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शिव का रहस्य: शून्य से असंख्य रूपों तक

इस आलेख में सद्‌गुरु शिव के अनेक आयामों को स्पष्ट करते हुए योग-विद्या को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़ते हुए समझा रहे हैं। एक स्तर पर शिव को सबको समाहित कर लेने वाले शून्य के रूप में जाना जाता है- जो ब्रह्मांडीय शून्यता के समान है। दूसरे स्तर पर शिव सबसे पहले योगी हैं जिनकी रहस्यमयी उपस्थिति योग की अनगिनत कहानियों में दिखाई देती है। सद्‌गुरु के अनुभव और उनकी अंतर्दृष्टि मानसरोवर, कैलाश और मानव उत्पत्ति के रहस्यमयी और गूढ़ संबंधों को और रोचक बनाती है।

प्रश्न: सद्‌गुरु योग विज्ञान और आपकी अपनी समझ के अनुसार शिव की वास्तविक प्रकृति क्या है?

शिव की प्रकृति – एक पहेली

सद्‌गुरु: जब हम कहते हैं शिव, तो इसके दो पहलू हैं। हम एक साथ एक रास्ते से दूसरे रास्ते पर छलांग लगाने की बात कर रहे हैं। एक है - जब हम कहते हैं ‘शिव’ तो हम बात कर रहे होते हैं ‘वो जो नहीं है’ या अस्तित्व की विशाल रिक्तता की। आज विज्ञान इस दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने शिव शब्द का उच्चारण नहीं किया है, लेकिन वे ‘डार्क स्पेस’, ‘डार्क एनर्जी’ और ‘डार्क मैटर’ की बात कर रहे हैं। वे कहते हैं कि यह ‘डार्क एनर्जी’ या ‘डार्क मैटर’ पूरी सृष्टि का आधार हो सकता है और यही अस्तित्व या ब्रह्मांड में सबसे ज्यादा मौजूद है।

चलिए इन सारे वैज्ञानिक नजरिए को किनारे रखते हैं। खुद की समझ के हिसाब से देखते हैं - यदि आप रात में आकाश को देखें तो जिसे आप आकाशगंगा कहते हैं, उसकी उपस्थिति बस जरा सी दिखती है। सबसे ज्यादा उपस्थिति रिक्तता यानी खालीपन की या अंधेरे की ही है। इसी रिक्त स्थान यानी ‘वो जो नहीं है’ उसे ही शिव कहते हैं। इसी शून्यता की गोद में अस्तित्व का निर्माण हुआ है। इसीलिए हम कहते हैं कि सारा ब्रह्मांड शिव की गोद में है। यह शिव का एक पहलू है - जो परम है, वही शिव है। लेकिन हम शिव को आदियोगी, सबसे पहले योगी के रूप में भी देखते हैं।

जब हम कहते हैं ‘शिव’ तो हम बात कर रहे होते हैं ‘वो जो नहीं है’ या अस्तित्व की विशाल रिक्तता की।

हम इन दोनों में अधिक अंतर नहीं करते, क्योंकि यह बहुत ज्यादा अलग नहीं है। जब हम कहते हैं कि वे आदियोगी हैं – तो दरअसल एक योगी वह व्यक्ति है जिसने हर चीज को अपने हिस्से के रूप में शामिल कर लिया है। केवल शाश्वत आकाश ही हर चीज को अपने हिस्से के रूप में शामिल कर सकता है। केवल वही, ‘जो कुछ नहीं है’ – ऐसा कर सकता है।

बगैर किसी ज्यादा अंतर के एक समय हम योगी की बात करते हैं, एक ऐसा व्यक्ति जो इस पृथ्वी पर शिव की तरह आया, दूसरे ही क्षण हम शिव को असीमित संभावना के रूप में देखते हैं। आधुनिक भौतिकी इस बात से सहमत है कि समय तथा स्थान सापेक्ष हैं। जो भी छोटा, बड़ा, परमाणु जितना छोटा या ब्रह्मांड जितना विशाल है, वह सब मानव की समझ है, वास्तविकता नहीं। तो व्यक्ति के रूप में शिव और अनंत संभावना के रूप में शिव के बीच अंतर बस हमारी समझ का है, वास्तविकता में ऐसा अंतर नहीं है। यह संस्कृति और यहाँ का योग विज्ञान, दोनों पहलुओं की बात एक साथ करता है।

शिव का जीवन और प्रभाव

यदि आप शिव के जीवन से जुड़ी कहानियों को देखेंगे तो उनका वर्णन एक अच्छे आदमी के रूप में नहीं किया गया है। उनके पास अच्छे या बुरे की कोई अवधारणा नहीं थी - वे केवल जिए। वे जहाँ भी गए पहले लोगों ने उनका विरोध किया। उन्होंने जो भी प्राप्त किया वह दुनिया ने उन्हें बेमन से दिया, कभी भी इच्छा से नहीं दिया। इसके बारे में कई कहानियाँ हैं कि कैसे लोग उनसे घृणा करते थे, लेकिन आखिरकार उनकी शाश्वत प्रकृति के कारण उन्हें स्वीकार कर लेते थे। वह इतने अधिक समावेशी हैं कि लोग अंततः उनका विरोध छोड़ देते हैं।

शिव के बारे में अनगिनत कहानियाँ है, लेकिन एक भी कहानी उनके बचपन की नहीं है। क्योंकि लोगों ने उन्हें बड़े रूप में ही देखा। उनके माता-पिता के बारे में एक शब्द भी नहीं कहा गया है। कोई माता-पिता नहीं, कोई बचपन नहीं, कोई बुढ़ापा नहीं, कोई समाधि नहीं – यही शिव का जीवन है।

कहानियां कहती हैं कि वे यहाँ थे। वह एक मनुष्य की तरह आए और फिर एक लंबे समय अंतराल के लिए गायब रहे, फिर वापस आए और फिर लंबे समय अंतराल के लिए गायब हो गए और फिर वापस आए। जहाँ भी वे जाते थे, उनके आसपास मित्रों का एक बड़ा समूह होता था- असुर, भूत और विक्षिप्त प्राणी।

शिव के मित्रों का दल इंसानों की तरह नहीं दिखता था, वो कर्कश आवाजें पैदा करते थे और वैसा व्यवहार नहीं करते थे जैसा समाज चाहता है। लेकिन वह उनके दोस्त थे और हमेशा उनके साथ घूमते थे। उन्हें गण के रूप में जाना जाता है और आप कई मंदिरों में इन प्राणियों के चित्र देख सकते हैं।

कोई माता-पिता नहीं, कोई बचपन नहीं, कोई बुढ़ापा नहीं, कोई समाधि नहीं – यही शिव का जीवन है।

शिव और उनके मित्र मनुष्य नहीं थे। शिव यहाँ थोड़े समय के लिए होते थे और फिर गायब हो जाते थे और बाद में फिर आ जाते थे। मानवीय चेतना के निर्माण में और यहाँ तक कि मानव शरीर के निर्माण में भी ऐसा लगता है कि कुछ बाहरी प्रभाव है। मेरे भीतर यह एक सच्चाई बन गई है, जब से मैंने मानसरोवर में उस लगातार हो रहे लेन-देन को देखा है।

मानवीय उत्पत्ति का खगोलीय संबंध

मानव प्रजाति की उत्पत्ति के बारे में काफी वैज्ञानिक शोध होते रहे हैं। अधिकांश सिद्धांत यह बताते हैं कि आधुनिक मानव का विकास अफ्रीका में हुआ। लेकिन मानव की कई महत्वपूर्ण आनुवंशिक खोजें मध्य एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप में भी देखी गई हैं, जो ठीक वहीं हैं जहाँ कैलाश और मानसरोवर स्थित है। निश्चित रूप से यह तथ्य अभी भी विवाद का विषय है।

हालांकि ऊर्जा के स्तर पर मानसरोवर और कैलाश के बीच एक गहरा संबंध है। कैलाश ज्ञान और कृपा का एक पर्वत है जबकि मानसरोवर झील बिल्कुल अलग है। लेकिन जिस तरह से हमारा ऊर्जा-तंत्र इन दोनों के सामने रेस्पॉन्ड करता है उसमें एक समानता है। मानसरोवर और कैलाश के पास मौजूद प्राणियों के बीच की भौगोलिक नजदीकी महज इत्तेफाक नहीं है। हो सकता है शिव सबसे पहले वहाँ रहे हों, लेकिन बहुत सारे दूसरे लोगों ने भी कैलाश में अपने ज्ञान को जमा किया है।

जो प्राणी हमने मानसरोवर में देखे वे मेरे पूर्व के किसी भी अनुभव से बिलकुल अलग थे। मेरे बोध ने मुझे हमेशा दूसरे आयामों और प्राणियों तक पहुंचने की क्षमता दी है। लेकिन इतनी संख्या, मात्रा और निकटता में नहीं, जितनी हमने यहाँ पाई।

जहां व्यक्तित्व और एकत्व मिलते हैं

वे मानवता की प्रकृति और मानव तंत्र की कार्यप्रणाली जानते हैं। जो इंसान के लिए बहुत ऊँचे स्तर का बोध हो सकता है, वह उनके लिए सामान्य है। और एक अद्भुत गुण उन्हें बाकी सारे प्राणियों से अलग करता है।

एक बहुत ऊँचे स्तर के मनुष्य में एक ही समय पर अपना एक व्यक्तित्व रखने और साथ ही सब में विलीन हो जाने की क्षमता होती है। लेकिन मानसरोवर के उन प्राणियों में मैंने देखा कि वे सामान्य रूप से समूहों में रहते हैं, जैसे वे सब एक ही शक्ति हों। साथ ही उनका एक अलग व्यक्तित्व भी है। यह बात हमारी समझ के खाँचे में फिट नहीं बैठती जिस तरीके से हम आम तौर पर जीवन को घटित होते देखते हैं।

इस धरती पर जो कुछ भी हम इस जीवन के बारे में जानते हैं, वह इस तरह के अस्तित्व के साथ नहीं समझा जा सकता। ऐसे जीवन रूप जो एक ही समय पर मिले हुए भी हों और अलग-अलग व्यक्तित्व भी हों। नहीं तो, चेतना या तो व्यक्तिगत होती है या फिर सार्वभौमिक, लेकिन यहाँ दोनों ही है - यह व्यक्तिगत भी है और उसी समय सामूहिक भी। यह एक ऐसा तथ्य है जो मानव-बोध के किसी भी खाँचे में फिट नहीं बैठता।

शिव की वंशावली और खगोलीय विरासत

शिव से जुड़ा यह पहलू कि उनकी पृष्ठभूमि मानवीय नहीं है- कई तरीकों से स्थापित है। एक बहुत सुंदर कथा है। शिव का विवाह पार्वती से होना था। पार्वती जो हिमालय के राजा हिमवान और उनकी पत्नी मैना की बेटी हैं। पार्वती को शिव से प्रेम हो गया और वह उनसे विवाह करना चाहती थीं। विवाह के दिन सभी मेहमान अपने सबसे अच्छे वस्त्र- आभूषणों में आते हैं। और शिव अपने मित्रों और अनुचरों के साथ आए, जो नशे में धुत्त होकर अजीब-अजीब सी आवाजें निकाल रहे थे।

कोई भी बाहरी व्यक्ति उन्हें राक्षस, भूत के वश में या नशेड़ी ही समझेगा। फिर शिव आते हैं सिर से लेकर पैर तक राख में लिपटे हुए। बालों में जटा बनी हुई, आंखे चढ़ी हुई, दिखने में पागल से।

शिव ने खुद को खगोलीय कंपनों से बनाया था।

उस एक सुर से नारद ऋषि ने यह बताया कि शिव की वंशावली परम नाद है क्योंकि वे स्वयं-भू हैं। उनके कोई पिता नहीं है, कोई माता नहीं है तो वंशावली का प्रश्न ही कहाँ आता है।

शिव की जीवन के बारे में ऐसी कई कहानियां है जो यह स्पष्ट करती हैं कि उनकी कोई मानवीय वंशावली नहीं है। इससे यह समझ आता है कि वह कहीं और से आए थे। शिव ने खुद को खगोलीय कंपनों से बनाया था।