आज के आधुनिक युग में वानप्रस्थ जीवन कितना प्रासंगिक है?

यहाँ सद्‌गुरु वानप्रस्थ पर पूछे गए एक प्रश्न का उत्तर दे रहे हैं। भारतीय परंपरा के अनुसार, वानप्रस्थ जीवन का अंतिम चरण है, जिसमें लोग सांसारिक मामलों से खुद को अलग कर वन में जाकर रहते हैं। वन में रहना आपको अच्छी तरह मरने के लिये किस तरह तैयार करता है? और क्या यह पारंपरिक व्यवस्था आज के आधुनिक युग में भी उपयुक्त है? जानने के लिये पढ़ें
आज के आधुनिक युग में वानप्रस्थ जीवन कितना प्रासंगिक है?
 

प्रश्नकर्ता : भारत में एक परंपरा रही है वानप्रस्थ की, जिसमें एक विशेष उम्र केहो जाने पर व्यक्ति को वन चले जाना चाहिये और वहां रहना चाहिये। ऐसा मानते हैं कि यह उनको अच्छी तरह मरने के लिये तैयार करता है। इसके पीछे का मूल कारण क्या है? और आज के समय में यह निर्णय कैसे लिया जाये?

सद्‌गुरु : आधुनिक समय में यदि आप जंगल जाते हैं, यह सोच कर कि आप वानप्रस्थ में हैं तो कोई ऐसा खतरा नहीं है कि आपको कोई बाघ खा लेगा या ऐसा कुछ होगा, क्योंकि अब वे बहुत कम रह गए हैं। लेकिन इस बात की पूरी संभावना है कि आपको गिरफ्तार कर लिया जाये। वानप्रस्थ का अर्थ आवश्यक रूप से यह नहीं है कि आप वन की ओर प्रस्थान करें। हाँ, वन का अर्थ जंगल है लेकिन वन का अर्थ बगीचा भी हो सकता है। मूल रूप से बात यह थी कि आप वहां से दूर हो जाएँ जहाँ चार दीवारें हैं। आप चार दीवारों के बीच नहीं रहना चाहते क्योंकि चार दीवारें आपको यह झूठा अहसास दिलाती हैं कि आप अमर हैं, कभी मरेंगे नहीं। अगर आप एक बंद कमरे में हैं तो आपको ताबूत में होने जैसा लगता है। अगर आप ताबूत में जीते हैं तो आपको लगेगा, आप यहाँ हमेशा के लिये हैं।

शरीर को नश्वरता की समझ होनी चाहिए

आप को यह करना चाहिये। पूर्णिमा की रात को महिलाओं को बाहर खुले में सोना चाहिये और अमावस्या की रात पुरुषों को बाहर सोना चाहिये। कुछ भी हो, सर्दी, बरसात, या और कुछ। यदि आप बाहर सोते हैं तो आपको असुरक्षित लगेगा। यह पता चलेगा, आपका शरीर खुद यह समझ जाएगा कि यह हमेशा के लिये नहीं है। यह वानप्रस्थ का मूल विचार है। आप घर बनाते हैं, अपने को अमर बनाने के लिये नहीं, लेकिन इसलिये कि मनुष्य का बच्चा इस तरह नहीं बना कि वह पूरी तरह खुले में, बाहर रह सके। मनुष्य के शरीर एवं मन को एक विशेष स्तर तक आने के लिये समय लगता है। जब एक हाथी का बच्चा जन्म लेता है तो उसकी मां उसके पास तीन दिनों तक खड़ी रहती है, फिर दोनों जंगल में चले जाते हैं।

आप घर बनाते हैं, अपने को अमर बनाने के लिये नहीं, लेकिन इसलिये कि मनुष्य का बच्चा इस तरह नहीं बना कि वह पूरी तरह खुले में, बाहर रह सके।

मनुष्य के बच्चे को कुछ वर्षों तक पोषण एवं सुरक्षा की ज़रुरत होती है। उस समय बच्चों के साथ आप भी चार दीवारों में सुरक्षा एवं आराम पा लेते हैं। लेकिन लोगों को यह समझ थी कि अगर आपको लगता है कि आप अमर हैं तो आप एक झूठ के साथ जी रहे हैं। यह स्पष्ट करने के लिये, न केवल बुद्धि से बल्कि हर तरह से, आप को चार दीवारों से बाहर आना पड़ता है। यही कारण है कि बहुत से साधु, संन्यासी कभी किसी भवन के अन्दर नहीं सोते। वे या तो पेड़ के नीचे सोते हैं या यदि मौसम बहुत खराब हो तो किसी गुफा में या यदि उन्हें भवन बनाना ही पड़े तो वे सिर्फ छत बनाते हैं, चारों तरफ खुला ही छोड़ देते हैं। यदि दीवारें बनानी ही पड़ें तो मिट्टी की बनाते हैं, कभी भी ज्यादा सुरक्षित स्थान नहीं बनाते।

पृथ्वी तत्व शरीर को याद दिलाता है, कि वो मरणशील है

पृथ्वी तथा अन्य तत्वों के साथ, उनके नज़दीक रहने से शरीर को लगातार यह पता लगता रहता है कि वह मरने वाला है। यह आपके दिमाग में न हो लेकिन पृथ्वी लगातार शरीर को बताती है कि वह कुछ नहीं, बस दो क्षण का बुलबुला भर है। आपको वापस मिट्टी में जाना है। मिट्टी ही आपका पोषण करती है और वही आपका अंतिम आराम स्थल है। अगर आप एलोन मस्क(टेस्ला ट्रक कम्पनी के सीईओ) के साथ जाते हैं और किसी दूसरे ग्रह में आपको दफनाया जाता है तो अलग बात है वर्ना यहीं से हम आते हैं और यहीं वापस जाते हैं।

एक बंद चारदीवारी के अन्दर ऐसी कोई बात पता नहीं चलती। लोग सोचते हैं कि वे अमर हैं। कोई नब्बे की उम्र में भी मरे तो वे कहते हैं, “वे इतने स्वस्थ थे और अचानक मर गये”। वे नब्बे सालों से मर रहे थे! लोगों की मौत के बारे में सोच यह है कि मनुष्य को अस्पताल में ले जायें और वह कुछ महीनों तक अत्याचार सहे और फिर जब बिल बहुत हो जाये तो कहें, “अब उसे मरने दो”।  

यदि आप इस बारे में सजग होना चाहते हैं कि यह शरीर मरने वाला है तो पहला कदम यह है कि आप सुरक्षित वातावरण से बाहर निकलें, जिससे शरीर को यह लगे और वो समझे कि उसे किसी न किसी पल चले जाना है। वास्तव में वानप्रस्थ में जाकर कई लोग ज्यादा स्वस्थ हो गये। मैंने यह देखा है, यहाँ, ईशा योग सेंटर में और वहां ईशा इंस्टिट्यूट ऑफ़ इनर साइंसेज(अमेरिका) में भी। लोग आश्रम में आये क्योंकि वे पहले ही 65 की उम्र पार कर चुके थे, लेकिन पिछले 8-10 साल में वे पहले से भी ज्यादा चुस्त, जवान और स्वस्थ हो गये हैं क्योंकि यहां ज़्यादा चलने फिरने के कारण वे तत्वों के ज्यादा निकट आ गयें हैं।

पर्वत पर चढ़ाई करने वाले ये समझते हैं

लोग वानप्रस्थ में मरने के लिये नहीं जाते बल्कि इसलिये जाते हैं क्यूंकि वे इस बारे में जागरूक हैं कि उन्हें भी मरना है। ऐसा नहीं है कि आप एक ख़ास उम्र के हो गए हैं तो आपको आज या कल में मरना है। बल्कि आपको सजग होना होगा कि आप मरने वाले हैं। जब आप अपने शरीर की नश्वरता के बारे में पूरी तरह से जागरूक होंगे तब आप हर चीज़—धन, संपत्ति, रिश्ते आदि से एक दूरी पर रहेंगे। आपको यह समझ आयेगा की यह सब एक जाल की तरह है जो आपने अपने जीने के लिये बुना था। आपने इस जाल में कुछ लोगों को फंसा लिया, लेकिन आपको स्वयं इसमें नहीं फंसना है। आपको इनके साथ कुछ दूरी रखनी है, यह जानते हुए कि समय आने पर इस जाल को जाना है।

यदि शरीर को यह मालूम हो कि वो मरने वाला है तो वह धीरे-धीरे अपने को अच्छी तरह तैयार कर लेता है। वो बेवकूफी में अपनी ऊर्जा बर्बाद नहीं करेगा, जरूर थोड़ा ज्यादा जियेगा।

वानप्रस्थ का मूल रूप से अर्थ यह था कि आप वन या जंगल से जुड़ें ताकि आप अमर होने के झूठ से बचें, आपको नश्वरता का अहसास हो। मान लीजिये एक तूफ़ान आ गया, अब जोर से पानी बरस रहा है, आप अपने कमरे में बैठे हैं, संगीत चल रहा है और आप हेडफोन लगाये हैं, कुछ और सुन नहीं रहे, अनुभव नहीं कर रहे। लेकिन अगर आप बाहर जंगल में हैं, सिर्फ एक तूफ़ान में आपको पता चल जायेगा कि मनुष्य का शरीर कितना नाज़ुक है। सिर्फ एक रात अगर आप वहां रहते हैं, बिजली चमक रही है, बादल गरज रहे हैं, बरसात हो रही है, तेज़ हवाएं चल रही हैं - और अचानक आपमें एक ज्ञान जागता है। मैंने यह अनुभवी पर्वतारोहियों के साथ देखा है, प्राकृतिक तत्वों के नज़दीक रहना और रोज़ अपने आपको खतरे में डालना, उनमें एक ख़ास स्थिरता और शांति ले आता है। पर्वतारोहियों को पता होता है कि वे मरणशील हैं, बस एक गलती और  मर सकते हैं।

वानप्रस्थ बस यही है—इस शरीर में नश्वरता का अहसास जागना। यदि शरीर को यह मालूम हो कि वो मरने वाला है तो वह धीरे-धीरे अपने को अच्छी तरह तैयार कर लेता है। वो बेवकूफी में अपनी ऊर्जा बर्बाद नहीं करेगा, जरूर थोड़ा ज्यादा जियेगा। वानप्रस्थ केवल मरने के बारे में नहीं है। यह एक व्यक्ति को अपनी नश्वरता के प्रति पूरी तरह जागरूक बनाना है। इसके बिना मनुष्य, मनुष्य नहीं है—वह बेवकूफ की तरह ज़िन्दगी जियेगा। आप जानते हैं, गौतम बुद्ध सारी दुनिया को मूर्ख कहते थे। वे गलत नहीं थे,यद्यपि वे यह बात और थोड़ी नम्रता से कह सकते थे। लेकिन वे ईसा पूर्व काल में हुए थे, कुछ भी कह सकते थे। मैं इक्कीसवीं शताब्दी में हूँ, मुझे कुछ अच्छी बातें कहनी होंगी।

इसके पीछे की समझ एवं बुद्धिमत्ता यही है कि स्पष्ट रूप से आपके शरीर की हर कोशिका को यह मालूम होना चाहिये कि यह शरीर मरने वाला है। आप जब एक बार यह जान जायेंगे तो जबरदस्त रूप से उर्जावान हो जायेंगे। अगर आप जागरूकता के साथ चलते फिरते हैं तो कुछ भी व्यर्थ किये बिना आप एक तरह से योग कर रहे हैं। योग का भौतिक स्वरुप यह है कि आप शरीर को सिखायें कि कैसे सुन्दर ढंग से जिया जाये, किसी भी भ्रम के बिना। मनुष्य को यह तभी हो सकता है जब वह पूरी तरह से जागरूक हो, होश में हो। उदाहरण के लिये कोबरा सहज प्रवृत्ति (इंस्टिंक्ट) से काम करने वाला प्राणी है। अगर आप बिलकुल आराम में हैं तो वह आपको काट ही नहीं सकता। अगर उसे लगे कि आपकी केमिस्ट्री उत्तेजित हो रही हैं, या अगर उन्हें आपके भीतर डर महसूस हुआ तो वे आपके पीछे लग जायेंगे। यदि आपको यह अहसास है कि आप नश्वर हैं तो आपको पूरी तरह से जागरूक हो जाएंगे। मृत्यु सांप के रूप में भी आ सकती है।

इसीलिए ईशा योग केंद्र को जंगल के पास बनाया गया है

यही कारण है कि हमने अपना स्थान जंगल के पास बनाया है—आपको तत्वों को महसूस करना चाहिये। अगर एक भी तत्व आपको नहीं छू रहा तो आपको मालूम भी नहीं होगा कि आप एक जीवन हैं। ज्यादातर समय आप सिर्फ विचारों, भावनाओं, सोच, पूर्वाग्रह या फालतू की बातों का पुलिंदा भर होते हैं। अगर आप बाहर सोते हैं और उस रात को भयंकर तूफ़ान आता है तो आपके सभी विचार, भावनाएं, सोच आदि गायब हो जायेंगे और आप समझ जायेंगे कि आप इन तत्वों का एक भाग हैं। दुर्भाग्य से, अधिकतर लोग, सही मायनों में, बाहर रहे ही नहीं हैं।

लेकिन जब आपको महसूस होता है कि यह सब बहुत हो गया तब आपको वानप्रस्थ में चले जाना चाहिये। अब वन में जाना संभव नहीं है इसलिए लोग आश्रमों में आते हैं।

सिर्फ वे - जो चलते-फिरते रहते हैं, जीवन का अनुभव करते हैं - जानते हैं कि वे मरने वाले हैं। आपने घर बनाये, सुरक्षा बनायी, आपने जीवन के एक निश्चित भाग के लिए, कुछ ख़ास चीज़ें संभालने के लिए व्यवस्था की क्योंकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी भी है। लेकिन जब आपको महसूस होता है कि यह सब बहुत हो गया तब आपको वानप्रस्थ में चले जाना चाहिये। अब वन में जाना संभव नहीं है इसलिए लोग आश्रमों में आते हैं। कुछ लोग जल्दी आ गए हैं, पर ज्यादा जल्दी जैसा कुछ नहीं होता।

पुराने ज़माने में भी जब लोग वानप्रस्थ में जाते थे तो वे अनिवार्य रूप से, पूर्ण रूप से खुले में नहीं रहते थे, वे गहरे जंगल में किसी आश्रम में जाते थे, जहाँ सब कुछ—कपड़े, भोजन आदि एकदम सादा व कम होता था। आप तत्वों व प्रकृति के समीप आ जाते थे। जब आप जंगल में होते हैं तब आप अपनी नश्वरता को नहीं भूल सकते। मरणशीलता कोई विचार नहीं है, वास्तविकता है जो इस शरीर को हर पल बुला रही है। अगर आपका शरीर इस बुलावे को नहीं सुनता तो आपका मन बेवकूफ बन जायेगा। वानप्रस्थ इस मूर्खता से बाहर आने का मार्ग है, उस झूठ के जाल से बाहर आने का, जिसे हर व्यक्ति ने बुन रखा है।

आने वाले वर्षों में हम वानप्रस्थ के लिये अधिक व्यवस्था करेंगे क्योंकि जो लोग युवावस्था में आये थे वे भी अब बूढ़े हो रहे हैं

 
 
 
 
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