जीवन के रहस्य

कर्मकांड और अध्यात्म: कौन कितना प्रभावशाली है?

भारत की आकर्षक सांस्कृतिक विविधता के बीच फैले अनेक धार्मिक रीति-रिवाजों और आध्यात्मिकता के बीच एक सूक्ष्म संबंध है। सद्‌गुरु इस संबंध पर प्रकाश डालते हुए आधुनिक समाज में इन दोनों के महत्व के बारे में बताते हैं। जीवन को समृद्ध बनाने और आंतरिक बदलाव को प्रेरित करने में उनकी भूमिका को जानने के लिए पढ़िए ये आलेख:

प्रश्नकर्ता: भारतीय समाज में धार्मिक कर्मकांडों का प्रचलन बढ़ता हुआ दिखाई देता है, जबकि आध्यात्मिक प्रक्रियाएं कम होती दिखाई दे रही हैं। आपका इस बारे में क्या कहना है?

सद्‌गुरु: हमारे पास ऐसा कोई प्रामाणिक आंकड़ा नहीं है जो ये बताता हो कि आध्यात्मिक प्रक्रियाएं कम होती जा रही हैं और अंधश्रद्धा से भरी धार्मिक प्रथाएं बढ़ती जा रहीं हैं। पहले मैं ये बताता हूँ कि धार्मिक कर्मकांड या रीति-रिवाज होते क्या हैं।

सुबह उठकर दांत साफ करना एक रिवाज है। बचपन में आपका दांत साफ करने का मन नहीं करता था लेकिन शायद आपकी माँ ने जोर दिया और समय के साथ ये आपकी आदत बन गई। ये एक अच्छी दैनिक प्रथा है। इसी तरह हमने सचेतन रूप से ऐसे रीति-रिवाज बनाए और प्रचलित किए जिनके लिए हमें पता है कि अगर हम उन्हें नहीं करेंगे तो हमारा कुछ नुकसान होगा, जैसे हमारे दांत गिर जाएंगे या हम किसी और तरह से गिर सकते हैं।

अब आपके पास विकल्प है कि या तो आप सचेतन होकर यह जानते हुए दांत साफ करें कि ये आपके लिए फायदेमंद है या फिर केवल इसलिए क्योंकि आपकी माँ ने आपको बताया था। ये एक ही काम को करने के दो अलग-अलग तरीके हैं लेकिन इसका नतीजा एक ही है। रीति-रिवाज इसी तरह से बने हैं।

दूसरी तरफ, आध्यात्मिक प्रक्रियाएं आंतरिक होती हैं और इन्हें व्यक्तिगत रूप से सिखाए जाने की जरूरत होती है जिसकी वजह से ये समय के साथ बड़ी आबादी के लिए अव्यावहारिक हो जाती हैं। किसी रीति रिवाज को जाने बगैर उसमें बड़ी संख्या में लोग भाग ले सकते हैं और उसका सही ढंग से पालन करके उससे लाभ भी उठा सकते हैं। इन रीति रिवाजों के साथ यह समस्या है कि समय के साथ इन्हें करवाने वाले लोग अक्सर इन्हें दूसरों पर अधिकार जमाने का जरिया बना लेते हैं और इसका गलत उपयोग करके कारोबार में बदल देते हैं।

ये कर्मकांड बहुत प्रभावशाली होते हैं क्योंकि इन्हें बड़ी आबादी तक पहुंचाया जा सकता है, हालाँकि हो सकता है इनका असर ध्यान जितना रूपांतरणकारी न हो।

ऐसा नहीं है कि कर्मकांडों या रीति-रिवाजों से लोगों को फायदा न हुआ हो। समस्या है निष्ठा की। शुरू में, करीब 24 साल तक हमने ईशा में कोई कर्मकांड नहीं रखा था। हमने ये सब कुछ हटा दिया था क्योंकि हम कुछ ऐसे लोग बनाना चाहते थे जिनमें खास स्तर की निष्ठा हो। एक बार जब हमने देख लिया कि निष्ठा के एक स्तर को निभाने वाले लोग तैयार हैं जो किसी भी परिस्थिति में किसी भी चीज का दुरुपयोग नहीं करेंगे, तब हमने कर्मकांडों को एक वैज्ञानिक प्रक्रिया के रूप में शुरू किया जिनका जन-साधारण के ऊपर बहुत बड़ा प्रभाव होता है।

किसी कर्मकांड में भाग लेने के लिए प्रतिभागियों को इसके बारे में समझने की जरूरत नहीं होती, जरूरत होती है बस उस प्रक्रिया से गुजरने की इच्छा की। लेकिन किसी को ध्यान सिखाने के लिए उन्हें प्रक्रिया को समझाना और उससे गुजारना जरूरी होता है। ये कर्मकांड बहुत प्रभावशाली होते हैं क्योंकि इन्हें बड़ी आबादी तक पहुंचाया जा सकता है, हालाँकि हो सकता है इनका असर ध्यान जितना रूपांतरणकारी न हो।

हमारी आज की आबादी 1.4 अरब है। क्या हमें 40 करोड़ लोगों को शानदार भोजन देकर बचे हुए 1 अरब लोगों को भूखा मरने के लिए छोड़ देना चाहिए? या ये सुनिश्चित करना चाहिए कि कम से कम एक आवश्यक मात्रा में भोजन सभी 1.4 अरब लोगों के पास पहुंचे? आपके अनुसार कौन सा विकल्प सही है?

एक कर्मकांड सब तक पहुँचता है और सबको स्पर्श करता है, चाहे वो एक सीमित तरीके से ही क्यों न हो। सारी जनसंख्या को साधक बनाने की बात मैं तब सोचता था जब मैं 25 साल का था। अब मैं ज्यादा समझदार हो गया हूँ। आध्यात्मिकता पीछे नहीं छूट गई है। मानवता के इतिहास में शायद आज तक कभी इतने लोग योग साधना नहीं करते थे जितने कि आज करते हैं।

दुनिया भर में काफी लोग कम से कम अपनी आँखें बंद करके किसी तरह का योग करने की कोशिश करते हैं। इसी सिलसिले को बढ़ाते हुए, इस साल के अंत तक हम ‘मिरेकल ऑफ माइंड’ कार्यक्रम शुरू करने जा रहे हैं। हम चाहते हैं कि कम से कम 3 अरब लोग 15 मिनट के लिए रोज अपनी आँखें बंद करके कुछ सामान्य योगिक क्रियाएं करें। अगर 3 अरब लोग रोजाना 15 मिनट के लिए अपनी आँखें बंद कर सकें  तो आप एक अलग ही मानव जाति देखेंगे।