योग और विवेक

कितनी आवश्यक है गुरु की शारीरिक मौजूदगी?

सद्‌गुरु की भौतिक उपस्थिति के बिना भी उनके प्रति अपनी ग्रहणशीलता को कैसे बनाए रखें – आइए सीखते हैं यह सूक्ष्म कला सद्‌गुरु से ही। एक साधक के भीतर के द्वंद्व और अनुशासन की बात करते हुए सद्‌गुरु एक सच्चे आध्यात्मिक संबंध के सार से पर्दा उठा रहे हैं, जो समय, स्थान और दृष्टि से परे है।

प्रश्नकर्ता: नमस्कार सद्‌गुरु! आजकल हम आपको ईशा योग केंद्र में अधिक नहीं देख पाते हैं और न ही आपके साथ रह पाते हैं। मेरे जीवन में बहुत सारे उतार-चढ़ाव आते हैं और मैं अपनी साधना और भावनाओं से जूझता रहता हूँ। मैं यह कैसे जानूं कि जब आप भौतिक रूप से यहाँ उपस्थित नहीं है, आप तब भी मेरे साथ हैं?

सद्‌गुरु: आपको मेरे साथ होने के लिए क्या चाहिए? क्या आपको लगता है कि इसके लिए मुझे एक ही कमरे में आपके साथ उपस्थित होने की जरूरत है। यहाँ बहुत सारे लोग मेरी पीठ के पीछे बैठे हुए हैं, और कुछ पेड़ की आड़ की वजह से मुझे देख नहीं पा रहे हैं। वह मुझे नहीं देख पा रहे हैं, फिर भी वे मेरे साथ हैं। गुरु के साथ होने के लिए आप गुरु को देखें यह जरूरी नहीं है। क्योंकि जब आप मेरे साथ बैठे होते हैं तब भी अधिकतर समय मैं आपसे कहता हूँ –‘अपनी आंखें बंद कीजिए।’ ऐसा इसलिए है क्योंकि आप मेरे साथ ज्यादा अच्छी तरह तब होते हैं जब आपकी आंखें बंद होती हैं।

अब साधना के साथ आपके संघर्ष के बारे में बात करते हैं। यह 21वीं शताब्दी है, तो हम कुछ चीजें नहीं कर सकते। मैंने कई बार यह साझा किया है कि 20वीं सदी में हमसे साधना कैसे कराई जाती थी। मैंने 11- 12 साल की उम्र में मलादिहल्ली स्वामी के साथ योग करना शुरू किया था, जो एक बहुत ही अच्छे क्रूर इंसान थे। बिल्कुल मेरी तरह। तो सुबह 3:45, 4 बजे साधना शुरू होती थी और चार या साढ़े चार घंटे चलती रहती थी। बहुत तीव्र योग होता था। और हमने पिछली शाम को 7 बजे खाना खाया होता था।

मेरी आदत कुछ ऐसी थी कि इससे फर्क नहीं पड़ता था कि मैंने क्या और कितना खाया है, हर 2 घंटे बाद मैं भूखा होता था। तो हर रात को मैं भूखा सोता था, यहाँ तक कि आज भी। शायद इसीलिए मैं बहुत जल्दी उठता था। तो मैं हमेशा बहुत भूखा होता था और सुबह जो एकमात्र चीज हमें मिलती थी, वह था पानी। तो मैं बहुत सारा पानी पी लेता और योग अभ्यास शुरू कर देता था। वहाँ सिर्फ लड़के होते थे। हमें केवल एक छोटी सी लंगोट पहनने की अनुमति थी और कुछ भी नहीं। और हम सर से लेकर पैर तक अरंडी के तेल में तर रहते थे।

गुरु के साथ होने के लिए आप गुरु को देखें यह जरूरी नहीं है।

तीन या चार घंटे के योग के बाद तेल का जरा सा भी निशान आपके शरीर पर बाकी नहीं रहना चाहिए। सब कुछ या तो आपका शरीर सोख लेता है या वह उड़ जाता है। आपके शरीर में इतना पसीना आता है कि वह पूरी तरह से गायब हो जाता है। क्योंकि लड़के तीन या चार घंटे से योग कर रहे होते थे तो वह थोड़ी देर आराम करना चाहते थे। लेकिन जैसे ही हम बैठते थे वैसे ही सीनियर लड़कों में से एक बांस की छड़ी के साथ आता और हमारी पीठ पर अच्छी सी चपत लगाता और फिर एक बार आपकी पीठ पर मार पड़ने के बाद वैसे भी आप बैठ नहीं सकते।

आपमें से कुछ लोगों को थोड़ा धकेलने की जरूरत पड़ती है क्योंकि शायद आप में इसे खुद ब खुद करने की समझ नहीं है। लेकिन यह 21वीं सदी है इसलिए समझदारी से काम करें। इस धरती पर हजारों साल रहने के अनुभव के बाद हमें यह समझ जाना चाहिए कि हमें बलपूर्वक कुछ करने की जरूरत नहीं है। आप यहाँ जबरदस्ती नहीं लाए गए हैं, आप यहाँ अपनी इच्छा से हैं।

आप जो सोचते या अनुभव करते हैं उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण वह है, जो अस्तित्व के स्तर पर सच है। क्योंकि आप क्या सोचते और क्या महसूस करते हैं वह आपका निजी मामला है - आप जिस क्षण चाहें उसे बदल सकते हैं। इस क्षण आप एक शेर के बारे में सोच सकते हैं, अगले क्षण आप एक फूल के बारे में सोच सकते हैं।

तो आप वैसा क्यों नहीं सोचते और महसूस करते जैसा आप चाहते हैं? ‘नहीं, मेरी भावनाएं तो खुद ही काम कर रही हैं।’ वह खुद काम क्यों कर रही हैं? वह आपकी भावनाएं हैं। यदि मेरा सिर अपने आप ही घूमने लगे तो क्या यह पागलपन नहीं होगा? यह मेरा सिर है, इसे वहाँ जाना चाहिए जहाँ मैं इसे ले जाना चाहता हूँ।

आप जो सोचते या अनुभव करते हैं उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण वह है, जो अस्तित्व के स्तर पर सच है।

ऐसे ही आपके विचार और भावनाएं भी वहीं जानी चाहिए, जहाँ आप उन्हें ले जाना चाहते हैं। इसीलिए आपको योग के अनुशासन का अभ्यास करना चाहिए। यदि आप कोई सहायता चाहते हैं तो आप किसी से बात कर सकते हैं। यहाँ कोई बांस की छड़ी नहीं है। हमारे पास दूसरे तरीके हैं। यह उम्मीद न करें कि चीजें अपने आप ठीक हो जाएंगी।

एक इंसान के तौर पर यह आपका काम है कि आप वहाँ जाएं जहाँ आप जाना चाहते हैं। हो सकता है आप दूसरों को अपनी इच्छा के अनुसार न ले जा पाएँ, लेकिन कम से कम आपको अपनी इच्छा के अनुसार ही चलना चाहिए। बहाने बनाना छोड़ दीजिए, ‘मेरी भावनाएं ऐसी क्यों है?’ आप नियंत्रण के बाहर हैं - यही वजह है कि आप यहाँ हैं। ‘लेकिन सद्‌गुरु सुबह के 5:30 बजे मुझे ऐसा अनुभव नहीं होता।’ सूरज को बोलिए, मुझे नहीं। मैंने 5:30 का समय तय नहीं किया है। गुरु पूजा 5:30 बजे इसलिए निश्चित की गई है जिससे सूरज की पहली किरण को आप देख सकें।

यदि आप सूर्योदय के समय को बदल सकते हैं तो मैं भी सब कुछ बदल दूंगा। आपको अस्तित्व की सच्चाई को स्पष्ट रूप से समझना चाहिए। अस्तित्व की सच्चाई उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है, जो आप सोचते या अनुभव करते हैं, क्योंकि वह आपका काम है। आप इसे जिस क्षण चाहे बदल सकते हैं। लेकिन आप अस्तित्व की सच्चाई को नहीं बदल सकते। वह आपका बनाया हुआ नहीं है। यह जीवन का तरीका है। यदि आप जीवन के सच और अपने मन में उपजे हुए सच के बीच अंतर नहीं कर पाते तो यह पागलपन है। लेकिन क्योंकि आजकल आपके पास बहुत सारे लोग आप जैसे हैं, इसलिए यह आम या सामान्य बनता जा रहा है।

यदि बहुत सारे लोग पागल हैं, तो यह नया सामान्य बन जाता है। दुनिया में हर जगह यही हो रहा है। बहुत सारे लोग कहते हैं, ‘लेकिन, मैं ऐसा ही महसूस करता हूँ।’ मैं उसकी परवाह नहीं करता कि आप क्या महसूस करते हैं। आपको वह महसूस करना चाहिए, जो आप चाहते हैं।