कल मंदिर से वापस आते हुए मैंने देखा कि एक कैमरामैन उल्टा भागते हुए कैमरे से शूट कर रहा है। रास्ता पथरीला और खुरदुरा था और कैमरा पकड़े हुए वह लडक़ा नंगे पैर उल्टा भाग रहा था। शायद उसने अपनी चप्पलें मंदिर के बाहर छोड़ दी थीं, और जब मैं मंदिर से बाहर निकल आया तो वह मुझे शूट करने लगा। उसे उल्टा भागता देख मैंने उससे कहा कि अपने पैरों का ध्यान रखिए। पैरों में चोट लग सकती है, क्योंकि यहां बहुत सारे पत्थर और नुकीले कंकड़ हैं। उसने जवाब दिया, ‘सद्‌गुरु मेरा ध्यान मेरे पैरों पर नहीं है। मेरा ध्यान फिलहाल पूरी तरह अपने काम पर है। मैं बस आपको इस रास्ते पर चलते हुए शूट करना चाहता हूं।’ मैंने कहा, ‘यह तो जीने का जबरदस्त तरीका है।’

वाकई यह जीने का शानदार तरीका है। आखिर कितने लोग किसी भी काम को करने के ऐसे आनंद के बारे में जानते हैं?

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप क्या कर रहे हैं, जो कर रहे हैं - वह कितना बड़ा या छोटा काम है। यह कोई मुद्दा ही नहीं है। आप जो भी कर रहे हैं, उससे किस हद तक जुड़े हुए हैं, यही चीज आपके जीवन को सुंदर बनाती है। आप फर्श को साफ करते हुए भी अपने जीवन में परमानंद की अनुभूति कर सकते हैं। मैं आपको आश्रम में दिखाऊंगा कि कैसे लोग बड़े आनंद के साथ फर्श साफ कर रहे हैं। उनको काम करते देख ऐसा लगेगा मानो वे धरती का सबसे महान काम कर रहे हों। जब आप पूरी तरह शामिल होकर किसी काम को करते हैं, तो छोटी-छोटी चीजों पर भी लोग गौर करने लगते हैं। कुछ लोग तेल का दीया जलाने के बजाय घी का दीया जलाते हैं, क्योंकि उन्होंने गौर किया है कि घी के दीए से निकलने वाली रोशनी की चमक तेल के दीए के मुकाबले थोड़ी अलग होती है। ये लोग अपने भगवान के लिए थोड़ी अलग चमक व आभा रखना चाहते हैं। कितनी शानदार बात है! भले ही ईश्वर यहां हो या नहीं, लेकिन आपका जीवन बस यह दीया जलाकर ही खूबसूरत हो गया।

 

 

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हालांकि जीवन का यह आयाम नारी सुलभ माना जाता है, क्योंकि ज्यादातर महिलाएं ऐसे ही जीवन जीती हैं। उनके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण चीज होती है कि उनके बच्चे अच्छी तरह से खाएं, वे अच्छी तरह से काम करें। इसकी खूबसूरती की कल्पना कीजिए, जहां व्यक्ति खुद अपने जीवन से परे जाकर दूसरों के लिए सब कुछ कर रहा है, उसे अपनी जिंदगी के बारे में कभी कोई चिंता नहीं होती। चूंकि औरत की इस खूबी का शोषण हुआ, इसलिए यह खूबी भद्दी हो गई। अगर इसका शोषण न हुआ होता तो यह बिल्कुल शानदार चीज थी।

हम लोग जब बड़े हो रहे थे, तो परिवार में हम चार लोग थे। मेरी मां उन दिनों के हिसाब से ठीक-ठाक पढ़ी-लिखी थीं। उनका पूरा जीवन ही घर को समर्पित था, सुबह से लेकर रात तक वह घर का सारा काम पूरे व्यवस्थित तरीके से करती थीं। वह बेहद व्यवस्थित महिला थीं। अगर वह घर के सामान की लिस्ट बनाने बैठ जाएं, तो फिर उसमें कुछ भी छूटता नहीं था। उसी हिसाब से सामान आता था। इसके बाद पूरे महीने कोई भी चीज कम नहीं पड़ती थी।

 

 

मैं आपको यह सब बस इसलिए बता रहा हूं कि उनके अंदर जुड़ाव का स्तर कमाल का था। वह रोज सुबह छह बजे उठती थीं। हम सब सुबह साढ़े सात या आठ बजे तक घर से निकल जाते थे। तब तक घर में सुबह के नाश्ते का हल्ला होता था। नाश्ता करके जब हम सब घर से निकल जाते थे तभी वह नहाने जाती थीं। नहाने के बाद उनकी पूजा होती थी और फिर वह अपने बाकी काम करती थीं। मेरे पिताजी ठीक साढ़े बारह बजे घर लौटते थे। जब वह घर लौटते थे तो मेरी मां पूरी तरह से तैयार मिलतीं। अच्छी तरह से तैयार होकर - बालों में फूल लगाकर। यहां तक कि जीवन के आखिरी दौर में जब वह बीमार थीं, चलने-फिरने में तकलीफ थी, तब भी वह बाहर निकलकर बगीचे तक जातीं और पेड़ से छोटा सा बेले का फूल चुनकर अपने बालों में लगातीं।

जब तक मेरी मां सक्रिय थीं, तब तक हम कभी ऐसे तकिए पर नहीं सोए जिसके खोल पर कोई न कोई कढ़ाई की गई हो। हर तकिए के खोल पर एक छोटा सा तोता या फिर छोटा सा फूल ही काढ़ देतीं। मैं कल्पना ही नहीं कर सकता कि अगर हमारे जीवन में हम सबका ख्याल रखने के लिए एक ऐसा समर्पित व्यक्ति नहीं होता, तो मेरा जीवन कैसा होता। मुझे लगता है कि उनके समर्पण ने हमारे जीवन को हर तरीके से बदल दिया। आप उनके समर्पण को अनदेखा कर बड़े नहीं हो सकते। उन्होंने कभी घर से बाहर निकलकर एक पैसा नहीं कमाया। उन्होंने वे सारी चीजें कभी नहीं कीं, जो पुरुषों से करने की उम्मीद की जाती हैं या जिसे महिलाएं करने की कोशिश कर रही हैं। लेकिन अपने अधिकार क्षेत्र में वह सर्वेसर्वा थीं। क्या कोई कह सकता है कि वह किसी से कमतर थीं? असंभव। बस घर व परिवार के प्रति उनके समर्पण ने उन्हें परिवार में बाकियों से ऊपर रखा। घर में जो कुछ भी होता, जाहिर सी बात है कि लोग उनके पास जाते और उनकी सलाह लेते, क्योंकि हर एक के लिए उनका प्यार व समर्पण ऐसा था कि लोग उनकी बात सुनते थे। और यही चीज जीवन को बड़ा बनाती है।