सद्गुरु का हवाई अड्डे से एक संदेश
अपनी यात्राओं और कार्यक्रमों की व्यस्तता के बीच सिंगापुर हवाई अड्डे से लिखते हुए सद्गुरु हमसे अपने गुजरे सप्ताह की बातें साझा कर रहे हैं:

उत्साहपूर्ण सम्यमा कार्यक्रम के संपन्न होने के साथ ही टेनेसी आश्रम में हर ओर एक खुशनुमा कंपन फैल गया। सम्यमा मानव प्रकृति के कई पहलुओं की एक परीक्षा है। साथ ही, यह मानव के शारीरिक व मानसिक मजबूती व स्थिरता की भी परीक्षा है। यह मानव मन में जमा बहुत सारी अव्यवस्था(उथल पुथल) की सफाई करता है। इस सबसे अलग यह इस बात की भी परीक्षा है कि किसी व्यक्ति का शरीर कितना आनंदमय है। क्योंकि अगर किसी व्यक्ति के शरीर में आनंद का भाव नहीं होगा तो लंबे समय तक ध्यान में बैठना अपने आप में एक थकाऊ काम हो जाता है।
सम्यमा – एक अद्भुत प्रक्रिया

सम्यमा धुंध व भ्रम से भरे मन को साफ व सपाट आईने में बदलने का एक शानदार तरीका है। सम्यमा एक जरिया है स्पष्टता लाने का - मनोवैज्ञानिक स्तर पर साधारण सी चीजों को जटिल नौटंकी में बदलने की बजाय उनको स्पष्ट बनाने का एक साधन है सम्यमा। हर आदमी अपने ही बनाए हुए बंधनों और फंदों में उलझा हुआ है।
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मन की रचना ‘माया’ से परे की स्पष्टता की स्थिति ही सम्यमा है। लगभग 900 लोगों के साथ लगातार आठ दिन ऊर्जा स्तर पर आत्मीयता(नज़दीकी जुड़ाव) बनाए रखने में काफी जीवन ऊर्जा खर्च करने के बाद उसी दोपहर मुझे ऑगस्टा की यात्रा के लिए निकलना पड़ा।
फिर अमरावती में आयोजित ‘हैपी सिटी कॉन्फ्रेंस’ में हिस्सा लेना पड़ा, जो एक दूरदर्शी नेता की महत्वाकांक्षी परियोजना है। इसे साकार करने के लिए जबरदस्त फंडिंग और लोगों की हिस्सेदारी की जरूरत है। कुछ ही घंटों में अमरावती की यात्रा निबटाने के बाद मुझे तुरंत सिंगापुर में आयोजित होने वाली दिग्गजों से भरी ‘हिंदुस्तान टाइम्स लीडरशिप समिट’ में भाग लेने के लिए निकलना पड़ा। सिंगापुर समिट में भाग लेने का वादा मैं पहले ही कर चुका था, जबकि अमरावती और कुवालालंपुर इसमें बाद में जुड़ गए थे।
मलेशिया में शाम्भवी महामुद्रा दीक्षा में जगह कम पड़ी
कुवालालंपुर में हमने शांभवी महामुद्रा की दीक्षा का आयोजन किया। हालांकि इस कार्यक्रम के आयोजन के लिए किसी बड़ी जगह का इतंजाम न हो पाने के कारण बहुत सारे लोगों को निराश होना पड़ा। दरअसल, बेहद कम समय के नोटिस पर आयोजित होने की वजह से हमें इस कार्यक्रम के लिए कोई बड़ी जगह नहीं मिल पाई। अंत में हमें दो हजार की क्षमता वाले एक हॉल में इसका आयोजन करना पड़ा। कुवालालंपुर में हुआ शांभवी कार्यक्रम वाकई अपने आप में एक ग्लोबल विलेज की सोच को साकार कर रहा था। इस कार्यक्रम में अलग-अलग देशों से आए लोगों ने हिस्सा लिया। आप दुनिया में जितनी तरह के चेहरों की कल्पना कर सकते हैं, वे सब वहां मौजूद थे। यहां बड़ी संख्या में मौजूद चीनी प्रतिभागियों की तादाद ने पूरा आयोजन ऐसा बना दिया था, मानो यह आयोजन ईशा की ‘लुक इस्ट पॉलिसी(पूर्वी देशों पर ध्यान देना)’ को साकार कर रहा हो। छह दिनों में चार देशों की गतिविधियों में शामिल होने का मतलब है कि ढेर सारी उड़ान। इस दौरान मेरा खासा समय हवाई अड्डों पर, सुरक्षाकर्मियों की कठोर जांच और इमीग्रेशन अधिकारियों के बीच बीता - जो आंखें से एक्सरे की तरह आपको भीतर तक देखने का ढोंग करते से दिखते हैं, हालांकि उनको पासपोर्ट पर लगे ठप्पे के सिवाय कुछ नहीं दिखता।
फिलहाल मैं सिंगापुर के हवाई अड्डे पर सैन फ्रांसिसको जाने वाली फ्लाइट का इंतजार कर रहा हूं। इस दौरान मैंने यहां के स्वयंसेवियों को बहुत थका दिया है। देखना है कि अब मैं कैलिफोर्निया में क्या करता हूं...