क्या करें जब दिल और दिमाग अलग-अलग बातें करें?

क्या करें जब दिल और दिमाग अलग-अलग बातें करें?

सद्‌गुरुअक्सर लोगों के जीवन में ऐसे पल आते हैं, जब दिल कुछ कहता है और दिमाग कुछ और। फिर किसकी सुननी चाहिए? कैसे निबटें इस संकट से?

क्या दिल और दिमाग अलग-अलग हैं

लोग अक्सर यह कहते सुने जाते हैं कि उनका दिल उन्हें एक ओर ले जाता है और दिमाग दूसरी ओर जाने को कहता है। योग में, हम यह मूलभूत आधार स्थापित करते हैं कि आप एक संपूर्ण और अखंड व्यक्तित्व हैं।

मन का गहरा आयाम हृदय कहलाता है। लेकिन योग में गहरे भावात्मक मन को मनस कहा गया है। मनस, स्मृति का एक जटिल मिश्रण है, जो भावों को एक ख़ास रूप देता है।
दिल और दिमाग अलग नहीं हैं – आप पूरे एक हैं।
पहले तो हमें यह समझना होगा कि दिल और दिमाग कहते किसे हैं। आप अक्सर अपनी सोच का संबंध दिमाग से और भावों का संबंध दिल से जोड़ते हैं। अगर आप पूरी सजगता और गंभीरता से इस पर गौर करें तो पाएँगे कि आप जैसा सोचते हैं, वैसा ही महसूस करते हैं। पर यह भी सच है कि आप जैसा महसूस करते हैं, वैसा ही सोचते हैं। यही कारण है कि योग ने भाव व विचार को एक साथ मनोमयकोश यानी मानसिक शरीर का अंग माना है।
आप जिसे मन कहते हैं, वह सोचने की प्रक्रिया या बुद्धि है। दरअसल इसके कई आयाम हैं, जिनमें से एक तार्किक आयाम है। दूसरा गहरा भावनात्मक पक्ष है। इस तार्किक आयाम को बुद्धि कहते हैं। मन का गहरा आयाम हृदय कहलाता है। लेकिन योग में गहरे भावात्मक मन को मनस कहा गया है। मनस, स्मृति का एक जटिल मिश्रण है, जो भावों को एक ख़ास रूप देता है। तो आप जैसा सोचते या महसूस करते हैं, वे दोनों ही मन की गतिविधियाँ हैं।

भाव धीरे-धीरे बदलते हैं

मिसाल के लिए, अगर मुझे लगता है कि आप बहुत अच्छे हैं, तो मेरे मन में आपके लिए मधुर भाव पैदा होंगे। अगर मुझे लगता है कि आप दुष्ट हैं, तो मेरे मन में आपके लिए बुरे विचार पैदा होंगे।

भाव बस विचार का रसीला अंश है। आप इसकी मधुरता का आनंद ले सकते हैं। लेकिन अक्सर विचार ही भावों को गढ़तेे हैं, भले ही आप इसे पहचानें या न पहचानें।
अगर आप किसी को अपना दुश्मन बना लें और उसे अपना प्यार करना चाहें, तो ऐसा करना आपके लिए कठिन होगा। हमें जीवन के सरल आयामों को कठिन नहीं बनाना चाहिए।
आप जो महसूस करते हैं, वही सोचते हैं, परंतु सोच और भावना आपके अनुभव में अलग दिखते हैं। ऐसा क्यों? क्योंकि विचार की अपनी स्पष्टता और गति है। भाव थोड़ा धीमा होता है। उदाहरण के लिए अगर आपको कोई इंसान अच्छा लगता है तो आपके मन में उसके लिए कोमल भाव होंगे। अचानक, वह आपके साथ कुछ ऐसा कर देता है जो आपको पसंद नहीं आता और वह आपको बुरा लगने लगता है। आपकी सोच उसे बुरा कहती है पर आपके भाव इतनी जल्दी नहीं बदलते। ये संघर्ष करते हैं। अगर ये मीठे होंगे तो ये एकदम से कड़वे नहीं हो सकते। हो सकता है कि तीन दिन, तीन महीने या तीन साल लगें, पर ये धीरे से बदलेंगे।
आपको दिल और दिमाग के बीच जंग छेड़ने की जरूरत नहीं है। भाव बस विचार का रसीला अंश है। आप इसकी मधुरता का आनंद ले सकते हैं। लेकिन अक्सर विचार ही भावों को गढ़तेे हैं, भले ही आप इसे पहचानें या न पहचानें। भाव पूरी तरह से स्थिर नहीं होते। भाव भी भटकते हैं, यहाँ-वहाँ की बातें करते हैं, लेकिन ये विचार से अधिक गति नहीं रखते। इन्हें बदलने में समय लगता है और इनकी गहनता विचार से अधिक होती है, इसलिए अक्सर ऐसा लगता है मानो विचार और भाव अलग हैं। परंतु वे गन्ने और उसके रस की तरह एक ही हैं।

गहन विचार बहुत कम लोग पैदा कर सकते हैं

अधिकतर लोगों के अनुभव में विचार भावों की तरह गहन नहीं होते। मिसाल के लिए, आप जितनी गहनता से गुस्सा होते हैं, उतनी गहनता से सोचते नहीं हैं।

बेहतर होगा कि आप अपने भीतर दो पोल पैदा न करें। इस तरह गृहयुद्ध छिड़ेगा और आप स्कितज़ोफ्रीनिया से ग्रस्त हो जाएँगे। विचार और भाव अलग नहीं हैं।
पर अगर आप एक गहन विचार पैदा कर लें तो यह भी आपको अभिभूत कर सकता हैै। केवल पाँच से दस प्रतिशत लोग ही ऐसे हैं जो इतने गहन विचार पैदा कर सकते हैं कि भावों की जरुरत ही नहीं बचती। नब्बे प्रतिशत जनता केवल भाव पैदा कर सकती है क्योंकि उन्होंने दूसरी दिशा में कभी पर्याप्त काम नहीं किया। पर कई लोग ऐसे होते हैं जिनकी सोच बहुत गहरी होती है। उनके पास बहुत अधिक भाव नहीं होते, परंतु वे बहुत गहरी सोच रखते हैं।
बेहतर होगा कि आप अपने भीतर दो पोल पैदा न करें। इस तरह गृहयुद्ध छिड़ेगा और आप स्कितज़ोफ्रीनिया से ग्रस्त हो जाएँगे। विचार और भाव अलग नहीं हैं। इनमें से एक शुष्क है और दूसरे में रस भरा है। दोनों का ही पूरा आनंद लें।


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