मयंक: सद्‌गुरु, क्या आपने चमत्कार किए हैं? मेरे लिए तो चमत्कार वो है कि जैसे मैं कहीं बीच रास्ते में खड़ा हूं, आगे जाने के लिए कोई बस या दूसरा साधन नहीं है। मैं फंस गया हूं। तभी अचानक एक कार आई, मेरे पास आकर रुकी और फिर मुझे लेकर चल दी। उस समय मुझे ऐसा लगा कि ईश्वर ने खुद आकर मुझे बिठाया है। लोग ऐसी बातें बताते हैं, जिसे वे चमत्कार कहते हैं।

इंसान होना अपने आप में बहुत बड़ी चीज़ है

सद्गुरु: जब इतने सारे लोग चमत्कार कर रहे हैं तो मैं क्यों चमत्कार करूं? जब बस ड्राइवर व कार ड्राइवर ने चमत्कार कर दिया तो फिर भला वही काम मैं क्यों करूं? इस धरती पर लोगों ने ईश्वर के बारे में बहुत ज्यादा बात करना शुरू कर दिया, क्योंकि उन्हें इंसान होने की विशालता का अहसास ही नहीं था। अगर उन्हें इंसान होने की विशालता का अंदाजा होता तो फिर वे किसी और चीज के बारे में बात ही नहीं करते। मुझे पता है कि आपको मेरी इस बात में अहंकार दिखेगा।

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अगर उन्हें इंसान होने की विशालता का अंदाजा होता तो फिर वे किसी और चीज के बारे में बात ही नहीं करते।

तो अगर कोई कहता है, ‘खुद को जानो’ या फिर उसका सारा ध्यान इस इंसान यानी खुद को जानने पर होता है तो फिर वह भी बहुत अहंकारी हुआ। तो यह कोई अहंकारी होने या अहंकारी नहीं होने की बात नहीं है, यह सिर्फ जीवन को उसी तरह से देखने की बात है, जैसा कि वह है। ये जीवन को वैसा बनाने के बारे में नहीं है, जैसा आपको लगता है कि उसे होना चाहिए। जीवन को वैसा बनाने के बारे में नहीं है, जैसा कि वो सामाजिक या राजनैतिक रूप से सही अस्म्झा जाता है। बल्कि जीवन को वैसा देखने के बारे में है, जैसा वह है।

आपमें लोगों के प्रति आभार का भाव कम हो सकता है

तो आपको लगा कि बस नहीं आएगी, लेकिन एक बस आ गई, आपको लगा कि भगवान ने आपके लिए बस भेजी है। ऐसे में तो आप बुनियादी मानवता भी भूल जाएंगे, क्योंकि तब आप बस ड्राइवर का शुक्रिया तक अदा नहीं कर पाएंगे। मान लीजिए आप भूखे हैं, कोई आया और उसने आपको खाना दे दिया। अगर आपने देखा कि कोई इंसान आपको आकर खाना दे रहा है तो आपके भीतर जबरदस्त कृतज्ञता(शुक्रिया) का भाव आएगा। लेकिन अगर आप सोच रहे हैं कि ईश्वर इस बेवकूफ के जरिए मेरे लिए खाना भेज रहे हैं, तब जाहिर सी बात है कि आप अपने आस-पास के इंसानों के प्रति कृतज्ञता(शुक्रिया) का सहज भाव भी खो देंगे। यही वजह है कि ईश्वरीय लोग आज सबसे ज्यादा अंहकारी हो गए हैं।

अपनी कल्पना को चमत्कार मानने की भूल

अगर आप जीवन को वैसा नहीं देखते, जैसा वह है तो आप उन चीजों को लेकर कल्पना करना शुरू कर देते हैं, जो आपके अनुभव में नहीं होतीं। मैं यह नहीं कह रहा कि वे चीजें होती ही नहीं, बल्कि वे अभी तक आपके अनुभवों में नहीं हैं। लेकिन अगर आप उन चीजों के बारे में सोचना व अंदाजा लगाना शुरू कर देंगे, जो फिलहाल आपके अनुभव में नहीं हैं, तो इस तरह आप सिर्फ मूर्ख ही बनेंगे। यही वजह है कि जो सबसे ज्यादा मूर्ख होते हैं, वे समझदारों की तुलना में आसानी से चमत्कारों के चक्कर में आते हैं। अफसोस की बात है कि चमत्कार हमेशा मूर्खों के साथ ही होता है, क्योंकि मूर्खों का अपनी कल्पनाओं पर कोई काबू नहीं होता। सारी मूर्खतापूर्ण चीजें उनके सामने चमत्कार की तरह आती हैं।

सही तरीका – सब कुछ चमत्कार है, या फिर कुछ चमत्कार नहीं है

ऐसी कोई भी चीज, जिसे आप समझ नहीं पाते, आप उसे चमत्कार कहते हैं। देखिए इस मोबाइल के जरिए, जिसमें थोड़ा सा प्लास्टिक और थोड़ी सी धातु है, अगर आप चाहें तो मैं अभी अमेरिका कॉल लगा सकता हूं। अगर यही काम मैंने आज से सौ साल पहले किया होता और आप तार्किक होते तो बेशक आप सोचते कि मैं आपको मूर्ख बना रहा हूं। लेकिन आज आप जानते हैं कि यह एक हकीकत है। तो क्या यह एक चमत्कार है?

आप या तो हर चीज को चमत्कार के तौर पर देखिए या फिर कुछ भी चमत्कार नहीं है।

बात सिर्फ इतनी है कि अस्तित्व के बारे में आपकी जानकारी व समझ जैसे-जैसे बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे आपके लिए कोई चीज चमत्कार नहीं रह जाती है। अगर जीवन की आपकी समझ व अनुभव बेहद सीमित है, तो आपके लिए हर चीज चमत्कार है। तो यहां जीवन को देखने के दो तरीके हैं। आप या तो हर चीज को चमत्कार के तौर पर देखिए या फिर कुछ भी चमत्कार नहीं है।

अध्यात्म और विज्ञान – दो तरह के नज़रिए

मिट्टी को देखिए, अगर आप उसमें खाद डालते हैं तो पेड़ों पर सुंदर फूल निकल आते हैं। खाद बदबूदार है, तब भी फूलों की खुशबू देखिए। अगर आप इस प्रक्रिया के बारे में नहीं जानते और अगर मैं आपसे कहूं कि मैं इस खाद को एक खुशबूदार फूल में बदलने जा रहा हूं तो क्या आप भरोसा करेंगे? मान लीजिए, मैं अपने हाथ में खाद लूं और उसको फूल बना दूं तो आप इसे एक चमत्कार कहेंगे। अगर यही काम एक पेड़ करता है तो आपको नहीं लगता कि यह एक चमत्कार है। आखिर यह भेदभाव क्यों? पेड़ भी तो चमत्कार कर रहा है। हर चीज, जिसे आप नहीं समझते, वह आपको एक चमत्कार की तरह लगती है। तो यह विज्ञान व अध्यात्म के बीच नजरिए का फर्क है। एक दिव्यदर्शी हर चीज को एक चमत्कार की तरह देखता है। एक वैज्ञानिक हर चीज को एक प्रक्रिया के रूप में देखता है। वे दोनों अलग-अलग नहीं हैं, दोनों ही समान हैं।