सद्‌गुरु एक्सक्लूसिव

विशुद्धि: नीले रंग की रहस्यमयी शक्ति

सात प्रमुख चक्रों में से शायद विशुद्धि सबसे रहस्यमयी है। ऐसा कैसे हुआ कि हमारे योग-अभ्यासों में से शायद ही कोई इस ऊर्जा-केंद्र पर केंद्रित है, जबकि आदियोगी के चित्रण में यही मुख्य बिंदु है। जानने के लिए पढ़िए:

सद्‌गुरु: विशुद्धि का असली मतलब है छन्नी। विशुद्धि ऐसा आयाम है जिसे आमतौर पर हम छोड़ देते हैं, क्योंकि विशुद्धि के सक्रिय होने का अर्थ है, यह आपको रहस्य-विद्या में सक्षम बना देगा। इसका अर्थ है, यदि आपकी ऊर्जा विशुद्धि पर केंद्रित है और आपने इस पर पर्याप्त महारत हासिल कर ली है, तो आप क्षमता के उस स्तर पर काम करने लगेंगे कि दूसरों को आप एक महामानव की तरह दिखाई देंगे। लेकिन हुआ केवल इतना होगा कि आपने काम करने के दूसरे तरीकों तक पहुंच हासिल कर ली है।

कई तरीकों से आदियोगी इसके प्रतिनिधि हैं। इसी वजह से उनके कई नाम उनके विशुद्धि पर महारत से जुड़े हैं। उन्हें विषकंठ, नीलकंठ आदि नामों से बुलाया जाता है, जो उन्हें विशुद्धि के साकार रूप की तरह दिखाता है। ऐसा इसलिए नहीं कि उनमें केवल यही एक गुण है, बल्कि लोग केवल उसे ही पहचानते हैं जो उनकी समझ से परे होता है।

जैसे अगर आप ईसा मसीह की बात करें, तो हमें ये याद नहीं रहता कि उन्होंने क्या-क्या किया, या उनके क्या उपदेश थे। लेकिन ईसा मसीह का नाम लेते ही पहली चीज जो लोगों को उनके बारे में याद रहती है, वह यह कि वह पानी पर चले थे। इसी तरह आदियोगी या शिव वैसी चीजों को करने के लिए प्रसिद्ध हैं जो दूसरे लोगों की सामान्य क्षमताओं के परे या असंभव लगती हैं। लोगों ने उन्हें उनकी विशुद्धि की क्षमताओं के कारण जानना शुरू कर दिया। उनकी दूसरी क्षमताएं इतनी सूक्ष्म थीं कि उन पर लोगों का ध्यान नहीं जाता था।

लोग कुछ ऐसा देखना चाहते थे जो उनकी समझ में सामान्य लगने वाली चीजों से परे था। दूसरे शब्दों में वह कुछ विचित्र देखना चाहते थे। यदि आप किसी को विशुद्धि साधना में लगाते हैं, तो दूसरे लोगों की नजर में वे अजीब दिखने लगेंगे।

मान लीजिए किसी समाज में ऐसी परंपरा विकसित कर दी गई हो कि बच्चों के जन्म के बाद उसकी नाक काट दी जाती हो जिससे ऑक्सीजन ग्रहण करने की क्षमता 22% तक बढ़ जाएगी, जिससे वह अधिक स्वस्थ और बेहतर होगा। यदि उस समाज में एक आदमी अपनी पूरी नाक के साथ दिखाई दे तो उसे सब विचित्र ही समझेंगे।

यदि किसी का विशुद्धि चक्र सक्रिय हो जाए, तो वह ऐसी ऊर्जा क्षमताओं को खोल देता है, जो दूसरों के लिए सामान्य नहीं है। हमारे आसपास की परिस्थितियों को बदलने और रूपांतरित करने के लिए विशुद्धि की एक विशेष क्षमता होना आवश्यक है। लेकिन यदि कोई विशुद्धि पर केंद्रित है तो उसका सामाजिक ढांचे में फिट होना थोड़ा मुश्किल है।

आपने आदियोगी की कहानी सुनी होगी। कई बार वे बहुत दैदीप्यमान, अद्भुत और पुरुषार्थ का अवतार होते हैं। लेकिन फिर दूसरे ही पल वे अजीब, पागल और अलग ही स्थिति में होते हैं। जब विशुद्धि की सक्रियता में लोगों ने उन्हें देखा तो वह कभी श्मशान भूमि में दिखे, अजीबों से भी अजीब हालत में दिखे। उनके आसपास गण और हर तरह के प्राणी थे। क्योंकि जिस समय विशुद्धि सक्रिय होती है, बिना शरीर वाले प्राणी स्वाभाविक रूप से आपके पास आ जाते हैं।

जब हम ध्यानलिंग की प्राण प्रतिष्ठा कर रहे थे, तब मैं लोगों को अलग-अलग चक्र के लिए तैयार कर रहा था। लेकिन विशुद्धि एक ऐसा आयाम था जिसके लिए मैं किसी भी व्यक्ति को तैयार नहीं कर सका। क्योंकि हमारे पास कोई इतना पर्याप्त अजीब व्यक्ति नहीं था, जो कम समय में बड़े बदलाव के लिए तैयार हो पाए। हमारे पास समय बहुत कम था। तो मैंने एक अशरीरी प्राणी की मदद लेने का निश्चय किया। एक योगी जिन्होंने विशुद्धि पर एक विशेष स्तर तक शक्ति प्राप्त कर ली थी।

उस रात वहाँ 400 के आसपास लोग इकट्ठा थे। जब हमने प्रक्रिया की शुरुआत की, एक नाग किसी तरह से भीड़ में से रेंगकर आ गया और एक छोटे गड्ढे में बैठ गया, जिसे मैंने कुछ करने के लिए बनाया था। मैं समझ गया कि यह महाशय मेरे साथ मुफ्त की यात्रा करने की कोशिश कर रहे हैं। मैंने उसे उठाया एक बैग में बंद किया और किसी से कहा कि उसे जंगलों में ले जाकर छोड़ आए। उन्होंने वही किया। कुछ घंटे बाद वह उसी गड्ढे में वापस आ गया। वह वहाँ रहना चाहता था, क्योंकि वह देख रहा था कि यह उसके लिए एक अवसर है।

जब आपका विशुद्धि सक्रिय होता है तब आप भावनाओं की मधुरता और समझदार मन के साथ रहते हैं, और इस दुनिया से अनछुए रहकर भी इसमें जैसे चाहे वैसे घूमते रहते हैं।

जब मैं लंबे समय के लिए ध्यान करना चाहता था, तब कभी-कभी मैं चामुंडी हिल पर चला जाता था या कई बार मैसूर के पास एक छोटे से जंगल में, जिसका नाम आलोक है। एक बार दोपहर में मैं वहाँ बैठकर ध्यान कर रहा था। कुछ घंटे तक ध्यान करने के बाद जब मैंने अपनी आंखें खोली, वहाँ 12 से 15 नाग मेरे सामने बैठे हुए थे और मुफ्त की सवारी का इंतजार कर रहे थे। एक बार जब विशुद्धि सक्रिय होती है तो वे वहाँ आ जाते हैं। आदियोगी के गले के पास कोबरा इसी बात का प्रतीक है कि उनकी विशुद्धि इतना सक्रिय है नाग उनके गले को नहीं छोड़ेगा।

विशुद्धि के साथ कुछ ऐसा है जिसकी वजह से हम अधिकतर लोगों के लिए इसे छोड़ देते हैं। क्योंकि जो आत्म-ज्ञान की तलाश में हैं उन्हें इन सब चीजों से गुजरने की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन वे लोग जो जीवन की विभिन्न तकनीकों को खोजना चाहते हैं, वे लोग जो कुछ सौंपना चाहते हैं, वे जो भविष्य के लिए एक भंडार बनना चाहते हैं, उन्हें इन सब चीजों से गुजरने की जरूरत होती है। लेकिन जो लोग सिर्फ आत्म-बोध चाहते हैं उनके लिए ये चीजें जरूरी नहीं। वैसे यह बहुत आसान है, आपके सिर पर एक हल्की सी दस्तक से किया जा सकता है।

जब कोई विशुद्धि पर केंद्रित होता है, तो उसके आसपास नीले रंग की आभा विकसित हो जाती है। यही कारण है कि भारत में इतिहास के बहुत सारे सक्रिय, सक्षम लोगों को नील-वर्ण के शरीर वाला बताया जाता है। ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि उनकी त्वचा का रंग नीला था बल्कि जिनमें आवश्यक जागरूकता थी, वे देख पाए कि उन लोगों की आभा नीली है। भारत में नीले शरीर वाले लोगों की कई कहानियाँ हैं। नीला शरीर भावनाओं की मधुरता और मन की समझ के साथ-साथ गतिशीलता का प्रतीक है।

यदि भावनाओं की मधुरता बहुत अधिक हो तो संभव है कि आप दुनिया में उलझना नहीं चाहें। फिर आप जिस तरह से हैं उसी में खुश होंगे। यदि मन की समझ और बुद्धिमत्ता, बोध की परम स्पष्टता तक पहुंच जाए तो आप दुनिया में शामिल नहीं होना चाहते। आप एकाकी हो जाते हैं। आपको किसी से कोई लेना-देना नहीं होता।

विशुद्धि अनाहत और आज्ञा चक्र के बीच में स्थित होता है। जब आपका विशुद्धि सक्रिय होता है तब आप भावनाओं की मधुरता और समझदार मन के साथ रहते हैं, और इस दुनिया से अनछुए रहकर भी इसमें जैसे चाहे वैसे घूमते रहते हैं। इस तरह से रहकर आप एक अलग ही किस्म के प्रेम संबंध में होते हैं - किसी व्यक्ति या किसी वस्तु के साथ नहीं, आपकी भावनाएं पूर्णतः आपके नियंत्रण में होती हैं। आप उन्हें जैसा चाहें वैसा बना लेते हैं।