इंटरव्यू

जीवन की कगार पर: जब सद्‌गुरु का हुआ मौत से सामना

पिछले साल, सद्‌गुरु को दो जानलेवा मेडिकल इमरजेंसी का सामना करना पड़ा जिसमें दिमाग की सर्जरी की जरूरत थी, जो उन्हें मौत की बेहद करीब ले गई थी। पॉडकास्ट होस्ट और लेखक लुईस हाउज़ के साथ उनकी इस खुली बातचीत के इस हिस्से में, वे सर्जरी तक के भयावह हालात के बारे में बताते हैं और यह खुलासा करते हैं कि क्या हुआ जब डॉक्टरों को डर हो गया था कि वे शायद उन्हें खो चुके हैं।

लुईस हाउज़: आपकी पिछले साल दो ब्रेन सर्जरी हुई थी?

सद्‌गुरु: हाँ। मैंने अपने सिर को थोड़ी चोट पहुंचाई थी।

जनवरी 2024 के अंत में मेरे सिर में भयानक दर्द शुरू हुआ। लेकिन मैं पूरी तरह व्यस्त था, तो मैं आगे बढ़ता गया। मैं दर्द की दवाई नहीं लेता क्योंकि मैं जानना चाहता हूं कि क्या हो रहा है। अगर मैं दर्द की दवाई लूं, तो मुझे पता नहीं चलेगा कि क्या हो रहा है - हो सकता है मैं नुकसान कर रहा होऊं और मुझे पता ही न चले।

यह इतना भयानक हो गया कि एक तरफ दर्द से लगभग लकवा जैसा हो गया था। लेकिन मैं सारी गतिविधियां करता रहा, देश के अंदर बहुत यात्रा की। यहां तक कि 8 मार्च को - महाशिवरात्रि में - पूरी रात के जश्न के दौरान मुझे बहुत दर्द था। आप वीडियो देखिए - मैं पूरी रात नाच रहा हूं, ध्यान कर रहा हूं, बात कर रहा हूं, सब कुछ। किसी को पता नहीं चला कि कुछ गलत है, सिवाय मेरे आस-पास के एक-दो लोगों के जो जानते थे कि मुझे दर्द है। तो मैं सिर्फ कुछ ठंडे पैच लगा रहा था आंखों को थोड़ा शांत करने के लिए क्योंकि यह बिजली जैसा था।

मेरी चेन्नई और मुंबई की यात्रा थी, और फिर मैं दिल्ली आया 14 मार्च को एक इवेंट के लिए। डॉक्टर ने मुझे देखा और कहा, "सद्‌गुरु, आप यह इवेंट नहीं कर सकते। आपको तुरंत अस्पताल आना चाहिए।"

मैंने कहा, "यह एक प्राइवेट इवेंट है, जिसके मैंने हाँ कह दिया है। मैं इसे संभाल लूंगा।"

मैं दर्द की दवाई नहीं लेता क्योंकि मैं जानना चाहता हूं कि क्या हो रहा है।

अगले दिन मेरा इंडिया टुडे टेलीविजन के साथ मीडिया इवेंट था - 45 मिनट की बातचीत। डॉक्टर ने कहा, "आप यह नहीं कर सकते, मैं अपनी बात पर अड़ा हुआ हूँ।" तो मैंने इंडिया टुडे वालों को बताने की कोशिश की कि मेरी पारिवारिक इमरजेंसी है।

उन्होंने कहा, "सद्‌गुरु, टिकट बेचे जा चुके हैं, सब लोग सिर्फ आपके लिए आए हैं। आप ऐसा कैसे कर सकते हैं?" आज तक मैंने अपनी जिंदगी में एक भी इवेंट कैंसल नहीं किया है। चाहे मेरे साथ कुछ भी घटित हो, मैं उसे पूरा करता हूं। तो मैंने डॉक्टर से कहा, "देखिए, वे ऐसा कह रहे हैं।"

लुईस हाउज़: वे आप पर भरोसा कर रहे हैं।

सद्‌गुरु: हाँ, मैं पीछे नहीं हट सकता। तो मैं बात कर रहा हूं, और 45 मिनट खत्म हो गए, लेकिन पत्रकार और सवाल पूछना चाहता है। तब तक, मेरा बाँया पैर खुद से हिलने लगा। पिछले दिन, उन्होंने एमआरआई स्कैन किया था और पाया था कि मेरे दिमाग का मीडियन 8.4 मिलीमीटर खिसक गया था। डॉक्टर ने कहा, "सद्‌गुरु, बारह जानलेवा होता है।"

मैंने कहा, "मैं वहां नहीं पहुँचूँगा। मैं बस इसे खत्म करके आ जाऊंगा।"

जब पैर काँपना शुरू हुआ, मुझे पता चल गया कि मैंने सारी सीमाएं पार कर दी हैं। मुझे कभी भी लकवा हो सकता है, स्ट्रोक हो सकता है, कुछ भी। फिर मैं स्टेज से उतर गया। मैंने कहा, "मैंने सारी सीमाएं पार कर दी हैं, आपको जो करना है कीजिए।"

वो मुझे सीधे सर्जरी टेबल पर ले गए। जब उन्होंने स्कैन किया, तो मैं मीडियन से 11.5 मिलीमीटर दूर था - मौत से आधा मिलीमीटर दूर। वे तुरंत मुझे एक सर्जन के पास ले गए, एक बड़ी खिड़की खोली, और मुझे एनेस्थीसिया दिया।

दिल्ली में ये सभी युवा नर्सें - वे सभी मुझे जानती हैं, वे मुझे फॉलो करती हैं, लेकिन उन्हें कभी मुझे देखने का मौका नहीं मिला था। यहां उन्हें मैं टेबल पर मिल गया, और उनमें से आठ बड़ी मुस्कान के साथ मुझे देख रही हैं। शायद सिर्फ एक या दो की जरूरत थी, लेकिन वे सभी वहां रहना चाहती थीं।

मैंने कहा, "जब मैं एनेस्थीसिया से बाहर आऊं, तो ऐसे मत मुस्कुराना। मुझे लग सकता है कि मैं दूसरी तरफ पहुँच गया हूं।" वे सभी हंसने लगीं, और फिर मैं बेहोश हो गया।

मैं हमेशा ऐसे ही जीता रहा हूं - अगर यह अभी आता है, तो मैं तैयार हूं। मैं पीछे मुड़कर नहीं देखूंगा।

सर्जरी अच्छी हुई। मैं ठीक हो गया, लेकिन बहुत अस्थिर था - सीधा नहीं चल सकता था, मेरा संतुलन चला गया था। लेकिन मैं सबका हौसला बढ़ाता रहा। यहां तक कि प्रधानमंत्री ने भी फोन करके पूछा कि मैं कैसा हूं। पूरे देश में, यह बड़ी खबर थी। डॉक्टर ने कहा, "छह महीने गाड़ी नहीं चलानी, और दो साल मोटरसाइकिल नहीं।"

तीन हफ्ते बाद, मैं कोयंबटूर पहुंचा और मैं सेंटर तक गाड़ी चलाकर गया।

लुईस हाउज़: आपने कार चलाई?

सद्‌गुरु:  हां। उनकी कहना ये था कि अगर आप गाड़ी चलाते हैं और कोई झटका लगता है, तो कुछ गड़बड़ हो सकता है। मैंने कहा, "अगर मैं चला रहा हूं, तो कम से कम मुझे पता है कि कब झटका लगेगा। अगर कोई दूसरा चला रहा है, तो मुझे पता नहीं कि वे कब गाड़ी को झटका देंगे।"

उन्होंने कहा, "कोई झटका नहीं, कोई हिलना-डुलना नहीं, कोई गिरना नहीं।" मैंने कहा, "मैं उसका ख्याल रखूंगा।" अभी भी घाव खुला था, लेकिन मैं वापस गया, लोग बहुत खुश थे, भावुक थे क्योंकि वे सभी डर गए थे कि मेरा अंत समय आने वाला है।

उसके इक्कीस दिन बाद, हमने बाली और कंबोडिया में एक प्रोग्राम तय किया था। यह दुनिया भर से रजिस्टर हुए लोगों का एक छोटा समूह था, खासकर चीनी और रूसी जो भू-राजनीतिक कारणों से अभी भारत नहीं आ सकते थे। डॉक्टर ने कहा, "आप बिल्कुल यात्रा नहीं कर सकते।"

मैंने कहा, "मैं इसका ख्याल रखूंगा।" मेरी बेटी ने कहा कि वह मेरे साथ यात्रा करेगी, और मेरी देखभाल के लिए एक पूरी टीम थी। तो मैं बाली गया प्रोग्राम करने के लिए; वहां बहुत शारीरिक गतिविधि थी। मैंने सिर्फ़ सिखाने का काम संभाला, बाक़ी चीजें दूसरे लोग संभालते। यह बहुत अच्छा हो गया। चार दिन बाद, हमें कंबोडिया जाना था। मैं अपने घाव पर प्लास्टिक रैप लगाकर थोड़ा तैर रहा था क्योंकि मुझे व्यायाम की जरूरत थी।

मैं और मेरी बेटी पूल में तैर रहे थे। उसके बाद, मैं ऊपर आया और एक कुर्सी पर बैठ गया, वह फर्श पर बैठी थी। एक बड़ा बंदर बैठक में आया, जो खुला था। वहां फलों के ढेर थे, तो बंदर अंदर आ गया। मेरी बेटी सहज रूप से बंदर पर चिल्लाई। बंदर मुड़ा और मुंह खोलकर उसकी तरफ आया।

मैंने बंदर के काटने का घाव देखा है जहां व्यक्ति के चेहरे का आधा हिस्सा चला गया था।

यह उसकी तरफ आ रहा था। तो मैं उठा और अपनी छड़ी लेने के लिए भागा। किसी ने दरवाजा बंद कर दिया था। मैं गया और पूरी रफ्तार से शीशे में जा टकराया। शीशे ने इतनी जोर से आवाज की कि बंदर भाग गया। उद्देश्य पूरा हो गया था, लेकिन मेरा सिर फट गया।

मैंने तुरंत सोचा कि मैं दिल्ली के लिए उड़ान लूँगा - दूसरी इमरजेंसी सर्जरी के लिए, क्योंकि उन्होंने कहा था कि अगर आप सिर पर चोट लगाते हैं, तो यही होगा। फिर मैंने सोचा कि मैं रात तक इंतजार करूंगा और देखूंगा कि कोई लक्षण हैं या नहीं, जैसे असंतुलन या दर्द। कुछ नहीं हुआ।

अगली सुबह, मैं ठीक उठा। मैंने कहा, "मैं कंबोडिया के लिए उड़ान लूँगा। सिर्फ तीन दिन और, मैं इसे खत्म कर दूंगा। अगर कोई संकेत हुआ, तो मैं वापस चला जाऊंगा।" मैंने अगले तीन दिन का प्रोग्राम किया। फिर मैंने कोयंबटूर के लिए उड़ान भरी। एयरपोर्ट से मैं सीधे स्कैन के लिए गया। एक बार फिर अंदरूनी खून का बहाव था।

मैं दूसरी सर्जरी के लिए गया। वह सर्जरी भी ठीक हुई। लेकिन सर्जरी के तीसरे दिन, एक साइटोकाइन स्टॉर्म हुआ, शरीर की हर कोशिका में तूफान सा आ गया। यह सिर्फ तब होता है जब आपको सेप्सिस या कोई और गंभीर संक्रमण हो। मुझे किसी भी तरह का संक्रमण नहीं था। डॉक्टर समझ नहीं पा रहे थे कि क्या हुआ। मुझे पता था कि मैं अपने अंदर से किसी तरह रिस रहा था।

जब मैंने आंखें बंद कीं, तो मैं देख सकता था कि शरीर की हर कोशिका से मैं रिस कर बाहर जा रहा था। यह एक सुंदर एहसास था, जैसे शरीर की हर कोशिका कुछ जाने दे रही हो।

मैंने आंखें खोलीं और देखा कि 14 डॉक्टर वहां खड़े हैं, जिसमें अस्पताल के चेयरपर्सन भी शामिल हैं, सभी की आंखों में आंसू। उन्हें लगा कि वे मुझे खो चुके हैं क्योंकि अंगों की विफलता शुरू हो गई थी।

उनके चेहरे देखकर, मुझे पता चल गया कि वे मुझको लेकर एक तरह से हार मान रहे हैं। जब मैंने आंखें बंद कीं, तो मैं देख सकता था कि शरीर की हर कोशिका से मैं रिस कर बाहर जा रहा था। यह एक सुंदर एहसास था, जैसे शरीर की हर कोशिका कुछ जाने दे रही हो।

तो मैंने आंखें बंद कीं, और मैं बहुत अधिक सचेतन हो गया। मैंने खुद को उस तरह रखा। और लगभग डेढ़ घंटे में, मैं वापस मुड़ गया। जब मैं उससे बाहर आया, तो छह घंटे बीत चुके थे। लगभग डेढ़ घंटे तक, उन्होंने सोचा कि वे मुझे पूरी तरह खो चुके हैं।

ठीक होने में कुछ समय लगा। लेकिन दो महीने के अंदर, मैं मोटरसाइकिल पर था। मैं इसलिए चला रहा था कि मैं देखना चाहता था कि मैं वास्तव में वहां था या नहीं। मैं ठीक था। मैं मजाक करता रहा, "उन्होंने मेरा आधा दिमाग निकाल दिया, और मैं अब बेहतरीन कर रहा हूं।"

लुईस हाउज़: क्या उस दौरान आपको कोई डर था?

सद्‌गुरु: नहीं, मैं हमेशा ऐसे ही जीता रहा हूं - अगर यह अभी आता है, तो मैं तैयार हूं। मैं पीछे मुड़कर नहीं देखूंगा।

लुईस हाउज़: लेकिन बहुत से लोग अभी मरने से डरेंगे क्योंकि हो सकता है उन्होंने वह पूरा नहीं किया हो जो वे जिंदगी में चाहते हैं।

80 प्रतिशत से अधिक लोग, अगर आप उन्हें मौत के आखिरी पलों में देखें, तो वे दर्द में नहीं हैं, वे डर में नहीं हैं - वे सिर्फ हैरान हैं क्योंकि उन्होंने अपने मानसिक ड्रामे को जीवन प्रक्रिया समझ लिया।

सद्‌गुरु: वे सौ साल की उम्र तक पहुंचने पर भी डरेंगे। वे तब भी उसी हालत में होंगे।

लुईस हाउज़: लेकिन इससे भी अधिक दुख की बात यह है कि वे वह उद्देश्यपूर्ण जीवन नहीं जी पाए जो वे जीना चाहते थे, है ना?

सद्‌गुरु: उद्देश्यपूर्ण समय के कारण नहीं होता। उद्देश्यपूर्ण जीवन इरादे और जागरूकता के कारण होता है। 80 प्रतिशत से अधिक लोग, अगर आप उन्हें मौत के आखिरी पलों में देखें, तो वे दर्द में नहीं हैं, वे डर में नहीं हैं - वे सिर्फ हैरान हैं क्योंकि उन्होंने अपने मानसिक ड्रामे को जीवन प्रक्रिया समझ लिया। 

आपके मन में जो चल रहा है वह आपका मानसिक ड्रामा है – आपके विचार और भावनाएँ। लेकिन आप सोचते हैं कि वही जीवन है। यह आपके द्वारा बनाया गया है। यह वास्तव में जीवन नहीं है। जीवन आपके द्वारा नहीं बनाया गया है। यह घटित हो रहा है। आपने यह जीवन नहीं बनाया। आप सिर्फ परिस्थितियां बना रहे हैं।

लुईस हाउज़: नहीं।

सद्‌गुरु: क्या यह शरीर आप हैं?

लुईस हाउज़: मेरा एक हिस्सा।

सद्‌गुरु: आपने इसे समय के साथ जमा किया है। यह वह भोजन है जो आपने खाया है - यह सिर्फ मिट्टी है। इसे क्या आप अभी समझेंगे, या आपको एक दिन मिट्टी में मिलने पर कीड़े समझाएँगे? वे आपको साफ-साफ बता देंगे कि आप बस ऊपरी मिट्टी हैं। लेकिन अगर आप इसे अभी जान जाएं, तो आप अलग तरीके से जीते हैं।