
ईशा योग केंद्र, कोयंबटूर में सरकार के उच्चाधिकारियों के साथ इनर इंजीनियरिंग रिट्रीट कार्यक्रम के दौरान सद्गुरु ने मानव चेतना, समाज के कल्याण और शिक्षा के ऊपर चर्चा की। उन्होंने आधुनिक समाज के विरोधाभास पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यहाँ भौतिक सुख-सुविधाओं की प्रचुरता के बावजूद मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं तेजी से बढ़ती देखी जा रही हैं।
जीवन के दबावों से निपटने के लिए लोगों के द्वारा नशे को अपनाने के खतरे के बारे में चेतावनी देते हुए सद्गुरु ने मानव चेतना को बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उसके बाद चर्चा इस दिशा में मुड़ गई कि तकनीकी तरक्की के आगे आंतरिक विकास नजरअंदाज हो रहा है जहाँ सद्गुरु ने इस बात पर ध्यान आकर्षित किया कि भारतीय सभ्यता में हमेशा से सबको समाहित करने का जो सिद्धांत रहा है वह मानव-जाति के उज्जवल भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
सद्गुरु ने पर्यावरण और मिट्टी को बचाने के महत्व से जुड़े सवालों का भी जवाब दिया, जिसमें दुनिया भर में चलाए गए मिट्टी बचाओ अभियान का संदर्भ दिया गया, जिसका उद्देश्य था मिट्टी की बिगड़ती हालत पर पूरी दुनिया का ध्यान खींचना। वर्तमान शिक्षा में ‘एक-आकार-सभी के लिए फिट’ नजरिए की आलोचना करते हुए, सद्गुरु ने एक ऐसा वातावरण बनाने की वकालत की जो बच्चों के स्वाभाविक विकास और कल्याण को बढ़ावा दे।
सभा की समाप्ति से पहले सद्गुरु ने एक निर्देशित ध्यान करवाया। इसके बाद प्रतिभागियों ने कार्यक्रम से नया दृष्टिकोण और अनुभव प्राप्त करने के लिए आभार प्रकट किया।
दिल्ली में होने वाली एक बातचीत में सद्गुरु और भारत में डेनिश राजदूत, फ्रेड्डी स्वाने ने पर्यावरण स्थिरता, जिम्मेदारी के साथ जनसंख्या वृद्धि और व्यक्तिगत रूपांतरण के बारे में चर्चा की। मानव जाति द्वारा बहुत अधिक उपभोग किए जाने के गंभीर परिणामों को देखते हुए सद्गुरु ने पर्यावरण संबंधी कदम उठाने पर जोर दिया जिसकी जड़ें व्यक्तिगत स्तर पर चेतना के विकास से जुड़ी हैं।
दांत साफ करते समय कम से कम मात्रा में पानी के इस्तेमाल करने जैसे कार्यों को कम प्रभावशाली बताते हुए उन्होंने सामाजिक जिम्मेदारी और गंभीर पर्यावरण समस्या के बीच के भेद के बारे में बताया। सद्गुरु ने फोटोसिंथेसिस के जीवन को बचाने की भूमिका पर बल देते हुए जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए धरती पर हरियाली के आवरण को बढ़ाना एक महत्वपूर्ण कदम बताया।
उन्होंने आगे बढ़ते हुए आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस जैसी उन्नत तकनीकों को स्वीकार किया, और पूर्व और पश्चिमी मूल्यों की तुलना करने से मना करते हुए व्यक्तिगत जागरूकता के अभाव को पूरी दुनिया की समस्याओं का मूल बताया। G-20 के भारतीय अध्यक्षपद के आदर्श वाक्य ‘एक धरती, एक परिवार, एक भविष्य’ के प्रति अपने समर्थन के साथ सद्गुरु ने बातचीत को विराम दिया।
ETNow की विश्व व्यापार सभा के 8वें सत्र में सद्गुरु ने मुख्य भाषण दिया। टाइम्स ग्रुप, दिल्ली द्वारा प्रस्तुत यह कार्यक्रम एशिया की सबसे बड़ी सभाओं में से एक माना जाता है जहाँ विश्व के जाने-माने विचारक, नेता और विशेषज्ञ मिलते हैं और भविष्य के लिए विचार और कार्य-बिंदु साझा करते हैं।
सद्गुरु ने इस चर्चा में कारोबारों के दो स्वरूपों में महत्वपूर्ण अंतर बताया - एक जो व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से प्रेरित होते हैं और दूसरे जो व्यापक दृष्टिकोण से निर्देशित होते हैं। उन्होंने इतिहास के ऊपर एक नजर डालते हुए ये इंगित किया कि पुराने जमाने के व्यापार संघ की बेशुमार दौलत आज की शीर्ष कंपनियों को भी बौना बना देती हैं। उन्होंने इस बात की चेतावनी देते हुए कहा कि जब तक कारोबार आपसी स्पर्धा की घातक मनःस्थिति से निकलकर आपसी सहयोग की मनःस्थिति में नहीं आते, तब तक वे खुद को सही मायने में ‘वैश्विक’ नहीं कह सकते।
ख़ुशहाली की चर्चा करते हुए सद्गुरु ने कहा कि भौतिक सुख-सुविधाओं में आगे बढ़ने के बावजूद मानव जाति की आंतरिक खुशहाली में कोई सुधार नहीं है। उन्होंने कहा कि भौतिक सुख-सुविधाएं जीवन को आरामदायक बनाती हैं, लेकिन वास्तविक खुशहाली हमारे भीतर से आती है। उन्होंने श्रोताओं से बातचीत करते हुए आतंरिक शांति, स्वास्थ्य और आनंद को भौतिक सफलता से अधिक महत्वपूर्ण बताया।
उन्होंने फिर चर्चा के विषय को आगे बढ़ाते हुए आनंद की खोज में मानव जाति द्वारा धरती के दोहन और खुशहाली के लिए रसायनों पर बढ़ती निर्भरता के घातक खतरे से आगाह किया। उन्होंने एक सचेतन और जीवन की आंतरिकता पर केंद्रित रास्ते को अपनाने के बारे में कहा जिससे कि आने वाली पीढ़ियों की क्षमताओं में कमी न हो। मानव शरीर एक शक्तिशाली रासायनिक कारखाना है, इस बात पर जोर देते हुए उन्होंने ये सुझाव दिया कि इनर इंजीनियरिंग जैसी क्रियाओं के द्वारा अपने भीतर के रसायनों के ऊपर काबू पाना एक स्वाभाविक आनंद की स्थिति की ओर ले जाता है।
इस कार्यक्रम को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी संबोधित किया और कहा कि, ‘ये भारत का समय है। विश्व का विकासवादी विशेषज्ञों का प्रत्येक समूह इसी बात की चर्चा कर रहा है कि भारत पिछले 10 सालों में कैसे प्रगति के पथ पर आगे बढ़ रहा है।’ और यह भी कहा कि ‘बाकी सिद्धांतों के साथ-साथ स्थिरता, सामंजस्य और निरंतरता हमारी सम्पूर्ण नीति-निर्माण का प्रथम सिद्धांत है।’
भारत के स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त 2023 के उपलक्ष्य में प्रारम्भ किया गया ‘आर्मी योग इनिशिएटिव’, दक्षिण कमांड और ईशा के द्वारा की गई एक पहल है जहाँ करीब 11,000 सैनिकों को बुनियादी योग प्रशिक्षण दिया जाएगा। 58 ट्रेंड प्रशिक्षकों द्वारा 23 स्थानों पर 125 सत्रों के साथ संचालित यह कार्यक्रम सैनिकों को मिलिट्री सेवा की कठिनाइयों का सामना करने में सहायता करता है। HDFC परिवर्तन की CSR पहल इस परियोजना को समर्थन देती है।
इन रूपांतरित कर देने वाले प्रयासों की सराहना करते हुए लेफ्टिनेंट जनरल अजय कुमार सिंह ने दक्षिण कमांड, पुणे, महाराष्ट्र में इस सत्र का आरम्भ करते हुए कहा कि यह कार्यक्रम दक्षिण कमांड के कर्मचारियों में सकारात्मक बदलाव लेकर आया है।
सद्गुरु ने अपने भाषण में सैनिकों द्वारा सामना की जानेवाली कई चुनौतियों के बारे में बात की और मुश्किल हालातों में संतुलन बनाए रखने के लिए रास्ता बताया। उन्होंने जीवन की किसी भी परिस्थिति को सबसे कठिन परिस्थिति के रूप में न देखने के महत्व पर जोर दिया क्योंकि चुनौतियाँ हर जगह होती हैं। सद्गुरु ने सैनिकों के असैनिक जीवन में रूपांतरण के बारे में भी चर्चा की और सुझाव दिया कि कुछ समय का प्रशिक्षण उन्हें बाहरी दुनिया की अव्यवस्था से सामंजस्य स्थापित करने में लाभदायक रहेगा।
परवरिश के ऊपर प्रश्नों का उत्तर देते हुए उन्होंने इस बात की आवश्यकता पर जोर दिया कि माता-पिता को बच्चों का दोस्त होना चाहिए, न कि बॉस, ताकि परस्पर खुले हुए वार्तालाप को बढ़ावा मिल सके। भविष्य की पीढ़ियों को कोई सुझाव देने से वे दूर रहे लेकिन उन्होंने जीवन की गुणवत्ता और समझदारी से सही विकल्प को चुनने पर जोर दिया। उन्होंने इस बात पर आशा व्यक्त करते हुए भाषण समाप्त किया कि मेडिकल कॉर्प्स के सदस्यों को युद्ध का सामना न करना पड़े और वे समाज की विभिन्न लाभदायक तरीकों से सेवा कर सकें।
कार्यक्रम की समाप्ति करते हुए लेफ्टिनेंट जनरल अजय कुमार सिंह ने एक पारम्परिक चाकू ‘खुखरी’ सद्गुरु को आभारस्वरूप भेंट किया।
6 साल बाद ‘यूथ एंड ट्रूथ - अनप्लग विद् सद्गुरु’ के अगले संस्करण के साथ सद्गुरु दोबारा इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट, बैंगलोर (IIM) पहुंचे। इस कार्यक्रम के दौरान उन्होंने विद्यार्थियों को अपने विवेक और वाकपटुता से मोहित कर लिया।
सद्गुरु ने हास्यपूर्ण तरीके से प्रतिस्पर्धात्मक अकादमिक वातावरण के मुद्दे पर बात करते हुए उन्हें याद दिलाया कि प्रथम आने के लिए कोशिश करते रहना एक सम्पूर्ण जीवन का रास्ता नहीं है। उन्होंने जोर दिया कि हर व्यक्ति अपने आप में अनोखा है और एक-समान तंत्र को स्वीकार करने के बजाय, स्वयं की स्वाभाविक क्षमता को फलने-फूलने देने के महत्व के बारे में बताया। उन्होंने समय की क्षणिक प्रकृति पर अपना गहन दृष्टिकोण साझा किया और विद्यार्थियों को केवल धनोपार्जन नहीं, बल्कि जीवन बनाने और एक मनुष्य होने के नाते अपनी पूरी क्षमता को खोजने के लिए प्रेरित किया।
विद्यार्थियों के फियर ऑफ मिसिंग आउट (FOMO) और आजीविका के विकल्पों के दबावों के बारे में सम्बोधित करते हुए सद्गुरु ने समझाया कि मानसिक दबाव केवल एक मानसिक स्थिति है और आनंद और प्रसन्नता बाहरी आयामों से नहीं लाई जा सकती। अपनी मानसिक स्थिति पर काबू पाने के लिए प्रोत्साहन देते हुए सद्गुरु ने इस बात पर प्रकाश डाला कि हमारा दिमाग शरीर का एक असाधारण अंग है और अद्भुत कार्य करने में सक्षम होने के बावजूद हमारे दुखों का कारण है। उन्होंने कहा कि स्वयं की मानसिक स्थिति को सकारात्मकता की तरफ लेकर जाना हमारे व्यक्तिगत कल्याण के लिए अत्यावश्यक है।
नेतृत्व की प्रकृति के बारे में बताते हुए सद्गुरु ने किसी नेता के ऊपर मानसिक दबाव और आंतरिक घर्षण से आई अक्षमता की बात की। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि नेता को परिस्थितियों को आनंद और स्थिरता की मनःस्थिति के साथ सँभालना चाहिए न कि दबाव और डर से। उन्होंने अपनी कार्य क्षमता और जीवन की सम्पूर्ण गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए आंतरिक खुशी और शांति के महत्व के ऊपर बल देते हुए अपनी बात समाप्त की। अपने विनोदी व गहरे अंदाज में सद्गुरु ने विद्यार्थियों को सशक्त करते हुए यह सन्देश दिया कि जीवन की चुनौतियों का सामना करने और प्रभावशाली नेता बनने के लिए जरूरी है अपना रूपांतरण करना।
सभा के समापन से पहले प्रश्न-उत्तर सत्र के दौरान सद्गुरु ने कई विषयों पर चर्चा की जैसे एंटरप्रेन्युरशिप बनाम सुरक्षित नौकरी, जीविकोपार्जन बनाम जीवन-निर्माण, और खुशी और दुख की खुद पैदा होने वाली प्रकृति। उन्होंने बहुत अधिक उपभोग और उसके पर्यावरण पर परिणाम की आलोचना की। मानसिक खुशहाली और आंतरिक खलबली, जीवन में सक्रिय अनुबंध और भावनात्मक उलझनें, और जीवन में अपने कार्य और व्यक्तिगत संबंधों के बीच संतुलन बनाने का सुझाव दिया। इसके साथ ही सद्गुरु ने शिक्षा के सुधार, AI का भविष्य के कर्मचारियों पर प्रभाव, पूर्वनिर्धारित भाग्य के मिथ्या और स्वयं के प्रयत्नों के प्रति जूनून के साथ समर्पण रखने के महत्व को बताया।
ईशा आउटरीच ने ईशा योग केंद्र, कोयम्बटूर के आसपास के गांवों और जनजातीय बच्चों के लिए छात्रवृत्ति वितरण कार्यक्रम आयोजित किया। इस कार्यक्रम के दौरान इन विद्यार्थियों ने भरतनाट्यम, लोकनृत्य, कलरीपायट्टु में अपनी कुशलता का प्रदर्शन करते हुए अपनी योग्यताओं को दर्शाया जो उन्होंने गाँवों और जनजाति कल्याण के लिए समर्पित ईशा की टीम से नियमित ट्रेनिंग के द्वारा हासिल की थी।