मन और कल्याण

दबे पांव फैल रही यह महामारी: अकेलेपन की समस्या पर अमेरिकी सर्जन जनरल और सद्‌गुरु के बीच संवाद

जैसे-जैसे तकनीक आगे बढ़ रही है, सच्चे मानवीय संबंध क्यों पीछे छूटते जा रहे हैं? डॉ. विवेक मूर्ति, 21वें अमेरिकी सर्जन जनरल, और सद्‌गुरु ने 28 सितंबर 2024 को हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में ‘अकेलापन: अंदर मुड़ना ही, बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता है’ शीर्षक से अपने विचारोत्तेजक संवाद में इस आधुनिक विरोधाभास पर चर्चा की। उनकी अंतर्दृष्टि को साझा करता यह अंश, सच्ची तृप्तिसे वंचित होतीजा रही इस दुनिया में अकेलेपन से लड़ने और सार्थक संबंधों को बनाने के महत्व पर प्रकाश डालता है।

अकेलेपन की महामारी

डॉ. विवेक मूर्ति: एक डॉक्टर के रूप में और सर्जन जनरल के रूप में काम करते हुए, मैंने देखा कि हमारे पूरे देश में, बूढ़े और युवा दोनों के बीच, अकेलेपन और अलगाव की यह भावना बहुत ही आम है। विशेष रूप से युवा लोग सबसे अधिक संघर्ष कर रहे हैं। 50 प्रतिशत से अधिक लोग अकेलेपन का अनुभव करने की रिपोर्ट करते हैं।

जब लोग खुद से और एक दूसरे से कटे होने की इस भावना से जूझते हैं, तो यह उनके अवसाद और चिंता के जोखिम को तो बढ़ाता ही है, साथ ही शारीरिक बीमारी को भी बढ़ाता है। हृदय रोग के जोखिम में 29 प्रतिशत की वृद्धि, स्ट्रोक के जोखिम में 31 प्रतिशत की वृद्धि, डिमेंशिया (भूलने की बीमारी) के जोखिम में 50 प्रतिशत की वृद्धि हो जाती है और समय से पहले मृत्यु खतरा भी बढ़ जाता है। 

 जब लोग खुद से और एक दूसरे से कटे होने की इस भावना से जूझते हैं, तो यह उनके अवसाद और चिंता के जोखिम को तो बढ़ाता ही है, साथ ही शारीरिक बीमारी को भी बढ़ाता है। —डॉ. विवेक मूर्ति

सामाजिक अलगाव के कारण होने वाली मृत्यु दर की तुलना धूम्रपान और मोटापे से होने वाली मृत्यु दर से की जा सकती है। हमें अपने जीवन में सामुदायिक भावना लाने की आवश्यकता है।

मेरा मानना ​​है कि अकेलेपन के कारण कभी-कभी जो महत्वपूर्ण बात छूट जाती है, वह यह विचार है कि अन्य लोगों से गहराई से जुड़ने के लिए, व्यक्ति को स्वयं से भी जुड़े रहने की आवश्यकता होती है।

मेरे विचार से, उसे फिर से बनाना न केवल हमारे व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिए बल्कि हमारे परिवारों, हमारे समुदायों और बड़े पैमाने पर दुनिया के स्वास्थ्य के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीजों में से एक है।

अकेलापन - एक मनोवैज्ञानिक घटना

सद्‌गुरु: खैर, हम 8.2 अरब लोग हैं, और हम अकेले हैं। एक काफी भीड़भाड़ वाली दुनिया में लोग अकेलापन महसूस कर रहे हैं। इसका एक सामाजिक या समाजशास्त्रीय पहलू है, जिसे सर्जन जनरल ने बताया। अगर हम लगातार सामाजिक स्थितियों, अंतरराष्ट्रीय स्थितियों और पारिवारिक स्थितियों को व्यवस्थित नहीं करते हैं, तो सब कुछ अव्यवस्थित हो जाएगा।

मेरा मानना है कि प्रशासन सामाजिक ढाँचे में अंतर को कम करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन अकेलापन अपने आप में एक सामाजिक घटना नहीं है, यह एक मनोवैज्ञानिक घटना है। लोगों की भीड़ के बीच बैठे हुए भी आप अकेला महसूस कर सकते हैं। यहाँ तक कि अगर आपसे प्यार किया जाता है और देखभाल की जाती है, तो भी आप अकेला महसूस कर सकते हैं, क्योंकि यह एक मनोवैज्ञानिक घटना है। आप खुद को कहीं भी अकेला बना सकते हैं।

एकांत का महत्व

मैं समाज के बारे में कुछ कहने जा रहा हूँ, लेकिन मेरा मुख्य ध्यान व्यक्ति पर है। समाज में एक चीज जो हुई है वह यह है कि एकांत का महत्व खो गया है। एकांत आपके जीवन का सबसे गहन समय है। यह वह समय है जब आप जीवन को सोखते हैं।

 एकांत आपके जीवन का सबसे गहन समय है। —सद्‌गुरु

योग संस्कृतियों में एक चीज बताई गई है - आप चीजों को ग्रहण करने या समझने में जितना समय बिताते हैं, उसके मुकाबले व्यक्त करने में बिताए गए समय का अनुपात दो अनुपात एक होना चाहिए। यदि आप दो तिहाई समय ग्रहण करने  में बिताते हैं, और केवल एक तिहाई समय ही व्यक्त करने में बिताते हैं, तो आपकी अभिव्यक्ति गहन होगी और सबके लिए मूल्यवान होगी।

लेकिन आजकल स्वयं को व्यक्त करने के अवसर बहुत जल्दी मिल जाते हैं – यहाँ तक कि एक छह साल का बच्चा भी आजकल फेसबुक पर कुछ कहने के लिए तैयार है। मुझे आशा है कि आप लोगों ने कम से कम उस पर प्रतिबंध लगा दिया है। यह एक अद्भुत सृष्टि है। एक बच्चे को, दुनिया को जितना हो सके उतना आश्चर्य भाव से ग्रहण करना चाहिए, बजाय इसके कि वह स्वयं को व्यक्त करने के लिए शब्द खोजे। लेकिन हर चीज के लिए, हमारे पास एक शब्द है, कई तो गंदे शब्द हैं। इस अभिव्यक्ति में जीवन को समझने का कोई अवसर नहीं है, यह बस एक अस्थिर शोर है।

सच्चे संबंधों और तृप्ति को बढ़ावा देना

डॉ. विवेक मूर्ति: सद्‌गुरु, आपने जो कहा, उसके आधार पर मैं कहना चाहूँगा कि अकेलापन, जो हज़ारों लोगों के साथ होने पर या अकेले होने पर हो सकता है, एक व्यक्तिपरक भावना है। यह इस बारे में है कि हम दूसरों से कितनी गहराई से जुड़े हुए महसूस करते हैं।

मैंने यात्रा करने और हर तरह के लोगों से बात करने में बहुत समय बिताया। कॉलेज और विश्वविद्यालय के छात्र मुझे बता रहे थे कि, हालांकि उनके साथ कैंपस में हजारों दूसरे छात्र थे, फिर भी वे अकेला महसूस करते थे।

उन्हें नहीं लगता था कि कोई उन्हें समझता है। उन्हें नहीं लगता था कि वे वैसा महसूस करते थे, जो वे असलियत में थे। वे जब दूसरों के साथ होते थे, तो सहज महसूस नहीं करते थे। मैंने ऐसे लोगों से भी बात की है जिनके आसपास केवल एक या दो लोग हैं, लेकिन वे बहुत संतुष्ट, जुड़े हुए महसूस करते हैं और उनमें आंतरिक शांति और तृप्ति की भावना है।

एक चीज जिसके बारे में मैं न केवल एक सर्जन जनरल के रूप में बल्कि दो छोटे बच्चों के पिता के रूप में सोचता हूँ, वह यह है कि हम समाज को कैसे फिर से दिशा दिखाएं ताकि वह गहरी तृप्ति पर फोकस करे जो खुद से और दूसरों से गहरे जुड़ाव से आती है?

मैंने पाया है कि अकेलेपन के लिए सबसे बड़ा उपाय दूसरों की सेवा करना है, जब हम अपने समुदाय और धरती के लिए कुछ करते हैं। इससे हमें शांति मिलती है और हम अपने मूल्य को पहचान पाते हैं। लेकिन मुझे इस बात की चिंता है कि जब मैं इन दिनों युवाओं से बात करता हूँ, तो लगता है कि वे ऐसी ताकतों से घिरे हैं जिनकी वजह से वे केवल प्रसिद्धि, धन या शक्ति के मिलने को ही सफलता समझते हैं।

लोगों में खुद से और दूसरों से गहरे जुड़ाव से आने वाली तृप्ति के लिए एक गहरी भूख है। —डॉ. विवेक मूर्ति

लेकिन हम कई ऐसे लोगों को जानते हैं जिनके पास ये तीनों चीजें हैं, फिर भी वे संतुष्ट नहीं हैं। मशहूर, शक्तिशाली या अमीर होने में कुछ भी गलत नहीं है। चुनौती तब आती है जब हम युवाओं को यह संदेश देते हैं कि उन्हें किसी और चीज़ की ज़रूरत नहीं है। मुझे लगता है कि यह सच से बहुत दूर है। लोगों में खुद से और दूसरों से जुड़ाव की गहरी भावना से मिलने वाली तृप्ति की गहरी भूख होती है।

हमें यह पता लगाना होगा कि हम अपने जीवन में सांस्कृतिक शक्तियों और तकनीक को किस तरह इस्तेमाल करें, ताकि हम तृप्ति पाने के अपने इरादे को पूरा कर सकें, न कि हम ऐसे व्यवहारों, प्रथाओं और गतिविधियों के गुलाम बन जाएँ, जो वेबसाइट पर क्लिक और आमदनी तो पैदा कर सकते हैं, लेकिन हमें वह तृप्ति नहीं दे पाते जिसकी हमें आवश्यकता है।

ऐसे मनुष्य के रूप में जो अपनी आने वाली पीढ़ियों की फ़िक्र करता है, हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि हम इन युवाओं को एकांत के लिए स्थान और समय दें। इस बात पर भी ज़ोर देना चाहिए कि दूसरों की सेवा करना मूल्यवान है। साथ ही उनके सामने उदाहरण पेश करना होगा और उन्हें बताना होगा कि हर दिन सिर्फ़ किसी से जुड़ने के लिए उनसे मिलना ज़रूरी है – बिना किसी एजेंडे के, बिना किसी दूसरे लाभ के, बल्कि सिर्फ़ किसी के साथ एक मनुष्य की तरह उनके जीवन में उनके लिए मौजूद रहना- इसका बहुत महत्व है।

समाधान अंदर निहित है

सद्‌गुरु: अकेलापन का मतलब यह नहीं है कि आपके आसपास कोई नहीं हैं। यह बात नहीं है। लोग थोड़ा प्रतिकार करते हैं। ऐसा करने से शायद उनको कुछ राहत मिलती है, लेकिन वह राहत सिर्फ एक मुखौटा या छोटी सी सहूलियत है।

लेकिन अकेलापन मूल रूप से इसलिए हो रहा है क्योंकि आपके विचार और भावनात्मक प्रक्रिया से परे कुछ भी नहीं है। आप सिर्फ एक शारीरिक और मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया बन गए हैं। मानव के भीतर इससे ज़्यादा कुछ भी गहन नहीं हो रहा है। यहाँ तक कि अगर आपके विचार गहन हो जाते, तो आप अकेले नहीं होते। अगर आपके विचार और भावनाएं वैसे ही होतीं जैसा आप चाहते हैं, तो क्या आप खुद को खुश रखते या दुखी? खुश।

मानव मन एक चमत्कार है, लेकिन अधिकांश लोग इसका इस्तेमाल दुख बनाने की मशीन के रूप में कर रहे हैं। —सद्‌गुरु

अगर हम इसके बारे में कुछ नहीं करते, तो यह संभव है कि अगले दस से पंद्रह सालों में एक भी परिवार ऐसा नहीं बचेगा जिसमें कम से कम एक व्यक्ति मानसिक रूप से टूटा न हो। हमने पहले से ही कुछ मील के पत्थर पार कर लिए हैं। लगभग कोई भी परिवार ऐसा नहीं है जिसमें 40 वर्ष से अधिक उम्र के लोग किसी न किसी तरह की शारीरिक समस्या की दवा न ले रहे हों। यह मानसिक बीमारियों के लिए भी आम हो जाएगा।

शारीरिक रोग दर्द देते हैं, लेकिन मानसिक रोग कल्पना से परे दर्दनाक होते हैं। अगर मेरी अपनी बुद्धि मेरे खिलाफ हो जाए, तो ब्रह्मांड की कोई भी शक्ति मुझे नहीं बचा सकती। इसलिए, इन चीजों को कम उम्र में सँभालना महत्वपूर्ण हो जाता है, जिसमें तकनीक का गैर-जिम्मेदाराना इस्तेमाल भी शामिल है। आप तकनीक को रोक नहीं सकते, और इसे रोका नहीं जाना चाहिए।

अपनी आंतरिक तकनीक को अपग्रेड करने का समय आ गया है। अगर हम खुद को अपग्रेड किए बिना अपनी गतिविधि को अपग्रेड करते हैं, तो हम पीड़ित होंगे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इंसान अपने शरीर और अपनी बुद्धि की जिम्मेदारी ले। हमारी स्कूल व्यवस्था को कुछ ऐसे ही तैयार करना चाहिए। यह सिर्फ ABC सीखने के बारे में नहीं है।

तकनीक को रोकने का कोई तरीका नहीं है। नीति निर्माण तकनीक की गति से आगे नहीं बढ़ सकता। यह जिस गति से आगे बढ़ रहा है, उससे यह बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है कि हम मानव के रूपांतरण में निवेश करें। इसी सिलसिले में हम ‘मिरेकल ऑफ माइंड’ लॉन्च कर रहे हैं। मानव मन धरती पर सबसे बड़ा चमत्कार है। आप जो भी महानतम तकनीकें देख रहे हैं, वे सभी इसी से आती हैं।

मानव मन एक चमत्कार है, लेकिन अधिकांश लोग इसका इस्तेमाल दुख बनाने की मशीन के रूप में कर रहे हैं। व्यक्तिगत पीड़ा हमेशा से धरती पर रही है। लेकिन अब यह औद्योगिक स्तर पर घटित हो रहा है। इसलिए इस पर ध्यान देने का समय आ गया है। सरकारें, प्रशासन और संगठन इसे विभिन्न स्तरों पर सँभाल रहे हैं, जो सार्थक और महत्वपूर्ण है, लेकिन लोगों को अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी के रूप में लेना होगा - इसके अतिरिक्त इसकाकोई विकल्प नहीं है।