शून्य या अनंत : बाकी सब माया है

शून्य या अनंत : बाकि सब माया है
शून्य या अनंत : बाकि सब माया है

सद्‌गुरुभगवान या सृष्टि के परम-तत्व की उपमा शून्य और अनंत दोनों से ही दी जाती है। क्या इन दोनों में कोई अंतर है? सदगुरु हमें बता रहे हैं कि ये मूल तत्व तक जाने वाले दो रास्ते हैं। आइये जानते हैं इन दोनों के बारे में और साथ ही बाकी की सारी सृष्टि की प्रकृति के बारे में:

प्रश्‍न:

सदगुरु, द्वैतवाद क्या है ?

सदगुरु:

आप अभी यह सवाल पूछ रहे हैं यही है द्वैतवाद, क्योंकि यहां दो लोग हैं आप और मैं। आप सवाल पूछ सकते हैं, क्योंकि आप खुद को एक इकाई के रूप में देख रहे हैं और दूसरे को दूसरी इकाई के रूप में। इसलिए इसमें द्वैतवाद है। इसी वजह से सवाल और जवाब संभव हैं। अब आपको अपने सवाल के जवाब को झेलना होगा। मुझे आपके सवाल से कोई दिक्कत नहीं हो रही, क्योंकि मैं आपको आपके रूप में नहीं देखता। दरअसल मैं बहुत बड़ा स्वार्थी हूं। मैं हर चीज को स्वयं के रूप में देखता हूं। इसीलिए आप चाहे जैसा सवाल पूछ लें, मुझे उससे कोई दिक्कत नहीं होती।

 

चूंकि आप चीजों को ‘तुम’ और ‘मैं’ के रूप में देखते हैं, इसलिए अगर मैंने आपकी पसंद के हिसाब से जवाब नहीं दिया तो आपको उस जवाब से दिक्कत होगी। हर रिश्ते में ऐसा ही होता है। अगर कोई दूसरा शख्स उस हिसाब से नहीं चलता, जैसा आप उससे अपेक्षा करते हैं तो आपको परेशानी होती है। फ्रांस के दार्शनिक ज्यां पॉल सार्ते कहते हैं – दूसरा कोई होने का मतलब नरक है। जैसे ही आपके जीवन में कोई दूसरा या अन्य आता है, आपका जीवन नर्क बन जाता है।

शून्य आपने नहीं बनाया, इसकी खोज की गई है। अनंत की रचना भी आपने नहीं की, इसे भी खोजा गया है। एक, दो, तीन, चार, पांच आदि की रचना इंसान ने की है। यह सब झूठ है।
तो अगर आप योग में नहीं हैं, जब तक ऐसा नहीं होता कि हर चीज आपके भीतर एक हो जाए, तब तक कष्ट तो रहेंगे ही, कभी कम तो कभी ज्यादा। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि आप जीवन को किस तरीके से संभालते हैं, लेकिन कष्ट तो होंगे ही, क्योंकि दूसरा होने का  मतलब ही नर्क है। यही वजह है कि लोग अपने लिए दुनिया से अलग एक सुरक्षा कवच बना रहे हैं।

 

अगर परिवार दुनिया में इतना महत्वपूर्ण संस्थान है तो उसकी वजह यही है कि यह एक सुरक्षित कवच की तरह है। अगर आपको इस तरह से रहना पड़े तो हर दिन आपका हर तरह की चीज से सामना होगा। आप जितना ज्यादा असुरक्षित महसूस करेंगे, उतनी ही ज्यादा मूल्यवान आपकी पारिवारिक स्थितियां होंगी। अगर आपका परिवार आपको परेशान करता है तो आप अपने मित्रों की शरण में जा सकते हैं या फिर किसी और की।

 

दरअसल आप लगातार इस तरह के कवच बनाने की कोशिश में लगे हैं। इसकी वजह सिर्फ यह है कि कोई दूसरा नर्क है। इस तरह आप लोगों की एक छोटी इकाई तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं। आप इसे परिवार कह सकते हैं, आप इसे आश्रम कह सकते हैं या फिर जो चाहे कह सकते हैं। मूल बात है कि दुनिया में समाज की सबसे मूल इकाई को परिवार कहा जाता है। इसके बाद बारी आती है समाज की, फिर शहर की, फिर देश की। ये सभी बड़ी इकाइयां हैं, लेकिन मूल इकाई परिवार ही है। हमने परिवार की स्थापना की है और इसमें तमाम मूल्य प्रतिस्थापित किए हैं। सवाल है कि हमने ऐसा क्यों किया? यह सब हमने किसी न किसी तरह से खुद के दूसरे से बचाव के लिए किया। हालांकि परिवार के अंदर भी अगर गहराई से देखें, तो वे सभी अलग हैं। जब कभी बाहर से कोई समस्या आती है तो वे सब एक हो जाते हैं। जब हम परिवार के भीतर होते हैं तो हम सब जुदा हैं। मान लीजिए, आपका कोई पड़ोसी आपको परेशान कर रहा है। ऐसे में देखिए कि आपका परिवार किस तरह एक हो जाता है। गौर कीजिए, जब पाकिस्तान हमें परेशान करता है, तो कैसे पूरा भारत एक हो जाता है, नहीं तो आपको पता ही है कि हम किस तरह एक दूसरे से झगड़ रहे हैं।

 

ज्यादातर लोगों के मामले में कोई समस्या ही उन्हें एकता के सूत्र में बांधे रखती हैं। वे समस्याओं को महत्व देते हैं और चूंकि वे समस्याओं को महत्व देते हैं इसलिए उनकी समस्याओं का कोई अंत नहीं होता। जब आप किसी चीज का मान रखते हैं तो आप खुद ही उस चीज को पैदा करना शुरू कर देते हैं। ज्यादातर लोगों के लिए समस्याएं बड़ी मूल्यवान हैं। जब समस्याएं आती हैं, तभी अचानक परिवार का मुखिया कहता है – मैंने तुम सबसे कहा था न कि इन तमाम लोगों से निबटने के लिए हम सभी को एक रहना होगा। तो इस तरह दुनिया समस्याओं से भरी पड़ी है क्योंकि लोग समस्याओं को महत्व देते हैं। आप हिमालय जाइए। वहां साधु बैठे हैं। उन्हें कोई समस्या नहीं है क्योंकि वे समस्याओं को महत्व ही नहीं देते। वे बस समाधान ढूंढने की कोशिश में लगे हैं।

 

आपकी समस्याओं की वजह यह है कि आपने अपनी पहचान अपने सीमित स्थूल शरीर के साथ बनाई हुई है। यह जानने के लिए बहुत बड़ा ज्ञानी होने की जरूरत नहीं है कि यह शरीर आपने इसी धरती से लिया है और यह लगातार चक्रण में है। थोड़ी सी जानकारी रखने वाला शख्स भी इस बात को जानता है। यह शरीर स्थिर नहीं है। हर दिन आपका शरीर कुछ न कुछ छोड़ रहा है और कुछ ले रहा है। तीन दिन तक कुछ मत लीजिए। आप देखेंगे कि आपके बिना कुछ किए ही हर दिन आपके शरीर से कुछ बाहर जा रहा है। इसे आप कहीं से भी निकलता नहीं देख पाएंगे, लेकिन हर दिन कमजोर होते जाएंगे। तो बात यही है कि कुछ ऐसा है जो लगातार इस शरीर से बाहर जा रहा है और कुछ वापस भी आ रहा है। इस तरह आप पुनर्चक्रण यानी ‘रीसाइक्लिंग’ की अवस्था में हैं। जीवन हमेशा पुनर्चक्रण की अवस्था में रहता है। हमें बस इसका अनुसरण करने की जरूरत है, लेकिन हम कई मामलों में जीवन के खिलाफ जा रहे हैं।

आप जान गए हैं कि यह शरीर बस एक चक्र की तरह है। जिस किसी चीज को भी आप अपना समझते हैं, वह हर वक्त बस अंदर आ रही है और बाहर जा रही है। आप इसे थामकर नहीं रख सकते। मौत के वक्त अंतिम पलों में ही नहीं, बाकी किसी भी दिन आप इस शरीर को थामकर नहीं रख सकते। यह हर पल आपसे दूर जा रहा है। यह खिसक रहा है और आप इसे वापस खींचने की कोशिश में लगे हैं। गौर से देखिए, क्या लगातार ऐसा नहीं हो रहा है? अगर आप यह सब जानते होते, बौद्धिक रूप से नहीं, बस आप इस बारे में सजग होते तो अपने आप ही आप इस शरीर से अपनी पहचान स्थापित नहीं करते। एक बार अगर ऐसा हो जाए कि आप अपने शरीर के साथ अपनी पहचान को छोड़ दें तो अगली चीज बचती है आपकी विचार प्रक्रिया। यह देखना बड़ा आसान है कि यह भी हमेशा चक्रण की अवस्था में है। हर कुछ सालों के बाद क्या आपके मन में नया विचार नहीं आता ? या आप एक ही विचार में फंसे रहते हैं? तो यह भी एक चक्रण ही हुआ।

अगर आप इन चक्रों के साथ पहचान स्थापित कर सकते हैं, तो इस धरती के साथ क्यों नहीं? आप पूरे जगत के साथ पहचान क्यों नहीं बना सकते क्योंकि यहां तो हर चीज चक्रण में ही है। ऊर्जा के हिसाब से देखें तो यही चक्रण हर वक्त आपके तंत्र या सिस्टम में भी हो रहा है। यह शरीर का कोई निष्क्रिय या गतिहीन टुकड़ा नहीं है। यह हमेशा चालू रहने वाली प्रक्रिया है।

चूंकि आप चीजों को ‘तुम’ और ‘मैं’ के रूप में देखते हैं, इसलिए अगर मैंने आपकी पसंद के हिसाब से जवाब नहीं दिया तो आपको उस जवाब से दिक्कत होगी। हर रिश्ते में ऐसा ही होता है। अगर कोई दूसरा शख्स उस हिसाब से नहीं चलता, जैसा आप उससे अपेक्षा करते हैं तो आपको परेशानी होती है।
अगर आपको यह अनुभव होने लगे कि ये सब बस एक चक्र है, जिस ऊर्जा को आप ‘मैं’ समझते हैं, जिस शरीर को आप ‘मैं’ समझते हैं, जिस मन को आप ‘मैं’ समझते हैं, वह सब चक्रण की प्रक्रिया में है। ऐसे में आप किस चीज के साथ अपनी पहचान स्थापित करेंगे? या तो आप बिना किसी पहचान के यहां बैठ जाइए या फिर हर चीज के साथ अपनी पहचान स्थापित कीजिए। बस यही दो विकल्प हैं आपके पास। या तो आप शून्य हो जाइए या फिर अनंत। इन दोनों के बीच सब मिथ्या है। आप 108 हैं, तो आप और भी बड़े झूठ हैं। आप और ज्यादा महान होने की कोशिश कर रहे हैं। शून्य और अनंत के बीच बहुत बड़ा असत्य है। यही द्वैतवाद की माया है। शून्य में कोई द्वैतवाद नहीं है। अनंत में भी कोई द्वैतवाद नहीं है। शून्य आपने नहीं बनाया, इसकी खोज की गई है। अनंत की रचना भी आपने नहीं की, इसे भी खोजा गया है। एक, दो, तीन, चार, पांच आदि की रचना इंसान ने की है। यह सब झूठ है। तो आपका द्वैतवाद एक बड़ा झूठ है। अगर आप झूठ से संबद्ध हो गए तो आप वास्तविक चीज को कैसे जानेंगे ? फिर आप इसे बस एक बोतल (कोल्ड ड्रिंक की बोतल की ओर इशारा) में पाएंगे। यह भी झूठ ही है।

अब सवाल यह है कि इससे बाहर कैसे निकलें? इस बोतल से बाहर कैसे आएं? अगर आप इस बोतल से बाहर आना चाहते हैं, तो आपको इस बोतल की प्रकृति को समझना होगा। इसमें बहुत से छिद्र हैं। आप जैसे चाहें, इससे बाहर आ सकते हैं। इस बोतल (कोल्ड ड्रिंक की बोतल की ओर इशारा) से बाहर आने का बस एक ही रास्ता है। लेकिन यह बोतल (शरीर की ओर इशारा) छिद्रों से भरपूर है। आप कहीं से भी बाहर आ सकते है। अगर आप इस बात का अनुभव करना चाहते हैं तो अगले नौ दिनों तक कुछ मत खाइए। आपने नवरात्रि निकाल दी। आप नवरात्रि में नौ दिनों तक कुछ नहीं खाते। आप देखेंगे कि आपके शरीर में जो भी है, वह हर जगह से बाहर आ रहा है। धीरे धीरे आप कमजोर होते जाएंगे। तो हमें बोतल को तोड़ने की जरूरत नहीं है। हमें बोतल को नष्ट करने की  भी जरूरत नहीं है। अगर हम यह समझ पाएं कि बोतल भी एक माध्यम ही है, जिसमें हम फंस गए हैं। यह बात बौद्धिक रूप से समझना काफी नहीं है, अगर अनुभव के रूप से हम वहां तक पहुंच गए, तो एक, दो, तीन, चार के साथ खेलने में हमें कोई परेशानी नहीं होगी। अच्छी तरह से जान लेने के बाद यह बस एक खेल होगा। अगर आप यह जान जाएंगे कि ये वास्तविक चीज नहीं है, यह बस एक खेल है, जो आपने अपने लिए बनाया है, तो ठीक है। किसी भी तरह का खेल खेलिए। जब तक आप यह मानकर चल रहे हैं कि आप एक खेल खेल रहे हैं, तब तक कोई दिक्कत नहीं है। खतरा तब है, जब आप यह सोचने लगें कि यह वास्तविक चीज है। फिर आप फंस जाएंगे।


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