प्रश्न: सद्गुरु, आप शिव को बहुत महत्व देते हैं। लेकिन आप अन्य गुरुओं, जैसे कि जेन गुरुओं के बारे में ज्यादा बात क्यों नहीं करते?
सद्गुरु: क्योंकि मेरे लिए कोई भी उतना पागल नहीं है! हम शिव बनाम किसी और के बारे में बात नहीं कर रहे हैं। जिसे आप “शिव” कहते हैं, उसमें सब कुछ शामिल है। ऐसे कई अद्भुत इंसान हुए हैं जिन्होंने मानवता की भलाई के लिए अद्भुत कार्य किए हैं। लेकिन बोध की बात की जाए, तो उनके जैसा कोई दूसरा नहीं हुआ है।
तो आप जेन के बारे में बात कर रहे हैं। शिव से बड़ा जेन गुरु कौन हो सकता है? क्या आपने जेन मास्टर गुटेई के बारे में सुना है? गुटेई जब भी जेन के बारे में बात करते थे, तो वे हमेशा अपनी उंगली उठाते थे, यह दिखाने की कोशिश करते कि, "सब कुछ एक ही है।" इन जेन मठों में छोटे बच्चे चार-पाँच साल की उम्र में भिक्षु बन जाते थे। ऐसा ही एक बच्चा गुटेई को देखकर बड़ा हुआ और जब भी कोई कुछ कहता, वह भी अपनी उंगली उठा देता। गुटेई यह सब देख रहे थे, लेकिन उन्होंने इंतजार किया कि लड़का सोलह साल का हो जाए। एक दिन उन्होंने उसे बुलाया, खुद अपनी उंगली उठाई, और जैसे ही लड़के ने भी वही किया, गुटेई ने चाकू निकाला और उसकी उंगली काट दी! कहा जाता है कि उसी क्षण लड़का आत्मज्ञान को प्राप्त हो गया – उसने अचानक समझ लिया कि यह "एक" के बारे में नहीं, बल्कि शून्य के बारे में है।
शिव इससे भी बहुत आगे गए – और वह भी बहुत पहले। एक दिन, बहुत समय बाद, जब वे घर लौटे तो उन्होंने अपने बेटे को देखा जो अब दस-ग्यारह साल का हो चुका था। इस लड़के के हाथ में एक छोटा त्रिशूल था, और उसने शिव को अंदर जाने से रोकने की कोशिश की। शिव ने त्रिशूल नहीं, बल्कि उसके सिर को हटा दिया! पार्वती इससे बहुत दुखी हुईं। इसे ठीक करने के लिए, शिव ने एक गण का सिर उस लड़के के शरीर पर लगा दिया। वह लड़का असाधारण रूप से बुद्धिमान हो गया। आज भी, भारत में, लोग किसी भी शिक्षा या नए कार्य की शुरुआत करने से पहले पहले उसी बालक की पूजा करते हैं। बाद में, लोग इसे बदलते गए और "गण" का सिर "गज" (हाथी) का सिर बन गया, लेकिन वे ज्ञान और बुद्धिमत्ता का प्रतीक बन गए। कहा जाता है कि ऐसा कुछ भी नहीं था जिसे वे नहीं जानते थे।
कुछ भी ऐसा नहीं है जो शिव के जीवन से अछूता हो। वे इतने जटिल और पूर्ण हैं।
यह पहली जेन क्रिया थी! शिव के जीवन से कुछ भी बाहर नहीं है। वे इतने जटिल और पूर्ण हैं। और उनके पास कोई उपदेश नहीं था – सिर्फ तरीके थे। और ये तरीके पूरी तरह वैज्ञानिक थे। उन्होंने 112 मार्ग दिखाए जिनसे मनुष्य मुक्ति प्राप्त कर सकता है। मनुष्य के शरीर में कुल 114 चक्र होते हैं, लेकिन उनमें से दो भौतिक शरीर से बाहर हैं। इसलिए उन्होंने कहा, "वह क्षेत्र केवल उन्हीं के लिए है जो भौतिक से परे हैं। मनुष्यों के लिए केवल 112 रास्ते हैं।" और उन्होंने स्पष्ट विधियाँ दीं कि इन 112 संभावनाओं का उपयोग कैसे किया जा सकता है। इन सभी में से किसी भी एक को अपनाकर कोई भी सत्य को जान सकता है।
शिव ने जो कहा, वह जीवन की यांत्रिकी है – कोई फिलॉसफी नहीं, कोई उपदेश नहीं, कोई सामाजिक विचारधारा नहीं – बस विज्ञान। इस विज्ञान के आधार पर विभिन्न गुरुओं ने तकनीकें विकसित की। आज आप जिस भी तकनीक का आनंद ले रहे हैं, चाहे वह स्मार्टफोन हो, कंप्यूटर हो या कोई अन्य उपकरण, उसके पीछे एक विज्ञान है। वह विज्ञान आपको सीधे समझ में नहीं आता – आप केवल तकनीक का उपयोग कर रहे हैं। लेकिन अगर किसी ने उस विज्ञान को नहीं समझा होता, तो वह तकनीक भी नहीं होती।
इसी तरह, शिव ने केवल विज्ञान दिया। इसे सप्तऋषियों पर छोड़ दिया कि वे इसे अपने सामने बैठे लोगों के लिए किस प्रकार की तकनीक में रूपांतरित करें। तकनीक को परिस्थितियों के अनुसार बनाया जा सकता है – जो आज की जरूरत है, उसके अनुसार हम एक विशेष उपकरण बनाते हैं। लेकिन मूलभूत विज्ञान वही रहता है। आज जो उपकरण मूल्यवान हैं, वे कल बेकार हो सकते हैं क्योंकि नए उपकरण आ जाते हैं। लेकिन उनके पीछे का विज्ञान नहीं बदलता।
तो आदियोगी के रूप में, हम मूलभूत विज्ञान की बात कर रहे हैं। आज जब मानवता कई कारणों से जिस स्थिति में है, ऐसे समय में यह बहुत जरूरी है कि इस मूलभूत विज्ञान को मजबूत किया जाए।