क्‍या सेवा करना भी योग हो सकता है?

क्‍या सेवा करना भी योग हो सकता है
क्‍या सेवा करना भी योग हो सकता है

सद्‌गुरु से प्रश्न पुछा गया कि ईशा योग केंद्र में सेवा पर इतना जोर क्यों दिया जाता है। क्या सेवा योग के अभ्यास में मदद कर सकती है? आइये जानते हैं योगिक शैली में सेवा के महत्व के बारे में

श्रेयस:

ईशा में स्वयंसेवा (वालंटियरिंग) पर बहुत ज्यादा जोर दिया जाता है। योग और स्वयंसेवा के बीच क्या संबंध है?

सद्‌गुरु:

योग की पूरी प्रक्रिया बस खुद को समर्पित करने की है, खुद को भेंट करने की है। लेकिन ज्यादातर लोग जानते ही नहीं हैं कि खुद को कैसे भेँट किया जाए। देने के लिए आपको कुछ साधनों की जरूरत होती है, जैसे आपका पैसा, भोजन या ऐसी ही कोई और चीज।

वह यह नहीं सोचता कि मेरी इच्छा क्या है, वह बस यह देखता है कि जरूरत किस बात की है। ऐसी अवस्था में पहुंचते ही आप मुक्त हो जाते हैं। फिर आप पर कर्मों का बोझ भी नहीं बढ़ता।
लेकिन आज जो कुछ भी आपके पास है, आपको अपने आसपास नजर आता है, यहां तक कि आपका शरीर भी, सब कुछ आपने इस धरती से उधार लिया है। आप इसका इस्तेमाल कर सकते हैं, आप इसका आनंद ले सकते हैं, लेकिन जब आप यहां से जाएंगे तो आपको ये सब छोडक़र जाना होगा। देखा जाए तो आपका कुछ है ही नहीं। मूल रूप से देखें तो अगर आप कोई चीज दे सकते हैं, तो वह आप स्वयं ही है। आप खुद को दे सकते हैं, समर्पित कर सकते हैं।

आप बस बैठे-बैठे, अपनी आंखें बंद कर के स्वयं को इस संसार को दे सकते हैं। यह संभव है, लेकिन ज्यादातर लोगों में उस स्तर की जागरूकता नहीं है। खुद को किसी के प्रति समर्पित करने के लिए उन्हें कुछ कर्म करने की आवश्यकता पड़ती है। इसलिए सेवा एक शानदार संभावना है, जो आपको कार्य द्वारा खुद को समर्पित करने का मौका देती है।

हिसाब-किताब न होने से सुंदर बनती है सेवा

आमतौर पर आप जो भी थोड़ा बहुत काम करते हैं, उसमें बहुत हिसाब-किताब करते हैं, “मुझे कितना करना चाहिए? क्यों करना चाहिए? इससे मुझे क्या मिलेगा?” इस तरह की गणनाओं से कुछ करने की सारी खूबसूरती खत्म हो जाती है। इन गणनाओं की वजह से जीवन की प्रक्रिया बेहद भद्दी हो चुकी है। जो चीजें आप अपने जीवन में कर रहे हैं, उनमें से ज्यादातर चीजें वे हैं, जिन्हें खुद आपने चुना है। इसके बावजूद रोजमर्रा के जीवन में छोटे-मोटे काम भी आप बहुत संघर्ष के साथ कर रहे हैं, क्योंकि आप खुद को देना नहीं चाहते। चाहे वह आपका काम हो, आपकी शादी हो, आपका परिवार हो या कुछ और, इन सब चीजों को आपने अपनी इच्छा से शुरू किया है, क्योंकि इन चीजों को आप अपने जीवन में चाहते थे। फिर आप भूल गए कि आपने यह क्यों शुरू किया और अब आप अनिच्छा से कर रहे हैं, जिसकी वजह से यह आपके लिए एक कष्टदायक प्रक्रिया बन गई है।

भीतरी प्रतिरोध हट जाते हैं सेवा से

कोई भी आध्यात्मिक प्रक्रिया किसी इंसान के साथ तब तक घटित नहीं होगी जब तक वह स्वाभाविक रूप से इच्छुक नहीं होगा। इस इच्छा को पैदा करने के लिए सेवा करना एक जबर्दस्त साधन है। बैठे-बैठे आप सोच सकते हैं कि आप इच्छुक हैं, लेकिन जब आपसे वाकई करने को कहा जाता है, तो आप देखेंगे कि जीवन में हर चीज को लेकर आपके भीतर प्रतिरोध की कितनी परतें बनी हुई हैं। तो इस तरह स्वयंसेवा पूरी तरह इच्छुक होने के लिए खुद को ट्रेनिंग देने का एक तरीका है। इच्छुक होना किसी खास काम को करने के लिए नहीं, बस यूं ही इच्छुक होना।

स्वयंसेवी एक ऐसा इंसान होता है, जिसके भीतर कोई प्रतिरोध नहीं होता। क्या सही है, क्या गलत है, क्या किया जाना चाहिए, क्या नहीं, इसके बारे में उसके भीतर कोई भाव नहीं होते।
मेरी यहां मौजूदगी मेरी इच्छा है, दूसरे शब्दों में कहूं तो मैं बहुत गहन स्वीकृति की अवस्था में हूँ। मेरे भीतर कोई प्रतिरोध नहीं है। स्वयंसेवी एक ऐसा इंसान होता है, जिसके भीतर कोई प्रतिरोध नहीं होता। क्या सही है, क्या गलत है, क्या किया जाना चाहिए, क्या नहीं, इसके बारे में उसके भीतर कोई भाव नहीं होते। जो कुछ भी कहा जाएगा, बस वह उसे कर देगा।

ईशा योग की पूरी प्रक्रिया स्वयंसेवा के अवसर के रूप में घटित हो रही है ताकि सेवा के लिए जरुरी और सुरक्षित वातावरण मुहैया कराया जा सके, जहां आप शत प्रतिशत इच्छुक बन सकें, और आपका शोषण भी नहीं हो। इस सुरक्षित वातावरण का प्रयोग आप इच्छुक बनने के लिए कर सकते हैं, ताकि वह इच्छा आपकी रोजमर्रा की जिंदगी का स्थाई हिस्सा बन जाए, आपके अस्तित्व का हिस्सा बन जाए।

श्रेयस:

सद्‌गुरु, आप अकसर इस बात पर जोर देते हैं कि बस वह करते जाओ जिसकी आवश्यकता है। स्वयंसेवा के संदर्भ में इस बात का क्या मतलब है?

सद्‌गुरु:

जब भी जहां कहीं भी ऐसे लोग होते हैं, जो दूसरों की भलाई को अपनी भलाई से ऊपर रखते हैं, उनके आसपास की परिस्थितियां अपने आप ही बहुत सशक्त और खूबसूरत हो जाती हैं। ऐसे लोगों का होना महत्वपूर्ण है, जो सामने वाले इंसान का नाम तक नहीं जानते और उसकी कोई सेवा करनी हो तो करने को तैयार हैं। कोई महान सेवा का काम नहीं, अगर उसकी नाक बह रही है तो उसकी नाक पोंछने को तैयार हैं। अगर आप नाक की बहुत ज्यादा सेवा कर देंगे तो नुकसान हो जाएगा। अगर नाक बह रही है तो बस उसे पोंछे जाने की जरूरत है, इसलिए उसे पोंछ दिया गया, चाहे वो किसी की नाक हो। जरूरत उसे साफ करने की है, बस। अगर दुनिया ऐसे लोगों से भरी होती, तो यह दुनिया हर तरह से उपयोगी और जीने के लिए एक शानदार जगह होती।

कोई स्वयंसेवी इसलिए कोई काम नहीं कर रहा है, क्योंकि उसे फंसा लिया गया है। नहीं, वह सिर्फ इसलिए कर रहा है, क्योंकि वह काम करने को इच्छुक है, तत्पर है। वह यह नहीं सोचता कि मेरी इच्छा क्या है, वह बस यह देखता है कि जरूरत किस बात की है।

जब भी जहां कहीं भी ऐसे लोग होते हैं, जो दूसरों की भलाई को अपनी भलाई से ऊपर रखते हैं, उनके आसपास की परिस्थितियां अपने आप ही बहुत सशक्त और खूबसूरत हो जाती हैं।
ऐसी अवस्था में पहुंचते ही आप मुक्त हो जाते हैं। फिर आप पर कर्मों का बोझ भी नहीं बढ़ता। जीवन में आपको एक सच्चा और पूर्ण स्वयंसेवी बनना चाहिए। दुनिया में जो भी हो रहा है, जब आप उस सबको अपनी जिम्मेदारी के रूप में देखते हैं, तो आप हमेशा एक स्वयंसेवी हैं, भले ही आप कहीं भी हों। आप कुछ कर रहे हों, या कुछ भी नहीं कर रहे हों, आपका अस्तित्व इच्छा पूर्वक होना चाहिए, जबर्दस्ती नहीं। दुनिया भर में हमें ऐसे लोगों को तैयार करने की जरूरत है।

निखिल:

जब लोग सेवा के अपने अनुभव बताते हैं तो उनमें से ज्यादातर लोगों का कहना है कि सेवा करके उन्हें जबर्दस्त आनंद और तृप्ति की अनुभूति हुई। कृप्या इसे हमारे लिए और स्पष्ट करें।

सद्‌गुरु:

जो लोग अपने कार्यों को इस तरह नहीं कर सकते कि उनके काम में उनका व्यक्तित्व झलके, अगर उन्हें अपने कर्मों का कोई मनचाहा परिणाम नहीं मिलता, तो उनमें से ज्यादातर लोग खुश नहीं रह पाते। दुनिया में किसी के भी काम आए बिना मैं आनंद में रह सकता हूँ। लेकिन ज्यादातर लोग इस तरह के नहीं होते। वे कुछ करना चाहते हैं, नहीं तो उन्हें लगता है कि वे कहीं खो गए हैं या किसी काम के नहीं हैं। तो आध्यात्मिक प्रक्रिया के ही एक अंग के रूप में हम आपको ऐसा अवसर पेश करते हैं, कि आप कुछ ऐसा कर सकें जिसका संबंध आपसे नहीं हो। यह आपके खुशी की अभिव्यक्ति हो, न कि खुशी तलाशने की कोशिश हो। स्वर्ग का टिकट खरीदने के खयाल से किया गया काम न हो। बस वह किया जाए जिसकी जरुरत है। इस बात की चिंता नहीं करना कि इससे क्या होगा, यह आध्यात्मिक प्रक्रिया की राह को कई मामलों में साफ करता है।

मैंने ऐसे न जाने कितने लोगों को देखा है जो भाव स्पंदन जैसे कार्यक्रमों में जब आते हैं, तो खुद को पूरी तरह समर्पित कर पाने में सक्षम नहीं होते। लेकिन अगली बार जब स्वयंसेवी के तौर पर आते हैं तब खुद को सही मायने में समर्पित कर देते हैं, उनके अनुभवों की उड़ान ऊंची हो जाती है। कार्यक्रम में वे बहुत कुछ ज्यादा अनुभव नहीं कर पाए थे, लेकिन जब वे सेवा करने आए, उनके अनुभव का पूरा पहलू ही बदल गया। ईशा परिवार दिनोंदिन बड़ा होता जा रहा है। हम इस बात पर विचार कर रहे हैं कि जो लोग कामों में लगे हैं, उनके भीतर आध्यात्मिक आयाम की संभावनाओं को कैसे पैदा किया जाए, ताकि यह दूसरे लोगों के लिए भी हकीकत बन जाए।


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