
सद्गुरु की ब्रेन सर्जरी के बाद कुछ महीनों तक, ईशा के साधकों को अपने प्रिय गुरु के बारे में जानकारी केवल कभी-कभार आने वाली ऑडियो रिकॉर्डिंग से ही मिल पाती थी। तो स्वाभाविक रूप से, जब 23 सितंबर 2024 को सद्गुरु के आत्मज्ञान दिवस पर दर्शन की घोषणा की गई, तो उत्साह की कोई सीमा नहीं रही। आखिरकार, हम उन्हें फिर से देख पाएंगे, व्यक्तिगत रूप से या लाइवस्ट्रीम पर। स्वाभाविक रूप से हर किसी के मन में एक ही सवाल मचल रहा था जो सरल होते हुए भी गहरा था कि सद्गुरु कैसे हैं? जानिए उनका हाल उनके ही शब्दों में:
प्रश्नकर्ता: नमस्कारम सद्गुरु। यह सबके मन का प्रश्न है, ऑनलाइन और व्यक्तिगत रूप से दोनों। आप कैसे हैं? आप कैसा महसूस कर रहे हैं? इन पिछले कुछ महीनों में आप कैसे रहे हैं, इसके बारे में हम लोग सब कुछ जानना चाहते हैं।
सद्गुरु: परिणाम तो अच्छा लग रहा है।
शारीरिक रूप से, यह पीड़ादायक रहा है, लेकिन मैंने खुद को ऐसा बना लिया है कि कुछ भी वास्तव में मुझे नीचे नहीं ले जाता। पिछले कुछ महीनों में कुछ ऐसी चीजें हुईं और कुछ ऐसी बातें मैंने कहीं और कीं, जिनके कारण एक अस्पताल के लोग - डॉक्टर, नर्स, स्टाफ - सभी बड़े अनुयायी बन गए हैं।
शारीरिक रूप से यह कठिन रहा है, लेकिन मैंने इसे अपने लिए कठिन नहीं बनाया। ऐसे क्षण आए जब डॉक्टरों को लगा कि उन्होंने मुझे खो दिया, लेकिन मैं यहाँ हूँ। मुझे मारना आसान नहीं है।
खैर, हमने कुछ लापरवाही वाली चीजें कीं, लेकिन हम हमेशा ऐसा करते रहे हैं। मैं हमेशा अपना जीवन यहाँ-वहाँ फेंकता रहा हूँ और इसे जोखिम में डालता रहा हूँ। इस बार, दुर्भाग्य से, यह बहुत ज्यादा सार्वजनिक तमाशा बन गया जहाँ लगभग हर कोई जानता है, जो थोड़ा शर्मनाक है।
मैं आपको इस घटना की अच्छी बात बताता हूँ। शायद लगातार चार, पाँच महीनों से, मैं समय पर खाना खा रहा हूँ। ऐसा 18 या 20 साल की उम्र के बाद से नहीं हुआ था। तब से मैं हमेशा एक ‘भूखी बिल्ली’ की तरह रहा हूँ।
मैं बहुत से लोगों को जानता हूँ जो खाते समय ही अगले भोजन की योजना बना लेते हैं। मैं अपने जीवन की योजना भोजन के इर्द-गिर्द नहीं बनाता। मैं बस वही करता हूँ जो मैं करना चाहता हूँ। कभी-कभी खाना आता है, कभी-कभी नहीं आता, हालाँकि पिछले कुछ सालों में लोग यह सुनिश्चित करने का प्रयास करते हैं कि मैं कुछ खा लूँ। पहले, खाना नहीं आता था, लेकिन इससे कभी कोई फर्क नहीं पड़ता था।
लेकिन मैंने देखा है कि हर दिन समय पर खाना खाना काफी अच्छा होता है, जो लगभग पचास वर्षों से नहीं हुआ था।
एक और बात, कुछ दवाएँ और चीजों ने, जो अब सब बंद हो गई हैं, मुझे थोड़ा सुस्त कर दिया था। जब मैंने कुछ विशेषज्ञों से पूछा, ‘मुझे क्या करना चाहिए?’ क्योंकि उन्होंने मेरे सिर में एक छेद कर खिड़की खोली थी, मुझे नहीं पता कि उन्होंने कितना दिमाग निकाल दिया। तो जब हमने उनसे पूछा, तो उन्होंने कहा, ‘सद्गुरु, इसका केवल एक इलाज है - सोना, सोना और सोना।’
सुबह हुई, मैं उठा, चला, कुछ खाया और सो गया। फिर मैं उठा, चला, कुछ खाया और सो गया। फिर शाम को, मैं चला, कुछ खाया, चला और सो गया। एक ‘आदर्श जीवन।’ काम करने के लिए एक-दो किताबें थीं, और मैं उन्हें देख रहा था।
वरना मेरे आसपास बहुत से लोग - यहाँ (अमेरिका) और भारत में दोनों जगह - अपना जीवन समर्पित कर रहे हैं यह सुनिश्चित करने के लिए कि सब कुछ ठीक से हो। लोगों को मैं तब पसंद आता हूँ जब मैं थोड़ा असहाय होता हूँ। मेरी बेटी से लेकर हर कोई कहता है, ‘नहीं, आपको वैसे नहीं, ऐसे करना है। आपको अब सोना चाहिए।’
‘क्या? तुम कब बॉस बन गए?’
मैं देख रहा हूँ कि ईशा फाउंडेशन की बाकी चीजें मेरे बिना बेहतर हो रही हैं। तो यह अच्छा है।
यह थोड़ा नियंत्रण से बाहर हो गया था। मैंने 17 मार्च के आसपास यहाँ आने की योजना बनाई थी और बिना किसी सर्जरी के खुद को ठीक करने के लिए एक महीना खाली रखा था। लेकिन थोड़ी देर हो गई। बहुत सी चीजें जुड़ती गईं, और यह क़ाबू से बाहर हो गया।
अंग्रेजी में कहते हैं, ‘ऑल इस वेल दैट एंड्स वेल’ यानी अंत भला तो सब भला। तो आख़िरकार हम यहाँ मौजूद हैं।
मैं बहुत करीब पहुँच गया था, जीवन रेखा लगभग पार ही कर गया था। बेशक, फाउंडेशन के लिए और हम जो कई तरह के काम कर रहे हैं उनके मामले में, अगर मैं चला जाता तो यह एक झटका होता।
जहाँ तक मेरी और मेरे काम के मुख्य हिस्से की बात है, कोई फर्क नहीं है। यहाँ मैं शिव की गोद में हूँ, वहाँ भी मैं शिव की गोद में हूँ। यहाँ मैं वही करता हूँ, वहाँ भी मैं वही करता हूँ। उस संदर्भ में, कोई अंतर नहीं है।
आध्यात्मिक रूप से मेरे लिए या आपके लिए कोई फर्क नहीं पड़ेगा। लेकिन दूसरी चीजें, जैसे गोल्फ कोर्स, शायद अच्छी तरह से आकार नहीं लेंगी जब मैं वहाँ नहीं होऊंगा। मुझे इसकी चिंता है।