आध्यात्मिक खोज – विशेेेेष बनने की आदत आध्यात्मिक विकास मेें बाधक है
क्या योगी बनने के लिए अपना सांसारिक जीवन छोड़ना जरुरी है? एक साधक ने अपने जीवन में इसी प्रश्न का सामना किया जानते हैं उनके अनुभवों के बारे में।
हम आगे बढ़ते रहे और सद्गुरु मेरे सवालों का समाधान करते रहे।
‘पहले यह तय हो जाना चाहिए कि आप कौन हैं,’ उन्होंने कहा। ‘आपकी एकाग्रता बिखरी हुई है, क्योंकि आप जिसको ‘मैं’ कहती हैं वह है - आपका शरीर, मन, घर, कार, पति, बच्चा, पालतू कुत्ता, शिक्षा, कारोबार, सत्ता और आपका जमा किया हुआ सब-कुछ, जिनसे आप पहचानी जाती हैं। यदि मैं आपकी इन सब पहचानों का आवरण हटा दूं तो आपको लगेगा कि आप कुछ भी नहीं हैं। इसलिए आप जिसको ‘मैं’ कहती हैं वह फिलहाल आपके चारों ओर फैली हुई चीजें और रिश्ते हैं। जब मैं ‘आप’ कहता हूं, तो उसका अर्थ केवल ‘आप’ है। यह कार नहीं, यह यात्रा नहीं, आपका बच्चा नहीं, कुछ भी नहीं, केवल आप। यदि यह ‘आप’ अपने वास्तविक रूप के अलावा किसी भी दूसरी चीज से पहचाना नहीं जाता तब आप, जैसा चाहें वैसा, फिर से अपना भाग्य लिख सकती हैं। फिलहाल आप बिखरी हुई हैं। यह ‘आप’ नहीं हैं बल्कि सिर्फ जमा किया हुआ अतीत है। अब भी आपको इस सारे घाल-मेल को समेटकर एक किनारे रखना है।
क्या आप अपनी जमा की हुई चीजों से पहचाने जाते हैं?
‘जब तक आप अपनी जमा की हुई इन सारी चीजों से पहचानी जाती हैं, तब तक आप एक भीड़ हैं, और भीड़ का भाग्य हमेशा पहले से तय होता है। जब आप एक व्यक्ति यानी इंडिविजुअल बन जाती हैं तो फिर कभी बांटी नहीं जा सकतीं। बांटी न जा सकने का मतलब होता है अनंत। आप अनंत के अलावा हर किसी चीज के टुकड़े कर सकती हैं। जो तोड़ा जा सकता है उसे पूरे स्थायित्व का बोध नहीं होता। इसका मतलब यह है कि आप टुकड़ों में हैं - अपने आपको एक साथ जोड़े रखना एक बहुत बड़ा करतब है। कोई आश्चर्य नहीं कि लोग हमेशा चिंतित रहते हैं। जब आप किसी और चीज से पहचान न बनाकर विशुद्ध ‘आप’ बन जाएंगी तभी आपका भाग्य आपके हाथ में होगा। मैं चाहता हूं कि आप यह समझ लें।’
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सबसे अलग-थलग रहने का भाव मन की उपज है
सद्गुरु बोलते रहे, ‘आप मानसिक तर्क प्रक्रिया की जितनी अधिक गुलाम होती जाएंगी आप उतनी ही अधिक-और-अधिक विशिष्ट होना चाहेंगी। आज पूरा समाज विशिष्टता को बढ़ावा दे रहा है। विशिष्ट बनने का अर्थ है खुद को जीवन से अलग करना। आपको विशिष्टता की जरूरत इसलिए पड़ रही है, क्योंकि असुरक्षा की भावना आपमें गहराई तक घर कर गयी है। विशिष्टता और असुरक्षा एक-दूसरे के सहारे पलती-बढ़ती हैं। मानवता के एक बड़े हिस्से पर राज करनेवाली विशिष्टता और असुरक्षा के ये भाव पूरी तरह मन की उपज हैं। इनका अपना कोई अस्तित्व नहीं है।’
मैंने सोचा कि अमेरिका में हमारी संस्कृति के लिए यह कितना सच है। हम अपनी अलग दुनिया में रहते हैं, अपने खास मोहल्लों में, हमको नापसंद हर किसी के आने-जाने पर रोक लगाकर। हम अपने समुदाय में चुनिंदा लोगों को ही शामिल करते हैं। क्या अपने ऊपर खुद का लादा यह अलगाव हमें असली जीवन से अलग नहीं करता?
‘आपका भौतिक शरीर और उसके अंदर का जीवन सहज रूप से समावेशी हैं। भौतिक शरीर धरती से बना है और उससे उधार लिया हुआ है, लेकिन आपने इसको अपना बना लिया है। लगातार सांस अंदर खींचकर और बाहर छोडक़र आप पूरी दुनिया से लेन-देन कर रही हैं। अंदर की ऊर्जा सदा हर बाहरी चीज से मिली हुई है, तो आपकी विशिष्टता महज मानसिक है। दूसरे शब्दों में कहें तो आपका मन ऐसा है कि उसके सुर सारे जीवन के साथ नहीं मिलते। जब आपके मन के सुर उस जीवन के साथ नहीं मिलते, जो कि आप हैं, तब आप जीवन-प्रक्रिया को उसके चरम पर जाने देने को तैयार नहीं होतीं। यह अनिच्छा पूरी तरह से मनोवैज्ञानिक है।’
पतंजलि ने योगसूत्र के आरम्भ में महत्वपूर्ण बात कही थी
‘आपके अंदर की हर कोशिका जीवन जीने की कोशिश कर रही है। इस बारे में अनजान होने पर आप उदासी या डिप्रेशन में घिरकर मर जाने तक का मन बना सकती हैं। मुंह को बंद कर सांस रोककर देखें कि क्या होता है। आप महसूस करेंगी कि आपके अंदर की हर कोशिका जीने की इच्छा बिलकुल साफ जता रही है। चूंकि जीवन की प्रक्रिया समावेशी है, इसलिए यदि आप विशिष्टता की मानसिक प्रक्रिया शुरू करके जीवन-प्रक्रिया के प्रति अनिच्छा की एक गहरी भावना पैदा कर लेंगी तो आप मानसिक रूप से उस जीवन के, जो आप खुद हैं, विरुद्ध विद्रोह कर रही होंगी। बुनियादी तौर पर सारी तकलीफ की जड़ यही है। यदि आप अपने मन के सुर को अपने शेष भाग से जोड़ लेती हैं तो मन को पूरा समावेशी बनाया जा सकता है। इस समावेशी प्रवृत्ति से आप आनंदमय हो जाती हैं। इस समावेशी प्रक्रिया से आपकी जीवन-प्रवृत्ति दूसरों को स्वीकार करने लगती है।’ ‘योग का अर्थ होता है, हर चीज को अपने हिस्से के रूप में जानना और महसूस करना। आधुनिक विज्ञान ने बिना-संदेह यह सिद्ध कर दिया है कि सब-कुछ सिर्फ एक ही ऊर्जा है। धर्म चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे हैं कि ईश्वर हर जगह है। चाहे आप कहें कि ईश्वर हर जगह है या कहें कि सब-कुछ सिर्फ एक ही ऊर्जा है, आप एक ही बात दो अलग तरीकों से कह रहे हैं।’
योग के जनक माने जाने वाले पतंजलि ने इसको बड़ी सुंदरता से कहा है। योगसूत्र आरंभ करते समय उन्होंने कहा था, ‘और अब योग।’ उनके कहने का मतलब था कि आपने अब तक हर चीज आजमा ली - पैसा, सत्ता, संपत्ति, प्रेम, सुख, और यहां तक कि नशीली दवाएं भी...’ सद्गुरु कहते हुए हंस पड़े, ‘लेकिन किसी चीज से कोई लाभ नहीं हुआ। आपको कोई बड़ी तृप्ति नहीं मिल पाई। जब आप यह समझ लेते हैं तब आप योग के लिए तैयार हैं।’