सिर्फ कब्र ही पूरी तरह सुरक्षित स्थान है

सिर्फ कब्र ही पूरी तरह सुरक्षित स्थान है

सद्‌गुरुक्या जीवन के निर्णय सिर्फ सुरक्षा को आधार में रखकर लेने चाहिए? सद्‌गुरु बता रहें हैं कि कैसे हम सुरक्षा पर जरूरत से ज्यादा ध्यान देते हुए अपने आस-पास कब्र या दीवारें बना लेते हैं और ऐसे में नई संभावनाओं से चूक जाते हैं

दूसरों की देखा देखी करने की आदत

आपने अपनी कामनाओं को इसी दुविधा के मारे तिलांजलि दे दी कि वे पूरी होंगी या नहीं। नए उद्यमों में उतरने का साहस न होने की वजह से आपने अनेक सुनहरे मौके खोए हैं।

आपने अपनी कामनाओं को इसी दुविधा के मारे तिलांजलि दे दी कि वे पूरी होंगी या नहीं। नए उद्यमों में उतरने का साहस न होने की वजह से आपने अनेक सुनहरे मौके खोए हैं।
संगीत, चित्रकला जैसी बेहतरीन ललित कलाओं को सिखाने वाले महाविद्यालय देश में ढूँढे भी नहीं मिल रहे हैं। लेकिन ऐसा लगता है जल्द ही ऐसी स्थिति आने वाली है कि गली-गली में इंजीनियरिंग कालेज खुल जाएँगे। प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में तैयार होने वाले सारे के सारे इंजीनियरों को नौकरी मिलती है या नहीं, इस बात की चिंता किये बिना माँ-बाप किसी न किसी तरह अपने बेटे या बेटी को इस विद्या में दीक्षित कराने के लिए तड़पते हैं। ऐसा क्यों हो रहा है? एक समय में इंजीनियरिंग की शिक्षा पूरी होते ही नौकरी मिल जाती थी, इसलिए इसी विद्या को दुनिया की सबसे सुरक्षित बाजी मानकर माता-पिता अपने बच्चों को पाँसों की तरह फेंकने लग गए। भले ही इन लोगों को मनुष्य-शरीर मिला हुआ है, मगर मन के स्तर पर इनका विकास भेड़ों के स्वभाव तक आकर रुक गया है।

अपने मन से करें चुनाव

हजारों लोग जिस काम को करेंगे, ये भी उसी काम को करेंगे। खुद सोचकर फैसले पर नहीं आएँगे। रात-दिन इसी की रट लगाते-लगाते माँ-बाप अपने बच्चों के मन को भी भोथरा बना देते हैं।

विषय कोई भी हो, उसे आपने अपनी इच्छा के अनुसार चुन लिया है तो वह स्वागत करने योग्य है।
मैं केवल इंजीनियरिंग विद्या की ओर संकेत नहीं कर रहा हूँ। विषय कोई भी हो, उसे आपने अपनी इच्छा के अनुसार चुन लिया है तो वह स्वागत करने योग्य है। अगर आपने केवल अपनी जीविका के लिए उसका चयन किया हो तो क्या आपने अपनी जिंदगी को बरबाद नहीं किया है? “क्या यह विषय मेरे लिए उपयोगी रहेगा? क्या इससे दुनिया का कोई लाभ होगा?” आदि प्रश्नों पर मन लगाकर चिंतन किये बिना क्या आप भी उसी पहाड़ की चोटी से कूदेंगे जहां से सभी कूदते हैं? क्या इसी के लिए आप इतनी सीढिय़ाँ चढ़ आए हैं?

यहाँ पर मुझे एक कहानी याद आ रही है। किसी ज्योतिषी ने भविष्यवाणी की कि राजा के लिए यह बुरा समय है, मारक योग है। फौरन राजा ने चारों तरफ चार-चार फुट की चौड़ाई में किले की दीवारें मजबूत कर दीं, ऐसी दीवारें जिन्हें भारी से भारी तोप भी बेध नहीं सकते। किले के चारों ओर खंदक को गहरा करके उसमें पानी भर दिया।

सिपाहियों ने किले के सभी पहरों को पार कराके उस भिखारी को राजा के सामने ला खड़ा किया। तब भी उसकी हँसी जारी थी। “किसलिए हँस रहा है, बता! वर्ना तेरा सिर धड़ से अलग किया जाएगा।” राजा ने धमकी दी।
एकाध खिड़कियों को छोडक़र बाकी सारी खिड़कियाँ और फाटक बंद करवा दिए। केवल एक फाटक खुला था जिस पर बहुत ही भरोसेमंद एक सौ सिपाहियों को पहरे पर बिठा दिया। उस फाटक को पार करके राजा कहीं नहीं निकलता था। एक दिन राजा इत्तिफाक से खिडक़ी से बाहर देख रहा था। बाहर सडक़ पर खड़ा कोई भिखारी राजा को देखकर हँसने लगा। वह लगातार हँस रहा था, हँसते-हँसते लोट-पोट हो रहा था। राजा को भारी गुस्सा आ गया, उसने पहरेदारों को बुलाकर उस भिखारी को खींच लाने का हुक्म दिया। सिपाहियों ने किले के सभी पहरों को पार कराके उस भिखारी को राजा के सामने ला खड़ा किया। तब भी उसकी हँसी जारी थी। “किसलिए हँस रहा है, बता! वर्ना तेरा सिर धड़ से अलग किया जाएगा।” राजा ने धमकी दी। ”हुजूर, आपने एकाध खिड़कियाँ क्यों खोल रखी हैं? उन्हें भी बंद कर देते! फिर फाटक को भी बंद कर लें तो कोई भी आफत अंदर नहीं आएगी,” भिखारी ने हँसी के बीच में कहा। ”अरे बेवकूफ, सभी को बंद कर दूँ तो दम घुटकर मैं मर जाऊँगा,” राजा ने कहा। ”क्या फर्क पड़ेगा… अभी भी आप कब्रिस्तान के अंदर ही रह रहे हैं। अंतर इतना ही है कि इस कब्र का एक फाटक है और उस पर पहरा भी बैठा है, फर्क यही है, बस” कहते हुए भिखारी हँसने लगा।

कब्र ही एकमात्र स्थान है, जो पूरी तरह सुरक्षित है

मैं आप लोगों से भी यही कहता हूँ। नए तौर पर कोशिश करके देखने का साहस नहीं है तो हमारे जीवन का अर्थ ही क्या है? अगर आप निरापद सुरक्षित स्थान ही चाहते हैं तो क्यों न कब्र में जाकर आराम कर लेते?

अप्रत्याशित विपदाओं की भी साहस के साथ कामना कीजिए। ऐसे सुलझे मन और साहस को आप केवल योग से ही हासिल कर सकते हैं।
सुरक्षित जीवन बिताने की इच्छा से यदि हम अपने चारों ओर दीवारें खड़ी करेंगे तो हम जिंदगी को जी नहीं सकते। यों जान को दफन करने के बाद केवल शरीर को साठ-सत्तर साल तक किसलिए खींचते चलना है? किनारे से दूर जाने के साहस के बिना यदि जहाज किनारे-किनारे ही चलता रहे तो वह कहीं नहीं पहुँचेगा। वह जहाज दलदल में धँसकर रह जाएगा। कहानी हमारी प्रतीक्षा और अनुमान के अनुसार न होकर मौके-दर-मौके चौंकाने वाले मोड़ों के साथ चलती रहे ऐसी सस्पेंस वाली कहानी की ही न आप बढिय़ा मानकर तारीफ करेंगे? लेकिन केवल अपनी जिंदगी को बिना किसी मोड़ के सीधा-सपाट क्यों बनाना चाहते हैं? युवा रहने की योग्यता केवल हृष्ट-पुष्ट शरीर नहीं, दृढ़तापूर्ण मन भी है। अप्रत्याशित विपदाओं की भी साहस के साथ कामना कीजिए। ऐसे सुलझे मन और साहस को आप केवल योग से ही हासिल कर सकते हैं।


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