मैं आपको अपनी दोनों आँखें दान करता हूँ।’ सारे मंत्रियों और आसपास के लोगों ने कहा, ‘ये संभव नहीं है। यह ब्राह्मण आपकी उदारता का दुरुपयोग कर रहा है। और सबसे बढ़कर वो आँखों का करेगा क्या? वो केवल अपनी गरीबी और दूसरों की धन-दौलत देखकर और कष्ट में रहेगा। आप राजा हैं, आप इस संसार की आँखें हैं। ये आपका उत्तरदायित्व है कि आप अपनी दोनों आँखें संभालकर रखें। आपका अंधा हो जाना जनहित में नहीं है।’

उनकी बातों को अनसुना कर राजा ने कहा, ‘मैंने पहले ही उसे वचन दे दिया है। मैं उन लोगों में नहीं हूँ जो अपने वचन से पीछे हट जाएं। इस ब्राह्मण ने मुझसे एक आँख मांगी, मैं उसे दोनों आँखें दान करता हूँ और उन्होंने वास्तव में अपनी दोनों आँखें निकालकर उस ब्राह्मण को दे दीं। इस तरह वे कई-कई जन्मों तक कठोर प्रयत्न करते रहे।


साधु ने भूखी शेरनी के लिए अपनी बलि दी

एक दूसरे जन्म में वे एक साधु थे। ये उनके गौतम के रूप में जन्म लेने से दो जन्म पहले की बात है। उनका एक शिष्य हमेशा साथ में रहता था। वे दोनों जंगल में भटक रहे थे। उन्हें एक गुफा दिखी और वे दोनों उसके अंदर गए। उन्होंने वहाँ एक शेरनी को देखा जिसने तभी कुछ बच्चों को जन्म दिया था और वो बहुत भूखी थी। आसपास उसके खाने के लिए कुछ नहीं था। उसमें अपने बच्चों के प्रति एक सहज वात्सल्य भाव था लेकिन उसके भूख की आग ऐसी थी कि वह अपने बच्चों को ही खाने के कगार पर थी।

उस साधु ने ये सब देखा और कहा, ‘अगर इस भूखी शेरनी ने अपने ही बच्चों को खा लिया तो वो वात्सल्य भाव जो इस शेरनी के हृदय में अपने बच्चों के लिए है उसकी पवित्रता इस संसार से नष्ट हो जाएगी। मैं ऐसा होने नहीं दूंगा।’ उन्होंने अपने शिष्य को उस शेरनी के लिए कुछ खाना लाने भेजा। लेकिन उन्होंने देखा कि इंतज़ार करने का समय नहीं था, नहीं तो वो शेरनी अपने ही बच्चों को खा जाती। तो उन्होंने एक पत्थर उठाया और अपने ही सर पर प्रहार करके उस भूखी शेरनी के सामने उसका भोजन बनने के लिए गिर पड़े।

उनका शिष्य जो बाहर गया था भोजन ढूंढने में असफल रहा। जब वो वापस आया तो उसने देखा कि शेरनी उन साधु का आधा शरीर खा चुकी थी। उसे पूरी घटना समझ में आई और वो ऐसे गुरु को पाकर धन्य हुआ जिन्होंने एक भूखी शेरनी को अपने ही बच्चों को खाने से बचाने के लिए अपना शरीर उसके सामने पेश कर दिया।

मेरा क्या?

इस प्रकार गौतम बुद्ध अपनी परम मुक्ति से पहले करीब-करीब 15 से 18 जन्मों तक कठोर साधना करते रहे। उनके अनुभव में ये कष्टदायक नहीं था लेकिन दूसरों की दृष्टि में ये निश्चित ही कष्टकारी था। एक तरीका ये है जिसमें हम ऐसी व्यवस्था और प्रबंध करते हैं जिससे हम लोगों पर कार्य कर सकें और वे धीरे-धीरे प्रगति करें। नहीं तो अगर हम चाहते हैं कि थोड़े समय में न केवल मौजूद लोगों को ज्ञान प्राप्ति हो जाए बल्कि ऐसी व्यवस्था हो जाए कि आने वाली पीढ़ियाँ भी मुक्ति हासिल कर सकें, तो हमें निश्चित ही ‘मैं क्या हूँ’ और ‘मैं क्या नहीं हूँ’ के परे देखना होगा। ‘मेरा क्या’ जैसी सोच और आध्यात्मिकता का एक साथ चलना संभव नहीं है।