गुरु पूर्णिमा की कहानी – आदियोगी शिव से लेकर आज तक का सफर

कैसे मनाना शुरू किया था हमने गुरु पूर्णिमा का उत्सव? सद्‌गुरु हमें बता रहे हैं कि ये दिन सभी धर्मों के आने से पहले से एक उत्सव की तरह मनाया जाता रहा है, और इसी दिन इंसान को मुक्ति की संभावना के बारे में बताया गया था।
Story of Guru Purnima in Hindi - आदियोगी शिव से लेकर आज तक का सफर
 

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 सद्‌गुरु : हम दक्षिणायन की अवधि में प्रवेश कर चुके हैं। इस समय धरती के आकाश में सूर्य उत्तर की जगह दक्षिण की ओर बढ़ने लगता है, जिससे मानव शरीर के भीतर कुछ ऐसे बदलाव आते हैं कि ये समय साधना करने के लिए, और लक्ष्य निर्धारित करने के लिए ज्यादा अनुकूल होता है। ये वो समय है जब किसान भूमि को जोतना शुरू करता है, और योगी पृथ्वी के इस टुकड़े - शरीर - को गूंधना शुरू कर देता है जिसे उठाने का विशेषाधिकार उसे मिला है। और यही वो समय है, जब हजारों साल पहले, आदियोगी की शानदार आंखें मानव जीव पर पड़ी थीं।

प्रथम गुरु पूर्णिमा की कहानी

योग संस्कृति में, शिव को भगवान के रूप में नहीं देखा जाता, उन्हें पहले योगी, आदियोगी, के रूप में देखा जाता है। 15000 साल पहले, एक योगी हिमालय के ऊपरी क्षेत्रों में दिखाई दिए थे। कोई भी नहीं जानता था कि वो कहाँ से आए थे, और उनका पिछ्ला जीवन कैसा था। उन्होंने अपना परिचय नहीं दिया था - इसलिए लोगों को उनका नाम भी नहीं पता था। इसलिए उन्हें आदियोगी या पहले योगी कहा जाता है।

वे बस आए और बैठ गए और कुछ भी नहीं किया। जीवन का एकमात्र संकेत उनकी आँखों से बह रहे परमानंद के आँसू थे। उसके अलावा, ऐसा भी नहीं लग रहा था कि वे सांस ले रहे हों। लोगों ने देखा कि वे ऐसा कुछ ऐसा अनुभव कर रहे थे, जिसे वे समझने में असमर्थ थे। लोग आए, इंतजार किया और चले गए क्योंकि वो योगी अन्य लोगों की मौजूदगी से अनजान थे।

कोई भी नहीं जानता था कि वो कहाँ से आए थे, और उनका पिछ्ला जीवन कैसा था। उन्होंने अपना परिचय नहीं दिया था - इसलिए लोगों को उनका नाम भी नहीं पता था। इसलिए उन्हें आदियोगी या पहले योगी कहा जाता है।

केवल सात लोग वहीँ रुके रहे। ये सातों उन योगी से सीखने का निश्चय कर चुके थे। आदियोगी ने उन्हें नजरअंदाज कर दिया। उन्होंने अनुरोध किया, "जो आप जानते हैं, वो हम भी जानना चाहते हैं।" उन्होंने उन्हें खारिज कर दिया, "तुम लोग मूर्ख हो, जिस तरह से तुम हो, वैसे तो तुम दस लाख वर्षों में नहीं जान पाओगे। तुम्हें तैयारी करने की जरूरत है। इसके लिए जबरदस्त तैयारी की आवश्यकता है। यह मनोरंजन नहीं है। "

लेकिन वे सीखने के लिए बहुत आग्रह(जोर दे कर कहना) कर रहे थे, इसलिए आदियोगी ने उन्हें कुछ प्रारंभिक साधना दी। फिर उन सातों ने तैयारी शुरू कर दी - दिन सप्ताह में बदले, सप्ताह महीनों में, और महीने वर्षों में - वे तयारी करते रहे। आदियोगी बस उन्हें नजरअंदाज करते रहे। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने 84 साल तक साधना की थी। फिर, एक पूर्णिमा के दिन, 84 वर्षों के बाद, उस दिन जब सूर्य उत्तर से दक्षिण की ओर जा रहा था - जिसे इस परंपरा में दक्षिणायन के रूप में जाना जाता है - आदियोगी ने इन सात लोगों को देखा। वे ज्ञान के चमकदार पात्र बन गए थे। वे प्राप्त करने के लिए बिल्कुल परिपक्व(तैयार) थे। वे अब उन्हें अनदेखा नहीं कर सके।

आदियोगी उन्हें बारीकी से देखते रहे और अगली पूर्णिमा के दिन, उन्होंने एक गुरु बनने का फैसला किया। वो पूर्णिमा का दिन, गुरु पूर्णिमा के रूप में जाना जाता है। गुरु पूर्णिमा, वो पूर्णिमा है जब पहले योगी ने खुद को आदिगुरु या पहले गुरु में बदल दिया। वह दक्षिण की ओर मुड़ गए - यही कारण है कि वे दक्षिणामुर्ती के रूप में भी जाने जाते हैं - और सात शिष्यों को योग विज्ञान देना शुरू किया। इस प्रकार, दक्षिणायण की पहली पूर्णिमा, गुरु पूर्णिमा कहलाती है। इस दिन पहले गुरु प्रकट हुए थे।

गुरु पूर्णिमा: पार करने की संभावना

यह संचरण - दुनिया का पहला योग कार्यक्रम - केदारनाथ से कुछ किलोमीटर ऊपर, कान्तिसरोवर झील के किनारे हुआ था। "योग" से हमारा मतलब, शरीर को मोड़ना या अपनी सांस को रोकना नहीं है। हम जीवन की तकनीक की, और सृष्टि के इस टुकड़े - आप खुद - को इसकी परम संभावना तक ले जाने की बात कर रहे हैं। मानव चेतना का यह असाधारण आयाम, या इंसान के ब्रह्माण्ड तक पहुँचाने वाली एक खिड़की बन जाने की संभावना, का खुलासा इस दिन किया गया था।

गुरु पूर्णिमा मानवता के जीवन के सबसे महान क्षणों में से एक है। यह ऊपर उठने और मुक्ति पाने के बारे में है, जो कि एक ऐसी संभावना है जिसके बारे में मनुष्य कभी नहीं जानते थे। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपका वंश क्या है, आपके पिता कौन थे, या आप किन सीमाओं के साथ पैदा हुए थे या आपने खुद पर लगा दी हैं, यदि आप प्रयास करने के इच्छुक हैं, तो आप उन सभी चीज़ों से ऊपर उठ सकते हैं। मानव इतिहास में पहली बार उन्होंने घोषणा की थी, कि मनुष्य के लिए चेतन होकर विकास करना संभव है।

पश्चिमी जगत के वे समाज जो विकासवाद को मानते हैं, आज आध्यात्मिक प्रक्रिया के लिए खुलापन रखते हैं। जो लोग मानते हैं कि भगवान ने हमें ऐसा ही बनाया है और इसके अलावा और कुछ भी नहीं मानते - वे ऐसी किसी भी संभावना के लिए खुले नहीं हैं।

कुछ साल पहले, मैंने एक अमेरिकी पत्रिका के साथ इंटरव्यू में हिस्सा लिया था। उन्होंने मुझसे एक प्रश्न पूछा, "पश्चिम में मानव चेतना के लिए काम करने वाले सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति कौन हैं?" बिना किसी हिचकिचाहट के, मैंने कहा, "चार्ल्स डार्विन"। उन्होंने कहा, "लेकिन चार्ल्स डार्विन तो एक जीवविज्ञानी है।" मैंने हाँ कहा, लेकिन वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने लोगों को बताया कि विकास करना संभव है। आप अभी जो हैं, उससे कुछ ज्यादा बनना संभव है।

पश्चिमी जगत के वे समाज जो विकासवाद को मानते हैं, आज आध्यात्मिक प्रक्रिया के लिए खुलापन रखते हैं। जो लोग मानते हैं कि भगवान ने हमें ऐसा ही बनाया है और इसके अलावा और कुछ भी नहीं मानते - वे ऐसी किसी भी संभावना के लिए खुले नहीं हैं।

डार्विन ने दो सौ साल पहले जैविक विकास की बात की थी। आदियोगी ने पंद्रह हज़ार साल पहले आध्यात्मिक विकास की बात की थी। उनकी शिक्षा का सार यह है कि इस अस्तित्व में प्रत्येक परमाणु, यहाँ तक कि सूर्य और धरती की अपनी चेतना है; लेकिन उनके पास समझदार मन नहीं है। जब चेतना के साथ एक समझदार मन भी जुड़ जाता है, तो ये सबसे शक्तिशाली संभावना होती है। यही चीज़ मानव जीवन को इतना असाधारण बनाती है।

गुरु पूर्णिमा की कहानी में मानसून की भूमिका

आदियोगी ने जब योग विज्ञान को सातों ऋषियों तक पहुंचा दिया, तब वे दुनिया भर में योग विज्ञान को फैलाने के लिए तैयार हुए। उनमें से एक, अगस्त्य मुनी, दक्षिण में भारतीय उपमहाद्वीप की ओर बढ़ गए। अगस्त्य मुनी ने एक ऐसा जीवन जीया, जिसे लगभग अतिमानवी(सुपरह्यूमन) माना जा सकता है। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि हिमालय के दक्षिण में जहां भी लोग रह रहे हैं, वहां एक आध्यात्मिक प्रक्रिया हो। कई मायनों में, आज हम जो कुछ भी करते हैं, जिसे हम ईशा योग कहते हैं, वो अगस्त्य के काम का एक छोटा सा विस्तार है।

दक्षिण आने और फिर से उत्तर तक यात्रा करने की यह परंपरा अगस्त्य के समय से एक वार्षिक चक्र के रूप में चली आ रही है। आज, संख्याएं घट गई हैं, लेकिन एक समय था जब योगी सैकड़ों और हजारों की संख्या में यात्रा करते थे।

अगस्त्य मुनि के दक्षिण की ओर जाने की वजह से, योगियों और आध्यात्मिक साधकों के मौसमों के बदलने के साथ-साथ, हिमालयी क्षेत्र से दक्षिण की ओर जाकर वापस आने की परम्परा शुरू हुई। यह निरंतर चक्र हजारों सालों से चला आ रहा है। गर्मियों के दौरान, वे हिमालयी गुफाओं में होते हैं, और सर्दियों में वे दक्षिण आ जाते हैं। उनमें से कई रामेश्वरम तक यात्रा करते हैं, जो कि महाद्वीप की दक्षिणी नोक है, और फिर से हजारों किलोमीटर चलकर उत्तर जाते हैं।

दक्षिण आने और फिर से उत्तर तक यात्रा करने की यह परंपरा अगस्त्य के समय से एक वार्षिक चक्र के रूप में चली आ रही है। आज, संख्याएं घट गई हैं, लेकिन एक समय था जब योगी सैकड़ों और हजारों की संख्या में यात्रा करते थे। उन दिनों, बड़ी संख्याओं में यात्राएं होने की वजह से, मानसून का यह महीना एक चुनौती था।

हमें अब इसका अधिक अनुभव नहीं होता, लेकिन मानसून परंपरागत रूप से एक बहुत ही प्रचंड प्रक्रिया रही है। मानसून शब्द अपने आप में एक निश्चित गति और प्रचंडता का अहसास दिलाता है। जब प्रकृति इतनी प्रचंड हो जाती थी, तब पैर से यात्रा करना मुश्किल हो जाता था। आम तौर पर यह निर्णय लिया जाता था, कि इस महीने के लिए, हर कोई जहां भी संभव हो सके, आश्रय ले लेगा।

काफी समय बाद, गौतम बुद्ध ने भी इस महीने के लिए अपने भिक्षुओं के लिए आराम निर्धारित किया - बस उन्हें मौसम की स्थिति से आराम दिलाने के लिए, क्योंकि लोगों के लिए यात्रा करना बहुत कठिन हो जाता था। उन्हें एक ही जगह रहना होता था, इसलिए ये तय किया गया कि ये महीना गुरु की निरंतर याद में बिताया जाए।

गुरु पूर्णिमा की कहानी सभी धर्मों से पुरानी है

हजारों सालों से, गुरु पूर्णिमा को उस दिन के रूप में हमेशा पहचाना और मनाया जाता था, जब मानव जाति के लिए नई संभावनाएं खुली थीं। आदियोगी की ये भेंट सभी धर्मों से पुरानी है। इससे पहले कि लोग मानवता में इस तरह फुट डालने के विभाजनकारी तरीके तैयार करते कि उसे जोड़ना असंभव लगता, मानव चेतना को ऊपर उठाने के लिए आवश्यक सबसे शक्तिशाली उपकरणों को तैयार करके लोगों तक पहुंचाया जा चुका था। हजारों साल पहले, आदियोगी ने हर संभव तरीके से खोज की जिससे आप मानव तंत्र को रूपांतरित करके परम संभावना तक ले जा सकते हैं।

ये तरीके इतने रिफाइंड और जटिल हैं, कि विश्वास करना मुश्किल है। ये सवाल करना कि क्या उस समय लोग इतने रिफाइंड थे, कोई मायने नहीं रखता, क्योंकि यह एक निश्चित सभ्यता या विचार प्रक्रिया से नहीं आया था। यह एक भीतरी बोध से आया था। उनके आस-पास क्या हो रहा था उसके साथ इसका कोई लेना-देना नहीं था। उन्होंने सिर्फ खुद को सभी के साथ बांटा था। उन्होंने बहुत विस्तार से, मानव सिस्टम के हर बिंदु का अर्थ और उससे जुड़ी संभावना बताई।

आप आज भी एक भी चीज़ नहीं बदल सकते, क्योंकि वो हर बात जो बताई जा सकती है, उन्होंने बहुत ही सुंदर और बुद्धिमान तरीकों से बताई। आप बस उसे समझने की कोशिश में अपना पूरा जीवन लगा सकते हैं।

हम आजकल गुरु पूर्णिमा क्यों नहीं मना रहे हैं?

गुरु पूर्णिमा ऊपर उठने और मुक्ति पाने के बारे में है - जो कि ऐसी संभावनाएं हैं जिनके बारे में मनुष्य कभी नहीं जानते थे। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपका वंश क्या है, आपके पिता कौन थे, या आप किन सीमाओं के साथ पैदा हुए थे, या आपने खुद पर लगा दी हैं, यदि आप प्रयास करने के इच्छुक हैं, तो आप उन सभी चीज़ों से ऊपर उठ सकते हैं। इस दिन को इस रूप में पहचाना गया था और ये दिन हजारों वर्षों तक इस संस्कृति के सबसे महत्वपूर्ण उत्सवों में से एक था।

लेकिन पिछले 300 वर्षों में इस देश पर शासन करने वाले लोगों की अपनी योजना थी। उन्होंने देखा कि जब तक लोग आध्यात्मिक रूप से स्थिर और मजबूत होते हैं, तब तक आप उन पर शासन नहीं कर सकते। गुरु पूर्णिमा के दिन छुट्टी क्यों नहीं है? रविवार को अवकाश क्यों होना चाहिए? रविवार को आप क्या करते हैं - आलू चिप्स खाते हैं और टेलीविजन देखते हैं। आपको यह भी नहीं पता कि क्या करना है! लेकिन अगर पूर्णिमा या अमावस्या के दिन छुट्टी हो, तो हम जानते हैं कि क्या करना है।

मैं चाहता हूं कि आप सभी ऐसा कीजिए। इस गुरु पूर्णिमा पर ऑफिस मत जाइए। छुट्टी के लिए अप्लाई कीजिए और कहिए, "उस दिन गुरु पूर्णिमा है, इसलिए मैं नहीं आ रहा हूं।" अपने सभी दोस्तों को छुट्टी के लिए अप्लाई करने के लिए कहिए, क्योंकि उस दिन गुरु पूर्णिमा है। उस दिन आपको क्या करना चाहिए? उस दिन को अपने भीतरी कल्याण के लिए समर्पित कीजिए, हल्का भोजन कीजिए, संगीत सुनिए, ध्यान कीजिए, चंद्रमा को देखिए - यह आपके लिए शानदार होगा क्योंकि यह संक्रांति के बाद पहली पूर्णिमा है। कम से कम दस अन्य लोगों को बताइए कि ये एक महत्वपूर्ण दिन है।

अब समय आ गया है, कि एक महत्वपूर्ण दिन ही छुट्टी का दिन हो। कम से कम, गुरु पूर्णिमा के दिन छुट्टी होनी चाहिए ताकि लोग इसका महत्व जान सकें। जब मानव जाति के साथ इतनी जबरदस्त घटना घटी तो इसे बर्बाद नहीं होना चाहिए।