अल्लमा प्रभु – जिनमें थी एक अलग तरह की शक्ति

सद्‌गुरु अल्लमा प्रभु की कहानी सुना रहे हैं, जो कर्नाटक के उत्तरी भाग में रहा करते थे। एक योगी अल्लमा की तलाश में आए क्योंकि उन्होंने अल्लमा के बहुत चर्चे सुने थे। वो उनके साथ मुकाबला करना चाहते थे। उन्होंने अल्लमा से कहा, "देखो, मैं ही असली योगी हूं। अगर तुम मेरी परीक्षा लेना चाहते हो, तो अपनी तलवार लेकर मेरे सिर पर मारो, और देखो क्या होता है।” अल्लमा ने अपनी तलवार ली और उनके सिर पर दे मारी। तलवार ऐसे वापस उछली जैसे किसी चट्टान से टकराई हो। तो योगी ने कहा, "यही मेरी ताकत है, कोई तलवार मेरे शरीर को काट नहीं सकती।” अल्लमा बोले, "आप भी अपनी तलवार से वार करें।" योगी को संकोच हुआ, क्योंकि अल्लमा चट्टान की तरह मजबूत नहीं दिख रहे थे, वे सामान्य दिख रहे थे। अल्लाम बोले - "तलवार उठाओ, घबराओ मत।” ...आगे क्या हुआ, देखिए इस वीडियो में।

अक्का महादेवी ने क्‍यों उतार फेंके अपने कपड़े?

सद्‌गुरु अक्का महादेवी की कहानी बता रहे हैं। शिव की प्रेम दीवानी अक्का महादेवी ने सभी सामाजिक नियम और बंधन तोड़ दिए थे। उनकी शादी एक राजा से हुई थी, लेकिन उन्होंने राज महल, अपने गहने, यहाँ तक की अपने वस्त्र भी त्याग दिए और शिव की खोज में निकल पड़ीं। सद्‌गुरु अक्का महादेवी की एक कविता भी सुना रहे हैं, जिसमें अक्का अपनी माँ की वापस समाज में आने की पुकार का उत्तर दे रही हैं।

 

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पूसलार - जमीन पर नहीं, दिल में बनाया शिव मंदिर

उस राज्य के राजा एक महान सम्राट थे, और उन्होंने एक बड़े शिव मंदिर का निर्माण करने के लिए बहुत मेहनत की थी। हजारों कारीगरों और बहुत सी सामग्री का उपयोग करके, उन्होंने एक विशाल मंदिर का निर्माण किया और मन्दिर की प्राण-प्रतिष्ठा और उद्घाटन समारोह के लिए एक दिन तय किया। उससे एक दिन पहले जब वे सोने गए, तो उनके सपने में शिव ने दर्शन दिए और कहा, “मुझे खेद है कि मैं आपके मंदिर के उद्घाटन में भाग नहीं ले पाउँगा, क्योंकि कल मुझे पूसलार के मंदिर में जाना है।” राजा पूसलार की तलाश में निकल पड़े। लेकिन उस इलाके में पहुँचने के बाद उन्हें वहाँ कोई मंदिर नज़र नहीं आया। राजा ने पूसलार से पूछा, "आपका मंदिर कहां है?" पूसलार शर्मिंदा दिखने लगे। उन्होंने कहा, "मेरा मंदिर? वो मंदिर पत्थर और ईंट का नहीं है। मैं सिर्फ अपने दिल में इस मंदिर का निर्माण कर रहा हूं।" आईये सुनते हैं यह दिल को छूने वाले कहानी, सद्‌गुरु से।

 

देवर दासिमय्या – खुद की चिंता से मुक्‍त, एक अद्भुत संत

दासिमय्या एक बहुत अच्छे बुनकर थे। एक बार उन्होंने महीन और सुंदर बुनाई वाला एक बहुत बड़ा पगड़ी का कपड़ा बुना, जिसे बुनने में उन्हें महीनों लग गए। फिर वे उसे बाजार ले गए। वो कपड़ा इतना बड़ा और इतना सुन्दर था कि किसी ने उसकी कीमत भी नहीं पूछी – सभी को लगा कि ये बहुत महँगा होगा। वो अपना कपड़ा नहीं बेच पाए। फिर वो अपने सुन्दर कपड़े के साथ वापस आ रहे थे। रास्ते में उन्हें एक बूढ़ा आदमी बैठा मिला – वो आदमी काँप रहा था। उसने दासिमय्या की और देख कर कहा – “मैं काँप रहा हूँ। क्या तुम मुझे वो कपड़ा दे सकते हो?” दासिमैय्या ने वो कपड़ा उसे दे दिया। उस आदमी ने वो कपड़ा खोला और उस कपड़े के कई टुकड़े कर दिए। एक टुकड़ा उसने अपने सिर पर बाँधा, दूसरा अपनी छाती पर, दो छोटे टुकड़े अपने पैरों पर, और दो टुकड़े अपने हाथों पर। उसने कपड़े के कई टुकड़े कर दिए और उन्हें पहनकर बैठा गया। दासिमय्या बस देखते रहे। फिर क्या हुआ? ...आईये, पूरी कहानी सुनते हैं सद्‌गुरु से।

 

नंदनार : जिन्हें बचपन से लगता था की शिव उन्हें पुकार रहे हैं

यह इंसान, जो एक बंधुआ मजदूर था, बचपन से ही शिव को लेकर उसमें बहुत अधिक उत्साह और जोश था। बस पच्चीस किलोमीटर दूर एक प्रसिद्ध शिव-मंदिर था और उसे लगता था कि शिव उसे बुला रहे हैं। मगर अपने जीवन पर उसका अधिकार नहीं था, इसलिए वो मंदिर तक नहीं जा पा रहा था। उसने कई बार अपने जमींदार से प्रार्थना की, ‘सिर्फ एक दिन के लिए मुझे जाने दीजिए, मैं मंदिर जाकर वापस लौट आऊंगा।’ जमींदार हमेशा कहता, ‘आज निराई करनी है। कल खाद डालना है। परसों कोई और काम है, तुम्हें जमीन जोतना है। नहीं, तुम एक भी दिन बर्बाद नहीं कर सकते।’ आईये, सद्‌गुरु से सुनते हैं इस भोले-भाले इंसान की कहानी, जिसने शिव के प्रति अपने कौतुहल को कभी मरने नहीं दिया।