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बंधन तोड़ना: आत्मज्ञान और महिला सशक्तिकरण का मार्ग 

रोजमर्रा की जिंदगी की भूलभुलैया में, जहाँ इच्छाएं और मजबूरियां एक जटिल जाल बुनती हैं, सद्‌गुरु आधुनिक जीवन के जाल से बाहर निकलने का रास्ता सुझाते हैं। वे कहते हैं कि आत्म-ज्ञान कोई दूर का लक्ष्य नहीं है, बल्कि अपनेमूल स्वरूप की ओर लौटना है। यह दृष्टिकोण महिलाओं के लिए शारीरिक और सामाजिक बाधाओं से ऊपर उठकर आध्यात्मिक रूप से विकसित होने, सच्चे सशक्तिकरण और चेतना की ओर बढ़ने का मार्ग खोलता है।

प्रश्नकर्ता: नमस्कारम, सद्‌गुरु। आपने ज्ञान और बोध के विभिन्न स्तरों के बारे में बात की। मेरे जैसा एक साधारण इंसान कहाँ तक जा सकता है? क्या हम में से हर एक के लिए एक व्यक्तिगत सीमा है कि हम इस जीवन में कितना विकास कर सकते हैं? हम स्वाभाविक रूप से आत्म-ज्ञानी क्यों नहीं पैदा होते?

इच्छाएं एक अंतहीन जाल की तरह क्यों हैं?

सद्‌गुरु: आत्म-ज्ञान कोई उपलब्धि नहीं है। यह घर वापसी है। अपनी इच्छाओं को बाहर निकालकर आप भाग रहे हैं। लेकिन अगर आप इसे रोक दें, तो जीवन घर आ जाएगा। आत्म-ज्ञान कहीं पहुंचने के बारे में नहीं है। यह कहीं पहुंचने की जरूरत को खोने के बारे में है।

आपको कहीं जाने या कुछ बनने की कोई जरूरत नहीं है। आप बस यहीं बैठे रहिए। सब कुछ ठीक है। साथ ही, आप शामिल और क्रियावान हैं। यह आपके आलसी होने के लिए कोई फिलोसोफी नहीं है। आप जीवन से भरे हुए हैं। अगर आपको टिम्बकटू या किसी दूसरे ग्रह पर जाना है, तो अगर कुछ करना है तो आप वहाँ जाएंगे। लेकिन आपको व्यक्तिगत रूप से कहीं जाने की कोई जरूरत नहीं है।

आत्म-ज्ञान कोई उपलब्धि नहीं है। यह घर वापसी है।

आप कहीं भी हों या किसी भी तरह की गतिविधि में लगे हों, तृप्त न होने की चिंता हमेशा आपके साथ रहती है। जब आपको एक नई नौकरी मिलती है तो आप शुरू में उत्साहित होते हैं। जब आप शादी करते हैं तो आप खुशी से नाच रहे होते हैं। मैं हर चीज को नकारात्मक नहीं बना रहा हूँ, लेकिन आम तौर पर जब आप कुछ पाते हैं, तो आप सोचते हैं, ‘बस यही है, जो मुझे चाहिए था।’ लेकिन कुछ समय बाद आप पाते हैं कि तृप्ति की लालसा अभी भी मौजूद है।

आपकी जिंदगी कौन चला रहा है?

लोग हमेशा आपको बताते हैं कि अगली चीज आपको तृप्ति देगी और यह अंतहीन रूप से चलता रहता है। एक बार जब आप किसी इच्छा को बाहर निकालते हैं, तो इसमें सभी तरफ से चीजें जुड़ती जाती हैं, और फिर यह एक जाल की तरह बन जाता है। आप इसे मार्केटिंग कह सकते हैं, आपके माता-पिता, आपके दोस्त, आपकी पत्नी, आपके पति, आपके बच्चे, सभी तरह के लोग आपको और अधिक चीजों में खींचते रहते हैं। बाजार अर्थव्यवस्था इस पर निर्भर करती है कि आप अधिक से अधिक चीजें करें, अधिक से अधिक चीजें खरीदें, और अधिक से अधिक ऋण लें।

यह कुछ ऐसा है : दो स्कूली लड़के कैंपिंग पर गए। वे अच्छी तरह से तैयार नहीं थे और मच्छरों ने उन्हें काटना शुरू किया। उन्होंने खुद को ढकने और सोने की कोशिश की, लेकिन मच्छर उन्हें हर जगह काटते रहे। आप जानते हैं मच्छर कैसे होते हैं, अगर आप अपने पैर ढक लेते हैं, तो वे आपके गाल पर काटेंगे, अगर आप अपने गाल ढक लेते हैं, तो वे आपके पैर पर काटेंगे।

तो वे कुछ देर तक संघर्ष करते रहे। कुछ समय बाद थककर उन्होंने अपनी आंखें खोलीं और चारों ओर देखा। उन्हें कुछ जुगनू दिखे। एक लड़के ने कहा, ‘हमें हार मान लेनी चाहिए। अब वे हमें खोजने के लिए टॉर्च लेकर आए हैं।’

यह क्रेडिट रेटिंग की तरह है। एक बार जब आप एक चीज करते हैं, तो वे आपको हर तरफ से निशाना बनाएँगे। यह महत्वपूर्ण है कि आपको इन चीजों में शामिल होने के लिए कितना समय, ऊर्जा और रुचि खर्च करना है, इस पर एक समझदारी भरा निर्णय लें। मैं आपको नहीं बता रहा हूँ कि कितना, लेकिन आपको अपनी आवश्यकताओं के अनुसार एक निर्णय लेना चाहिए।

चेतना का चुनाव

स्पष्टता पाने के लिए, कुछ समय के लिए हर चीज से दूर हट जाइए। अगर आप यहाँ आते हैं, तो हम आपको विशेष साधना देंगे, एक सप्ताह तक मौन में बैठें। जब आप बहुत शांत और स्पष्ट दिमाग वाले हो जाते हैं, मजबूरियों से मुक्त हो जाते हैं, तब तय कीजिए कि आपको जीवन में कितनी चीजों की जरूरत है। उसी के अनुसार चलिए। आपको मेरे तरीके से नहीं चलना है - अपने तरीके से चलिए। अभी दूसरे लोग आपको चला रहे हैं, जिसमें व्यावसायिक एजेंसियां भी शामिल हैं, जो उचित नहीं है।

जीवन चेतना के बारे में है, न कि चिंताओं, प्रतिस्पर्धा, या खुद को या दूसरों को मजबूर करने के बारे में।

ये एजेंसियां तय करती हैं कि आपको क्या करना चाहिए, कितना और अधिक ऋण लेना चाहिए। आप खुद तय कीजिए कि आपको वास्तव में कितनी जरूरत है। दूसरों के साथ प्रतिस्पर्धा न करें, क्योंकि जीवन इस तरह से काम नहीं करता। जीवन सचेतन होने के बारे में है, न कि चिंताओं, प्रतिस्पर्धा, या खुद को या दूसरों को मजबूर करने के बारे में। जीवन सचेतन होने के बारे में है। अगर आप सचेतन हैं केवल तभी आपको वास्तव में एक मानव माना जा सकता है। अन्यथा, आप मजबूरियों से संचालित एक जीव हैं।

शारीरिक बाध्यताओं से मुक्त होना

ज्ञान और आपके व्यक्तिगत विकास के सवाल के बारे में कहना चाहूँगा कि जीवन प्रक्रिया में, महिलाएं पुरुषों की तुलना में अपनी शारीरिकता से अधिक जुड़ी होती हैं। केवल इसी कारण से हमारी माताओं ने हमारी देखभाल की, चाहे हमने जो भी किया हो। यह जीवन की संरचना है। लेकिन विशेष रूप से एक महिला के रूप में, आपको पता होना चाहिए कि उस पैटर्न से कब बाहर निकलना है, नहीं तो आप अपनी अंतिम सांस तक उन्हीं चिंताओं के साथ अंतहीन रूप से चलती रहेंगी।

दुर्भाग्य से यह कई महिलाओं के लिए सच है। ऐसा नहीं है कि सभी पुरुष ज्ञानी हैं, लेकिन महिलाओं के लिए एक शारीरिक कारक है जो आपको अपने शरीर और शरीर क्रिया विज्ञान के बारे में थोड़ा अधिक चिंतित बनाता है। आपको पुरुषों की तुलना में थोड़ी अधिक साधना करनी होगी क्योंकि जीव-विज्ञान आप पर एक निश्चित पकड़ रखता है। यह आपकी गलती नहीं है, यह मानव प्रजाति को जारी रखने के लिए एक प्राकृतिक प्रक्रिया है।

विज्जी का गहन ज्ञान

1996 में नवंबर-दिसंबर के आस-पास, विज्जी ने अपने लिए जो समय तय कर रखा था, जैसे-जैसे वह नजदीक आ रहा था, मैंने एक महिला की भूमिका निभाने की कोशिश की और उनसे कहा, ‘आप जानती हैं, आपके पास अभी एक बच्चा है। आप इसे टाल सकती हैं। मैं आपके साथ सहयोग करूंगा, आप इसे किसी दूसरे समय कर सकती हैं। अभी नहीं। लड़की अभी सात साल की भी नहीं है।’

विज्जी ने एक ऐसे तरीके से जवाब दिया जो उनकी सामान्य बुद्धिमत्ता से कहीं आगे था, ‘एक माँ के रूप में, मैंने उसके लिए, उसकी इस उम्र तक जो कुछ भी कर सकती थी, वह सब कुछ किया है। लेकिन अब जब वह लगभग सात साल की हो रही है, उसके तरीके, उसकी बुद्धिमत्ता, और वह आपके साथ कैसे घूमती है, यह सब देखते हुए, मुझे नहीं लगता कि मैं उसके जीवन में और कुछ जोड़ सकती हूँ। मैंने उसे प्यार और आराम दिया है। मैं उससे पूरी तरह से प्यार करती हूँ, लेकिन मुझे नहीं लगता कि मैं उसके जीवन में और कुछ योगदान दे सकती हूँ। कुछ भी और करना, केवल उसे मेरे साथ उलझाएगा।’

शरीर के स्तर पर पुरुष और स्त्री अलग-अलग होते हैं। लेकिन आध्यात्मिकता के आयाम में पुरुष और स्त्री जैसा कुछ नहीं होता। इस आयाम में आपको उठना है और अपनी पूर्णता तक पहुंचना है।

मैंने उनके सामने झुककर कहा, ‘यह बहुत ही विवेकपूर्ण बात है।’ एक सात साल की बच्ची की माँ के लिए यह कहना असाधारण था। मैंने कहा, ‘मेरे पास इसके खिलाफ कोई तर्क नहीं है।’

महिलाओं के लिए आध्यात्मिक रूप से उठने का सबसे अच्छा समय

पहले, खासकर पूर्व में, कई महान महिलाएँ ऋषि और संत के रूप में उभरीं। वे अपने तरीकों में अलग थीं, लेकिन कोई उन्हें नहीं रोक सका क्योंकि संस्कृति और समाज ने इसकी अनुमति दी।

आज दुनिया के लगभग सभी समाज इसकी अनुमति देते हैं। यह महिलाओं के लिए उठने का समय है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमने उन्हें पुरुषों के साथ प्रतिस्पर्धा में डाल दिया है। शारीरिक रूप से दोनों अलग हैं। शरीर के स्तर पर पुरुष और स्त्री अलग-अलग होते हैं। लेकिन आध्यात्मिकता के आयाम में पुरुष और स्त्री जैसा कुछ नहीं होता। इस आयाम में आपको उठना है और अपनी पूर्णता तक पहुंचना है।

अगर आपके अंदर विवेक जागता है, तो आज की दुनिया में आप दिखाई देंगी। अब कोई आपको नहीं रोक सकता - वे दिन बीत गए हैं। आप महिलाओं की उस पीढ़ी में हैं - शायद पहली ऐसी पीढ़ी – जिसे यह सौभाग्य प्राप्त है कि अगर आप चेतना के स्तर पर उठती हैं, तो आपको तुरंत पहचान मिलेगी, हजारों सालों तक ऐसा नहीं था। इसलिए इसका सबसे अच्छा इस्तेमाल कीजिए।